श्री सत्यनारायण व्रत कथा: पाँचों अध्याय और पूजा विधि
सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय: लता-पत्र वाली नाव और कलावती का प्रसाद छोड़ना
अध्याय 4: घर लौटते समय वैश्य दण्डी संन्यासी वेषधारी भगवान से झूठ बोलता है और उसका धन लता-पत्र बन जाता है, जब तक वह क्षमा नहीं माँगता; घर पर कलावती प्रसाद छोड़कर पति से मिलने दौड़ती है, नाव डूब जाती है, और प्रसाद ग्रहण करने पर सब ठीक होता है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।चौथे अध्याय में दो छोटी भूलों के बड़े परिणाम दिखते हैं: एक झूठ और एक बार प्रसाद का अनादर।
दण्डी संन्यासी और झूठ
वैश्य साधु ने मंगलाचरण करके और ब्राह्मणों को दान देकर अपने नगर की ओर यात्रा आरम्भ की। कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण ने उसकी परीक्षा लेने के लिए दण्डी संन्यासी का वेष धरकर पूछा: हे वैश्य, तुम्हारी नाव में क्या है?
धन के अभिमान में चूर साधु ने हँसते हुए कहा: हे दण्डी, क्यों पूछते हो? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते (लता-पत्र) भरे हैं।
यह कठोर वचन सुनकर दण्डी ने कहा: तुम्हारा वचन सत्य हो। यह कहकर वे वहाँ से कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए।
नाव में लता-पत्र
दण्डी के जाने के बाद साधु ने नित्य कर्म करके देखा कि नाव ऊपर उठी हुई (हल्की) है। आश्चर्य से उसने नाव में देखा, तो उसमें सचमुच लता-पत्र भरे थे; सारा धन गायब था। यह देखकर वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। होश आने पर वह शोक करने लगा।
तब उसके दामाद ने कहा: आप शोक क्यों करते हैं? यह उस दण्डी का शाप है; वे सब कुछ कर सकते हैं। इसमें सन्देह नहीं। उनकी शरण में चलें; वहीं हमारी मनोकामना पूरी होगी।
क्षमा याचना
दामाद की बात सुनकर साधु दण्डी के पास गया, भक्ति से प्रणाम किया और आदर से बोला: मैंने आपसे जो असत्य कहा, उसके लिए क्षमा कीजिए। यह कहकर वह बार-बार प्रणाम करके रोने लगा।
तब दण्डी भगवान ने कहा: हे वणिक पुत्र, रोओ मत, सुनो। मेरी पूजा से विमुख होने के कारण, मेरी आज्ञा से तुम्हें बार-बार दुःख मिला है। साधु ने स्तुति की: हे प्रभु, आपकी माया से मोहित ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूप को नहीं जानते, तो मैं मूढ़ कैसे जानूँ? आप प्रसन्न होइए; मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा कीजिए और पहले जैसा धन लौटा दीजिए।
उसके भक्ति भरे वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हुए, उसे मनचाहा वर दिया और अन्तर्धान हो गए। साधु ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से भरी है। उसने भगवान की कृपा मानी, बन्धुओं के साथ विधि से पूजा की, और प्रसन्न होकर अपने नगर की ओर चला।
घर पहुँचना और कलावती की उतावली
नगर के पास पहुँचकर साधु ने दामाद से कहा: देखो, यह मेरी रत्नपुरी नगरी है। फिर उसने एक दूत को अपने धन और आने का समाचार देने के लिए घर भेजा। दूत ने लीलावती को प्रणाम करके कहा: सेठ जी दामाद के साथ बहुत-सा धन लेकर नगर के पास आ गए हैं।
यह सुनकर लीलावती ने प्रसन्न होकर सत्यनारायण की पूजा पूरी की और बेटी से कहा: मैं पति के दर्शन के लिए जाती हूँ; तुम काम पूरा करके जल्दी आना। कलावती भी पूजा कर रही थी। माँ के वचन सुनकर, पति से मिलने की उतावली में वह प्रसाद छोड़कर (ग्रहण किए बिना) पति के दर्शन के लिए दौड़ पड़ी।
नाव का डूबना
प्रसाद के अनादर से भगवान अप्रसन्न हुए, और उन्होंने उसके पति को नाव सहित धन के साथ जल में डुबो दिया। कलावती ने किनारे पर पति को न देखकर रोते हुए भूमि पर गिर पड़ी। नाव को डूबा और बेटी को रोते देख साधु भी दुःखी होकर बोला: हे प्रभु, मुझसे या मेरे परिवार से जो भूल हुई है, उसे क्षमा कीजिए।
कलावती ने संकल्प किया कि वह पति की खड़ाऊँ लेकर उनके साथ सती हो जाएगी। तभी आकाशवाणी हुई: हे साधु, तुम्हारी पुत्री ने मेरे प्रसाद को छोड़ दिया है, इसलिए इसका पति अदृश्य हो गया है। यदि यह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके लौटे, तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा।
प्रसाद ग्रहण और पुनर्मिलन
आकाशवाणी सुनकर कलावती शीघ्र घर गई, श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया और लौटकर आई। तब उसने देखा कि उसका पति नाव और धन सहित वहीं है। कलावती ने प्रसन्न होकर पिता से कहा: अब घर चलिए, देर क्यों करते हैं? साधु ने प्रसन्न होकर बन्धु-बान्धवों के साथ विधि से सत्यनारायण का पूजन किया, और उस दिन से हर पूर्णिमा और संक्रान्ति को यह व्रत करने लगा। इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर (बैकुण्ठ) को गया।
इस अध्याय की सीख
- छोटा-सा झूठ भी बड़ा संकट ला सकता है; धन के अभिमान में झूठ न बोलें।
- भगवान किसी भी वेष में परीक्षा ले सकते हैं; हर व्यक्ति से आदर से बात करें।
- प्रसाद भगवान का आशीर्वाद है; जल्दबाज़ी में भी उसका अनादर नहीं करना चाहिए।
- भूल मानकर सच्चे मन से क्षमा माँगने पर सब ठीक हो जाता है।
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