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पाठ और स्तुति

श्रीराम स्तुति: श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन

गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीराम स्तुति "श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन": सम्पूर्ण पाठ, हर पद का सरल अर्थ, और यह कब गाई जाती है।

यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका से है। यह राम मंदिरों में आरती के समय सबसे अधिक गाई जाने वाली रचनाओं में है, और अयोध्या में सुबह-शाम सुनाई देती है। इसमें पाँच पद हैं। तुलसीदास अपने ही मन से कहते हैं: हे मन, कृपालु श्रीरामचन्द्र का भजन कर।

स्तुति

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज-लोचन कंज-मुख कर-कंज पद कंजारुणं॥

अर्थ: हे मन, कृपालु श्रीरामचन्द्र का भजन कर, जो संसार के कठिन भय को हर लेते हैं। उनके नेत्र नए खिले कमल जैसे हैं; मुख कमल जैसा, हाथ कमल जैसे, और चरण लाल कमल जैसे हैं।

कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥

अर्थ: उनकी शोभा अनगिनत कामदेवों से बढ़कर है। वे नए नीले बादल जैसे सुन्दर हैं। उनका पीला वस्त्र ऐसा चमकता है जैसे बादल में बिजली। ऐसे पवित्र, जनक की पुत्री के पति को मैं नमस्कार करता हूँ।

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्दकन्द कोशलचन्द दशरथ-नन्दनं॥

अर्थ: दीनों के बन्धु का भजन कर, जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं और दानव-दैत्यों के वंश का नाश करने वाले हैं। वे रघुकुल को आनन्द देने वाले, आनन्द के मूल, कोसल देश के चन्द्रमा और दशरथ के पुत्र हैं।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं।
आजानुभुज शर-चाप-धर संग्राम-जित-खरदूषणं॥

अर्थ: उनके सिर पर मुकुट है, कानों में कुण्डल, माथे पर सुन्दर तिलक, और अंगों पर शोभा देते आभूषण। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं, हाथ में धनुष-बाण है, और उन्होंने युद्ध में खर और दूषण को जीता है।

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज निवास कुरु कामादि खलदल-गंजनं॥

अर्थ: तुलसीदास कहते हैं: हे प्रभु, आप शंकर, शेष और मुनियों के मन को आनन्द देने वाले हैं। काम, क्रोध जैसे दुष्टों के दल का नाश करके मेरे हृदय-कमल में निवास कीजिए।

इसका भाव

पहले चार पदों में तुलसीदास राम के रूप का चित्र खींचते हैं: कमल जैसी आँखें, बादल जैसा रंग, बिजली जैसा पीताम्बर, हाथ में धनुष। वे देखने वाले का ध्यान रूप पर टिकाते हैं। पर अन्तिम पद में वे रूप नहीं माँगते। वे माँगते हैं कि राम मेरे हृदय में रहें और मेरे भीतर के शत्रुओं को हराएँ: काम, क्रोध, लोभ, अहंकार। बाहर के रावण को राम ने मार दिया; भीतर के रावण को मारने की प्रार्थना यह स्तुति है। इस पर पढ़ें: अहंकार पर विजय।

"संग्राम-जित-खरदूषणं" में जिस युद्ध की बात है, वह पंचवटी और खर-दूषण वध के प्रसंग में है। जिन "जनक सुता" का नाम आता है, वे सीता हैं।

कब गाई जाती है

यह स्तुति राम मंदिरों में प्रातः और संध्या की आरती में गाई जाती है। रामनवमी पर और रामचरितमानस के पाठ के आरम्भ या समापन पर भी इसे गाया जाता है। घर में इसे दीपक जलाकर प्रतिदिन पढ़ा जा सकता है; इसमें एक-दो मिनट लगते हैं।

साथ में पढ़ें: हनुमान चालीसा और श्रीराम का जीवन।

छपे हुए संस्करणों में कुछ शब्दों की वर्तनी थोड़ी भिन्न मिलती है। यदि आपको यहाँ कोई त्रुटि दिखे, तो कृपया हमें बताएँ।

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