श्री सत्यनारायण व्रत कथा: पाँचों अध्याय और पूजा विधि
सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय: राजा उल्कामुख, साधु वैश्य और कलावती
अध्याय 3: साधु नाम का वैश्य राजा उल्कामुख को व्रत करते देखकर सन्तान होने पर व्रत करने का वचन देता है; पुत्री कलावती होती है, पर वह व्रत टालता रहता है, और वचन भूलने के कारण बन्दी बनता है और उसका परिवार दरिद्र हो जाता है।
अपनी भाषा में पढ़ें
English · বাংলা · मराठी · ગુજરાતી · ਪੰਜਾਬੀ · தமிழ் · తెలుగు · ಕನ್ನಡ · മലയാളം · ଓଡ଼ିଆ · नेपाली · اردو
अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।तीसरा अध्याय सत्यनारायण कथा का सबसे बड़ा अध्याय है। इसका सन्देश स्पष्ट है: भगवान से किया वादा भूलना नहीं चाहिए।
राजा उल्कामुख का व्रत
प्राचीन काल में उल्कामुख नाम के एक बुद्धिमान, सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा थे। वे प्रतिदिन देवालय जाते और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करते। एक दिन वे अपनी कमल जैसे मुख वाली, सती पत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर सत्यनारायण का व्रत कर रहे थे।
तभी साधु नाम का एक वैश्य, जो व्यापार के लिए बहुत-सा धन लेकर नाव से जा रहा था, वहाँ रुका। राजा को व्रत करते देख उसने नम्रता से पूछा: हे राजन, आप भक्ति से भरे मन से यह क्या कर रहे हैं? राजा ने कहा: हे साधु, मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ पुत्र आदि की प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन कर रहा हूँ।
वैश्य का वचन
यह सुनकर वैश्य ने आदर से कहा: हे राजन, मुझे भी इसकी पूरी विधि बताइए; मेरे भी कोई सन्तान नहीं है। मैं भी यह व्रत करूँगा। राजा से विधि सुनकर व्यापार से निवृत्त होकर वह घर लौटा और अपनी पत्नी लीलावती को सन्तान देने वाले इस व्रत के बारे में बताया और कहा: जब मेरी सन्तान होगी, तब मैं यह व्रत करूँगा।
कलावती का जन्म और टालमटोल
भगवान की कृपा से लीलावती गर्भवती हुई और दसवें महीने में एक सुन्दर कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम कलावती रखा गया। वह शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। तब लीलावती ने मीठे शब्दों में पति से कहा: आपने जो व्रत करने का संकल्प किया था, उसे अब क्यों नहीं करते?
साधु बोला: हे प्रिये, इसके विवाह के समय करूँगा। इस प्रकार पत्नी को आश्वासन देकर वह नगर को चला गया।
कलावती का विवाह
कलावती पिता के घर में बढ़ती रही। जब वह युवा हुई, तो साधु ने दूत भेजकर योग्य वर खोजने को कहा। दूत कंचनपुर नगर गया और वहाँ से एक सुन्दर, गुणवान वणिक पुत्र को ले आया। साधु ने बन्धुओं के साथ प्रसन्न होकर विधि से उसके साथ कलावती का विवाह कर दिया। पर भाग्य से (या भूल से) वह विवाह के समय भी सत्यनारायण का व्रत करना भूल गया।
तब भगवान अप्रसन्न हुए और उसे दारुण दुःख मिलने का विधान हुआ (शाप)।
रत्नसारपुर में संकट
कुछ समय बाद व्यापार में कुशल साधु अपने दामाद के साथ समुद्र के किनारे रत्नसारपुर नगर गया, जहाँ राजा चन्द्रकेतु का राज्य था। वहाँ वे व्यापार करने लगे। उसी समय सत्यनारायण भगवान की माया से प्रेरित एक चोर ने राजा का धन चुराया और राजसैनिकों के पीछा करने पर डर के मारे वह धन वहीं रख दिया जहाँ साधु और उसका दामाद ठहरे थे।
सैनिकों ने वहाँ राजा का धन देखा और दोनों वणिकों को बाँधकर राजा के पास ले गए। राजा ने बिना विचार किए उन्हें कारागार में डालने और उनका सारा धन छीनने की आज्ञा दी। दोनों ने बहुत कहा कि हम निर्दोष हैं, पर किसी ने नहीं सुना। वे बारह वर्ष (परम्परा अनुसार लम्बे समय) कारागार में रहे।
घर की दुर्दशा
इधर भगवान की अप्रसन्नता से साधु के घर में चोरी हो गई, सारा धन चला गया। लीलावती और कलावती रोग, दुःख, भूख और प्यास से पीड़ित होकर भिक्षा माँगने लगीं।
एक दिन भूखी-प्यासी कलावती एक ब्राह्मण के घर गई, जहाँ सत्यनारायण का व्रत हो रहा था। उसने बैठकर कथा सुनी, प्रसाद लिया और रात को घर लौटी। माँ ने पूछा: इतनी रात तक कहाँ थी? कलावती ने कहा: माँ, मैंने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण का व्रत होते देखा, जो सब मनोकामनाएँ पूरी करने वाला है।
यह सुनकर लीलावती को अपने पति का भूला हुआ वचन याद आ गया। उसने बन्धुओं के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन किया और प्रार्थना की: हे भगवन, मेरे पति और दामाद से जो भूल हुई, उसे क्षमा करें, और वे शीघ्र घर लौटें।
राजा का स्वप्न
भगवान प्रसन्न हुए और राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा: हे राजन, जिन दोनों वणिकों को तुमने बन्दी बनाया है, वे निर्दोष हैं। सुबह होते ही उन्हें छोड़ दो और उनका सारा धन लौटा दो; नहीं तो तुम्हारा राज्य, धन और पुत्र नष्ट हो जाएँगे।
सुबह राजा ने सभा में स्वप्न सुनाया, दोनों वणिकों को बुलवाया, उनकी बेड़ियाँ कटवाईं, उन्हें नहलाकर नए वस्त्र पहनाए, उनका धन दोगुना करके लौटाया और कहा: तुम्हें भाग्य से यह कष्ट मिला; अब कोई भय नहीं, अपने घर जाओ।
इस अध्याय की सीख
- भगवान से किया वादा "बाद में" पर नहीं टालना चाहिए; टालमटोल ही संकट का कारण बनी।
- बच्चे भी परिवार को सही मार्ग दिखा सकते हैं; कलावती ने माँ को व्रत की याद दिलाई।
- सच्चे मन से क्षमा माँगने पर भगवान क्षमा करते हैं।
- बिना जाँच के किसी को दोषी ठहराना अन्याय है; राजा ने बाद में अपनी भूल सुधारी।
अंतिम अद्यतन:
आगे पढ़ें
शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण अपनी सात संहिताओं में, क्रम से: शिव महिमा, अग्नि-स्तम्भ की कथा, सती और पार्वती, कार्तिकेय और गणेश का जन्म, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शिव के अवतार और शिव पूजा की विध…
विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में
महर्षि पराशर द्वारा मैत्रेय को सुनाया गया विष्णु पुराण, छह अंशों में: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी और लोक, सूर्य और चन्द्र वंश, श्रीकृष्ण चरित और कलियुग व प्रलय।
श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को सात दिनों में सुनाई गई श्रीमद्भागवत: अवतारों, ध्रुव, प्रह्लाद और गजेन्द्र से लेकर सम्पूर्ण कृष्ण लीला और उद्धव गीता तक, सभी बारह स्कन्ध…
हनुमान चालीसा: सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
गोस्वामी तुलसीदास रचित सम्पूर्ण हनुमान चालीसा, हर चौपाई के सरल अर्थ के साथ: कब पढ़ी जाती है और क्या सिखाती है।
श्रीराम स्तुति: श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन
गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीराम स्तुति "श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन": सम्पूर्ण पाठ, हर पद का सरल अर्थ, और यह कब गाई जाती है।