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गरुड़ पुराण: सरल हिन्दी में भाग-दर-भाग

गरुड़ पुराण: गरुड़ जी के प्रश्न और मृत्यु के समय क्या करें

प्रेत खण्ड का आरम्भ: गरुड़ जी पूछते हैं कि प्राणी क्यों मरते हैं और उसके बाद क्या होता है; भगवान विष्णु मृत्यु के निकट आने के लक्षण और मरणासन्न व्यक्ति के लिए परिवार के कर्तव्य बताते हैं: तुलसी, गंगाजल, भगवान का नाम और दान।

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प्रेत खण्ड की शुरुआत गरुड़ जी की जिज्ञासा से होती है। उन्होंने तीनों लोकों में घूमकर देखा कि सब प्राणी दुःखी हैं और मरते हैं, और भगवान से पूछा कि यह क्यों है और इससे कैसे छूटा जाए।

गरुड़ जी के प्रश्न

गरुड़ जी ने पूछा: हे प्रभु, प्राणी क्यों मरता है? मृत्यु के बाद जीव कहाँ जाता है? यमलोक का मार्ग कैसा है? पापी और पुण्यात्मा की गति में क्या अन्तर है? परिवार को मरने वाले के लिए क्या करना चाहिए? और मनुष्य इस चक्र से मुक्त कैसे हो?

भगवान ने कहा: तुमने लोक-कल्याण के लिए यह पूछा है; ध्यान से सुनो। जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु के बाद जीव अपने कर्मों के अनुसार गति पाता है। यह ज्ञान सुनकर मनुष्य अच्छे कर्मों की ओर मुड़ता है, इसलिए यह कल्याणकारी है।

मृत्यु के निकट आने के लक्षण

ग्रन्थ में बताया गया है कि मृत्यु से पहले मनुष्य के शरीर और मन में परिवर्तन आते हैं: इन्द्रियाँ शिथिल होने लगती हैं, आवाज़ बदल जाती है, शरीर का बल घटता है, और व्यक्ति अपने जीवन के कर्मों को याद करने लगता है। पुण्यात्मा व्यक्ति के मन में शान्ति रहती है, जबकि पाप करने वाले को भय सताता है। (ये पारम्परिक वर्णन हैं; स्वास्थ्य सम्बन्धी किसी भी स्थिति में डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।)

मरणासन्न व्यक्ति के लिए परिवार क्या करे

गरुड़ पुराण परिवार को स्पष्ट मार्गदर्शन देता है:

  • व्यक्ति के पास शान्त वातावरण रखें; रोना-धोना और कलह न करें।
  • मुख में तुलसी दल और गंगाजल दें।
  • पास बैठकर भगवान का नाम लें, "राम", "नारायण", "हरि" या "ॐ नमः शिवाय", और व्यक्ति को भी स्मरण कराएँ।
  • गीता (विशेषकर आठवाँ अध्याय) या विष्णु सहस्रनाम का पाठ सुनाएँ।
  • व्यक्ति के हाथ से या उसके नाम से अन्न, जल, वस्त्र, तिल या गाय का दान कराएँ, अपनी सामर्थ्य के अनुसार।
  • यदि सम्भव हो, तो भूमि को गोबर से लीपकर, कुशा बिछाकर, सिर उत्तर या पूर्व की ओर करके लिटाएँ (परम्परा अनुसार)।

भगवान कहते हैं कि अन्त समय में जो भगवान का स्मरण करता है, उसे यमदूतों का भय नहीं होता।

मृत्यु का क्षण

जीवन भर के कर्मों का फल लेकर जीव शरीर छोड़ता है। गरुड़ पुराण के अनुसार जीव अँगूठे के आकार के सूक्ष्म शरीर में निकलता है। पुण्यात्मा को भगवान के पार्षद या शान्त दूत ले जाते हैं, और पापी को यमदूत।

इस भाग की सीख

  • मृत्यु सबकी निश्चित है; इसलिए उसकी तैयारी जीवन भर अच्छे कर्मों से करनी चाहिए।
  • अन्त समय में शान्ति, भगवान का नाम और परिवार का साथ, यही सबसे बड़ी सेवा है।
  • दान और भक्ति ही अन्तिम यात्रा के साथी हैं।

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