युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड): लंका का युद्ध
नागपाश और कुम्भकर्ण वध
मेघनाद राम-लक्ष्मण को नागपाश में बाँधता है और गरुड़ उन्हें मुक्त करते हैं। राम थके हुए रावण को छोड़ देते हैं। कुम्भकर्ण जगाया जाता है, सच कहता है और मारा जाता है।
पहले दिन का युद्ध रात तक चला। अँधेरे में "तू राक्षस है?" "तू वानर है?" पूछ-पूछकर प्रहार होते रहे। अंगद ने मेघनाद का रथ तोड़ दिया और उसके घोड़े मार डाले।
नागपाश
मेघनाद ने तब अपनी माया का सहारा लिया। वह अदृश्य हो गया और आकाश से ऐसे बाण बरसाने लगा जो वास्तव में साँप थे। वे राम और लक्ष्मण के शरीर में लिपट गए, अंग-अंग में धँस गए। दोनों भाई रक्त में सने भूमि पर गिर पड़े। वानर-सेना में हाहाकार मच गया।
मेघनाद ने लंका लौटकर पिता से कहा, "दोनों मारे गए।" रावण ने उसे गले लगाया और एक और क्रूरता की: उसने राक्षसियों से कहा, "सीता को पुष्पक विमान में बैठाकर रणभूमि दिखा लाओ। अपनी आँखों से देख लेगी तो मेरे पास आ जाएगी।"
सीता ने ऊपर से दोनों भाइयों को बाणों की शय्या पर निश्चल पड़े देखा। वे रो पड़ीं: "ज्योतिषियों ने कहा था कि मैं कभी विधवा नहीं होऊँगी। वे सब झूठे निकले।" त्रिजटा ने उन्हें थामा: "देवी, ध्यान से देखो। इनके मुख पर अब भी कान्ति है। मरे हुओं के मुख ऐसे नहीं होते। और यदि स्वामी मारे गए होते तो यह सेना भाग गई होती। यह दिव्य विमान विधवा को बैठाता ही नहीं।"
राम को पहले होश आया। उन्होंने लक्ष्मण को देखा और विलाप करने लगे: "सीता मिल भी जाएँ तो मैं क्या करूँगा? जो भाई मेरे पीछे वन आया, उसके बिना मैं अयोध्या नहीं लौटूँगा।"
तभी तेज़ हवा चली, समुद्र उछल पड़ा और आकाश में एक विशाल पक्षी दिखा। वे गरुड़ थे। उनके आते ही साँप बाणों का रूप छोड़कर भाग गए। गरुड़ ने दोनों के शरीर पर हाथ फेरा। घाव भर गए और बल दूना हो गया। "राम, मैं तुम्हारा मित्र हूँ। कारण मत पूछना; युद्ध के बाद जान जाओगे।" वे उड़ गए।
रावण को जीवन-दान
अगले दिन धूम्राक्ष मारा गया, फिर वज्रदंष्ट्र, अकम्पन, और रावण का सेनापति प्रहस्त। तब रावण स्वयं रणभूमि में आया। राम ने उसे देखा और सराहा: "कैसा तेज है! सूर्य की तरह इसे देखना कठिन है।"
रावण ने सुग्रीव को घायल किया, हनुमान को थप्पड़ से डिगा दिया, नील को बाण मारा, और लक्ष्मण को ब्रह्मा की दी हुई शक्ति से मूर्छित कर दिया। उसने लक्ष्मण को उठाना चाहा और उठा न सका। हनुमान ने उसकी छाती पर घूँसा मारा और लक्ष्मण को गोद में उठाकर ले गए।
तब राम हनुमान के कन्धे पर बैठकर आए। उनके बाणों ने रावण का रथ तोड़ा, घोड़े मारे, ध्वजा गिराई, और अन्त में उसका मुकुट काटकर धूल में गिरा दिया। रावण का धनुष हाथ से छूट गया।
राम ने बाण नहीं छोड़ा। "रावण, तुमने आज बड़ा युद्ध किया है। तुम थक गए हो, इसलिए मैं तुम्हें नहीं मारता। जाओ, विश्राम करो। कल रथ और धनुष लेकर आना, तब मेरा बल देखना।"
रावण सिर झुकाए लंका लौटा। जीवन में पहली बार उसे किसी ने दया करके छोड़ा था।
कुम्भकर्ण
उसने आज्ञा दी: "कुम्भकर्ण को जगाओ।"
कुम्भकर्ण उसका छोटा भाई था, पहाड़ जैसा, और ब्रह्मा के वर से छह महीने सोता था। उसे जगाना सरल नहीं था। राक्षसों ने उसके सामने मांस के पहाड़ और रक्त के घड़े रखे, शंख फूँके, नगाड़े पीटे, उसे मूसलों से मारा। अन्त में हज़ार हाथी उसके शरीर पर दौड़ाए गए। तब उसने जँभाई ली।
खा-पीकर वह भाई के पास गया और सारी बात सुनी। फिर उसने वह कहा जिसकी रावण को आशा नहीं थी:
"भैया, जो काम करने से पहले सोचना चाहिए था, उसे आपने बिना सोचे किया। जो मंत्री आपको प्रिय लगने वाली बात कहते रहे, उन्होंने आपको यहाँ पहुँचाया। विभीषण ने जो कहा था, वही हित की बात थी।"
रावण तमतमा गया: "मैंने तुम्हें उपदेश के लिए नहीं जगाया। जो हो गया, सो हो गया। अब भाई का धर्म निभाओ।"
कुम्भकर्ण ने देखा कि भाई दुखी है। उसका स्वर नरम हो गया: "चिन्ता मत कीजिए। जो कहना था, मैंने भाई के नाते कह दिया। अब जो करना है, वह भी भाई के नाते करूँगा। आज आप राम का सिर देखेंगे, या मुझे नहीं देखेंगे।"
वह परकोटा लाँघकर निकला तो वानर-सेना भाग खड़ी हुई। अंगद ने उन्हें ललकारकर लौटाया। कुम्भकर्ण वानरों को मुट्ठियों में भरकर मुँह में डालता जाता था। उसने हनुमान को घायल किया और सुग्रीव को बेहोश करके बगल में दबाए लंका की ओर चल दिया। सुग्रीव को होश आया, उन्होंने उसके कान और नाक नोच लिए और छूटकर लौट आए।
घायल कुम्भकर्ण और भयानक हो गया। अब वह अपने-पराए का भेद भूलकर वानरों और राक्षसों, दोनों को खाने लगा। तब राम सामने आए। उन्होंने वायव्य अस्त्र से उसकी एक भुजा काटी, दूसरे बाण से दूसरी। दो अर्धचन्द्र बाणों से दोनों पाँव काट दिए। फिर भी वह मुँह फैलाए लुढ़कता हुआ आया। राम ने इन्द्र का दिया बाण छोड़ा, और उसका सिर लंका के द्वार पर जा गिरा।
कुम्भकर्ण जानता था कि भाई अधर्म पर है, और उसने यह मुँह पर कह भी दिया। फिर वह उसी के लिए लड़कर मरा। विभीषण ने भी सच कहा था, और वे धर्म के पक्ष में चले गए थे। रामायण दोनों को याद रखती है, और किसी को कायर नहीं कहती।
अंतिम अद्यतन:
आगे पढ़ें
विभीषण: कुल से ऊपर धर्म
रावण के भाई विभीषण ने सीता को लौटाने की सलाह दी, निकाले गए, श्रीराम की शरण ली और लंका के धर्मनिष्ठ राजा बने।
जटायु: रावण से लड़ने वाले गिद्धराज
दशरथ के मित्र, वृद्ध गिद्धराज जटायु ने सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध किया और श्रीराम की गोद में प्राण त्यागे। असम्भव के विरुद्ध साहस की कथा।
शबरी: जीवन भर की प्रतीक्षा
वृद्धा वनवासी भक्त शबरी ने दशकों अपने आश्रम में श्रीराम की प्रतीक्षा की और उन्हें बेर अर्पित किए। उनकी कथा और नवधा भक्ति।
सच्ची मित्रता: गुह, सुग्रीव और विभीषण
श्रीराम ने निषादराज, निर्वासित वानर और शत्रु के भाई को मित्र बनाया। रामायण के अनुसार मित्र कौन है और मित्र का कर्तव्य क्या है।
विनम्रता और सेवा: हनुमान का मार्ग
हनुमान ने समुद्र लाँघा, लंका जलाई और पर्वत उठाया, और किसी का श्रेय नहीं लिया। बल, कर्म और अहंकार पर उनके उदाहरण की सीख।
सीता की गरिमा और दृढ़ता
सीता ने वन चुना, वर्ष भर अकेले रावण का सामना किया, अकेले दो पुत्रों को पाला और अपनी शर्त पर विदा हुईं। आन्तरिक शक्ति पर उनके जीवन की सीख।