युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड): लंका का युद्ध
समुद्र पर सेतु-बन्धन
राम तीन दिन समुद्र से प्रार्थना करते हैं, फिर धनुष उठाते हैं। समुद्र प्रकट होता है, नल पाँच दिन में सेतु बाँधते हैं और सेना लंका पहुँचती है।
अब प्रश्न वही था: सौ योजन का समुद्र कैसे पार हो? हनुमान जैसे दो-चार वीर लाँघ सकते थे, पर पूरी सेना नहीं।
विभीषण ने सलाह दी: "राम, समुद्र आपके पूर्वजों का ऋणी है। सगर के पुत्रों ने इसे खोदा था। आप इससे मार्ग माँगिए। यह अवश्य कोई उपाय बताएगा।" राम को यह धर्म की बात लगी।
तीन दिन की प्रार्थना
राम ने तट पर कुश बिछाया, पूर्व की ओर मुँह किया और अपनी भुजा को तकिया बनाकर लेट गए। उन्होंने प्रण किया: "या तो समुद्र मार्ग देगा, या मैं यहीं प्राण दे दूँगा।" तीन दिन और तीन रात वे बिना अन्न-जल के पड़े रहे और समुद्र की उपासना करते रहे।
समुद्र नहीं आया।
चौथे दिन राम की आँखें लाल हो गईं। "लक्ष्मण, देखो इस समुद्र का घमण्ड। संसार में शान्ति, क्षमा और मीठी वाणी को लोग दुर्बलता समझ लेते हैं। जो अपनी बड़ाई करे, धृष्ट हो, सब पर दण्ड चलाए, उसी का लोग आदर करते हैं। विनय से न यश मिलता है, न विजय। मेरा धनुष लाओ। आज मैं इस समुद्र को सुखा दूँगा, और वानर पैदल पार जाएँगे।"
उन्होंने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और बाण छोड़े। समुद्र में आग जैसी लपटें उठीं। मगर और साँप व्याकुल हो गए। फिर राम ने ब्रह्मास्त्र सँभाला। आकाश में अँधेरा छा गया, पर्वत काँप उठे। लक्ष्मण ने दौड़कर उनका हाथ पकड़ लिया: "भैया, बस।"
समुद्र प्रकट हुआ
तभी लहरों के बीच से समुद्र स्वयं निकला, जैसे उदयाचल से सूर्य निकलता है: श्याम वर्ण, गले में मोतियों की माला, गंगा और सिन्धु जैसी नदियाँ साथ में।
उसने हाथ जोड़े: "राम, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि, ये अपने स्वभाव पर टिके रहते हैं। अगाध होना मेरा स्वभाव है। मैं न लोभ से, न भय से उसे छोड़ सकता हूँ। पर मैं उपाय बताता हूँ। आपकी सेना में नल नाम का वानर है। वह विश्वकर्मा का पुत्र है, और उसे पिता से वर मिला है। वह मुझ पर सेतु बाँधे। जो कुछ वह जल में डालेगा, उसे मैं धारण करूँगा।"
राम ने पूछा, "यह बाण अब व्यर्थ नहीं जा सकता। इसे कहाँ छोड़ूँ?" समुद्र ने उत्तर दिशा का एक स्थान बताया जहाँ लुटेरे उसका जल दूषित करते थे। बाण वहाँ गिरा।
पाँच दिन
नल उठे: "समुद्र ने सच कहा है। मैंने कभी अपनी बड़ाई नहीं की, पर मैं यह कर सकता हूँ।"
फिर वह दृश्य आरम्भ हुआ जिसे देखने देवता आकाश में ठहर गए। लाखों वानर और भालू वन में दौड़ पड़े। कोई साल का वृक्ष उखाड़ लाया, कोई ताड़ का, कोई पूरी चट्टान। हाथी जितनी शिलाएँ यंत्रों से खींची गईं। नल उन्हें नाप-नापकर जल में जमाते गए। कुछ वानर रस्सियाँ पकड़े सीध दिखाते, कुछ नापने के डण्डे लिए खड़े रहते।
वाल्मीकि ने हर दिन का हिसाब लिखा है। पहले दिन चौदह योजन। दूसरे दिन बीस। तीसरे दिन इक्कीस। चौथे दिन बाईस। पाँचवें दिन तेईस। पाँच दिन में सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा सेतु तैयार हो गया। ऊपर से वह समुद्र के बीच में निकली माँग जैसा दिखता था।
गिलहरी
लोक में यहाँ एक छोटी-सी कथा कही जाती है जो वाल्मीकि में नहीं है, पर जिसे कोई भूलना नहीं चाहता। एक गिलहरी भी इस काम में लगी थी। वह रेत में लोटती, फिर सेतु पर जाकर अपना शरीर झाड़ आती। वानर हँसे: "तू क्या कर लेगी?" राम ने उसे हथेली पर उठा लिया और उसकी पीठ पर तीन उँगलियाँ फेरीं। कहते हैं, गिलहरी की पीठ की तीन धारियाँ वही हैं। कोई काम छोटा नहीं होता, यदि वह पूरे मन से किया जाए।
दक्षिण भारत की परम्परा यह भी कहती है कि सेतु बाँधने से पहले राम ने समुद्र-तट पर शिवलिंग की स्थापना करके पूजा की। वही स्थान रामेश्वरम् है।
उस पार
सेना सेतु पर चढ़ी। आगे विभीषण अपने मंत्रियों के साथ गदा लिए चले, कि कहीं शत्रु बीच में न आ जाए। राम हनुमान के कन्धे पर और लक्ष्मण अंगद के कन्धे पर थे। कुछ वानर सेतु पर चले, कुछ तैरे, कुछ उछलते हुए गए।
लंका के तट पर उतरकर राम ने सेना को व्यूह में खड़ा किया और त्रिकूट पर्वत की चोटी पर बसी नगरी को देखा। वह ऐसी लगती थी जैसे आकाश में टँगी हो।
"लक्ष्मण," उन्होंने कहा, "इसी नगरी में सीता हैं।"
अंतिम अद्यतन:
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