पंचवटी, शूर्पणखा और खर-दूषण वध
पंचवटी में जटायु मित्र बनते हैं। रावण की बहन शूर्पणखा सीता पर झपटती है और दण्ड पाती है, और राम अकेले खर की चौदह हज़ार की सेना का संहार करते हैं।
पंचवटी के मार्ग में एक विशाल बरगद पर एक बहुत बड़ा गिद्ध बैठा था। राम ने उसे राक्षस समझा। गिद्ध ने मधुर वाणी में कहा, "वत्स, मैं जटायु हूँ, तुम्हारे पिता दशरथ का मित्र। तुम चाहो तो मैं यहीं तुम्हारे पास रहूँगा। जब तुम और लक्ष्मण बाहर जाओगे, मैं सीता की रक्षा करूँगा।" राम ने उन्हें प्रणाम किया और गले लगा लिया।
पंचवटी सचमुच सुन्दर थी: गोदावरी का निर्मल जल, कमलों से भरा सरोवर, फलों से लदे वृक्ष। लक्ष्मण ने मिट्टी की दीवारें उठाईं, बाँस के खम्भे लगाए और ऊपर घास-पत्तों की छत डाली। राम ने कुटिया देखी तो लक्ष्मण को छाती से लगा लिया: "तुमने मेरे मन की बात जान ली। आज मुझे लगता है कि पिताजी गए नहीं, तुम्हारे रूप में मेरे साथ हैं।"
यहाँ तीनों के दिन बहुत सुख से बीते। हेमन्त ऋतु आई। एक सुबह गोदावरी में स्नान करके वे कुटिया में बैठे कथा-वार्ता कर रहे थे।
शूर्पणखा
तभी वहाँ एक राक्षसी आई। वह लंका के राजा रावण की बहन शूर्पणखा थी। राम को देखकर वह मोहित हो गई। उसने कहा, "मैं रावण की बहन हूँ। इस दुबली मानवी को छोड़ो और मुझसे विवाह करो।"
राम को हँसी सूझी। बोले, "देवी, मेरा तो विवाह हो चुका है। मेरे छोटे भाई के पास जाओ।" लक्ष्मण ने भी हँसकर कहा, "मैं तो इनका दास हूँ। दास की पत्नी बनकर क्या करोगी?" शूर्पणखा ने समझा कि सीता ही उसकी राह का काँटा हैं। वह अपना असली भयानक रूप धरकर सीता को खाने दौड़ी।
राम ने सीता को ओट में लिया और कहा, "लक्ष्मण, क्रूर के साथ हँसी नहीं करनी चाहिए थी। इसे दण्ड दो।" लक्ष्मण ने तलवार से उसके नाक और कान काट दिए। वह चीख़ती हुई वन में भागी।
खर और दूषण
पास के जनस्थान में उसका भाई खर चौदह हज़ार राक्षसों की सेना के साथ रहता था। शूर्पणखा लहू में सनी उसके सामने जा गिरी। खर ने पहले चौदह राक्षस भेजे। राम ने चौदह बाणों से उन्हें गिरा दिया। तब खर अपने सेनापति दूषण और त्रिशिरा के साथ पूरी सेना लेकर चला।
राम ने आकाश में अपशकुन देखे और लक्ष्मण से कहा, "सीता को लेकर उस गुफा में चले जाओ और वहीं रहो। मैं अकेला इनसे निपटूँगा। यह मेरी शपथ है, बहस मत करना।"
फिर जो हुआ, उसे देखने देवता और ऋषि आकाश में इकट्ठे हो गए। एक ओर चौदह हज़ार, दूसरी ओर एक। राक्षसों ने शूल, गदा और पत्थरों की वर्षा की। राम के शरीर से रक्त बहने लगा, पर उनके धनुष से बाण ऐसे छूटते थे कि कब निकाला और कब छोड़ा, दिखता ही नहीं था। दूषण गिरा। त्रिशिरा गिरा। खर ने राम का कवच तोड़ दिया। तब राम ने वही धनुष उठाया जो अगस्त्य ने दिया था, और खर का अन्त हो गया। यह सब लगभग डेढ़ घण्टे में हो गया।
ऋषियों ने कहा, "राम, इसी काम के लिए हम तुम्हें यहाँ लाए थे।" सीता गुफा से दौड़ी आईं और पति को गले लगा लिया।
समाचार लंका पहुँचा
उस सेना में से अकम्पन नाम का एक राक्षस बच निकला। और शूर्पणखा स्वयं लंका पहुँची। भरी सभा में उसने भाई को धिक्कारा: "तुम भोग-विलास में डूबे हो, और तुम्हारे गुप्तचर सोए हुए हैं। एक मनुष्य ने अकेले जनस्थान उजाड़ दिया।" फिर उसने वह बात कही जो रावण के मन में उतर गई: "उसकी पत्नी सीता जैसी स्त्री मैंने तीनों लोकों में नहीं देखी। वह तुम्हारे योग्य है। उसे हर लाओ, राम अपने आप मर जाएगा।"
रावण चुपचाप उठा और अपने रथ की ओर चल दिया।
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