अयोध्या दीपोत्सव: दीपों का महापर्व
दीपावली की पूर्व संध्या पर अयोध्या का दीपोत्सव राम की पैड़ी पर लाखों दीपों से श्रीराम की वापसी को फिर जीता है। अर्थ, कार्यक्रम और कैसे सम्मिलित हों।
यह किसका उत्सव है
दीपावली मूल रूप से अयोध्या का अपना पर्व है। जब श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास और लंका के युद्ध के बाद लौटे, तब युद्धकाण्ड के अनुसार प्रजा ने नगरी सजाई और उनके स्वागत में दीपों की पंक्तियाँ जलाईं। संसार में कहीं भी जलने वाला दीपावली का हर दीप उसी रात की स्मृति है। दीपोत्सव में वही नगरी उसी भूमि पर उस रात को फिर जीती है।
क्या होता है
वर्तमान भव्य स्वरूप में दीपोत्सव 2017 से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दीपावली की पूर्व संध्या पर आयोजित होता है।
- दीप। हज़ारों स्वयंसेवक, जिनमें बहुत-से विद्यार्थी होते हैं, राम की पैड़ी और आसपास के घाटों की हर सीढ़ी पर मिट्टी के दीये सजाते हैं, तेल भरते हैं और संध्या को एक साथ जलाते हैं। संख्या हर वर्ष बढ़ी है और बीस लाख के पार जा चुकी है, जिससे बार-बार दीपों के सबसे बड़े प्रदर्शन का विश्व कीर्तिमान बना है।
- घर-वापसी। राम, सीता और लक्ष्मण का स्वरूप धारण किए कलाकार प्रतीकात्मक "पुष्पक विमान" से आते हैं और उनका वैसा ही स्वागत होता है जैसा अयोध्यावासियों ने किया था, फिर प्रतीकात्मक राज्याभिषेक होता है।
- शोभायात्रा। दिन में रामायण के प्रसंगों की झाँकियाँ नगर से निकलती हैं।
- रामलीला और संस्कृति। भारत के विभिन्न राज्यों और उन देशों की मण्डलियाँ प्रस्तुति देती हैं जिनकी अपनी रामायण परम्परा है।
- सरयू आरती, लेज़र शो और आतिशबाज़ी से संध्या का समापन होता है।
अर्थ
एक दीप छोटा है; अन्धकार तभी हटता है जब बहुत-से साथ जलें। अयोध्यावासियों ने चौदह वर्ष प्रतीक्षा की थी, जब शासन पादुकाओं के नाम पर चला। यह पर्व निष्ठापूर्ण प्रतीक्षा के फल का है, और अच्छे शासक के लौटने पर समाज के आनन्द का। पढ़ें रामराज्य: सेवा के रूप में नेतृत्व।
कैसे सम्मिलित हों
- तिथि चान्द्र पंचांग से तय होती है; अपने वर्ष की तिथि देखें और कमरे एक माह या उससे पहले बुक करें।
- घाटों पर प्रवेश नियंत्रित रहता है, कुछ क्षेत्रों के लिए अलग दीर्घाएँ और पास होते हैं। सार्वजनिक दर्शन-स्थलों के लिए जिला प्रशासन की घोषणाएँ देखें।
- वाहन क्षेत्र से काफ़ी बाहर रोक दिए जाते हैं। अपराह्न तक पहुँच जाएँ, आरामदायक जूते पहनें और पैदल चलने को तैयार रहें।
- दीप सूर्यास्त के आसपास जलाए जाते हैं और एक-दो घंटे जलते हैं। मंदिरों सहित नगर का बड़ा भाग रोशन रहता है, इसलिए मुख्य स्थल से दूर भी बहुत कुछ देखने को है।
- बच्चों को पास रखें, मिलने का स्थान तय करें, और ढीले वस्त्रों में दीपों और खुली लौ के पास सावधान रहें।
- दीपावली और उसके बाद के दिनों के लिए रुकें, जो कार्तिक परिक्रमा तक ले जाते हैं।
यह भी देखें: श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा सुझाव।
समय, प्रवेश नियम, मार्ग और दरें बदलती रहती हैं, विशेषकर पर्वों पर। यात्रा से पहले मंदिर, जिला प्रशासन या सेवा प्रदाता से पुष्टि अवश्य करें।
अंतिम अद्यतन:
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