विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में
विष्णु पुराण द्वितीय अंश: सात द्वीप, भारतवर्ष की महिमा, सूर्य-रथ और जड़भरत
विष्णु पुराण का दूसरा अंश (16 अध्याय): सात द्वीप और सात समुद्र, भारतवर्ष की महिमा, पाताल और नरक, सूर्य का रथ और ग्रह, जड़भरत की कथा और ऋभु-निदाघ संवाद।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।दूसरा अंश पुराणों के भूगोल और खगोल का वर्णन करता है: पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, लोक और ग्रह। इसे आधुनिक मानचित्र की तरह नहीं, एक प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक संसार-चित्र की तरह पढ़ना चाहिए। अंश के अन्त में जड़भरत की कथा है, जो पूरे पुराण की सबसे गहरी ज्ञान-कथाओं में से एक है।
अध्याय 1: प्रियव्रत और सात द्वीप
स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत ने पृथ्वी को सात द्वीपों में बाँटकर अपने सात पुत्रों को दिया। ये सात द्वीप हैं: जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। हर द्वीप एक-एक समुद्र से घिरा है: खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दही, दूध और मीठे जल का समुद्र।
अध्याय 2: जम्बूद्वीप और मेरु
जम्बूद्वीप सबसे बीच में है, और उसके केन्द्र में सोने का मेरु पर्वत है। जम्बूद्वीप में नौ वर्ष (क्षेत्र) हैं, जिनमें से एक भारतवर्ष है। मेरु के चारों ओर पर्वत, वन, सरोवर और देवताओं के नगर हैं।
अध्याय 3: भारतवर्ष की महिमा
समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश है, वह भारतवर्ष है, जहाँ भरत की सन्तान रहती है। इसमें सात कुल पर्वत (महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विन्ध्य, पारियात्र) और गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, सिन्धु आदि अनेक नदियाँ हैं। भारतवर्ष को कर्मभूमि कहा गया है: यहीं कर्म करके स्वर्ग या मोक्ष पाया जा सकता है; अन्य लोक केवल भोगभूमि हैं।
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ (2.3.24)
अर्थ: देवता भी गीत गाते हैं: धन्य हैं वे लोग जो भारत भूमि में जन्म लेते हैं, जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों का मार्ग है; देवता भी देवत्व छोड़कर फिर यहाँ मनुष्य बनकर जन्म लेना चाहते हैं।
अध्याय 4: अन्य द्वीप
प्लक्ष से पुष्कर तक के द्वीपों का वर्णन है: वहाँ के लोग, उनकी आयु, उनके उपास्य देव और उनके पर्वत-नदियाँ। सबसे बाहर लोकालोक पर्वत है, जिसके पार अन्धकार है।
अध्याय 5 और 6: पाताल और नरक
पृथ्वी के नीचे सात पाताल लोक हैं: अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल और पाताल, जहाँ दैत्य, दानव और नाग सुन्दर नगरों में रहते हैं। उनके भी नीचे शेषनाग (अनन्त) हैं, जो पृथ्वी को अपने फन पर धारण करते हैं और जिनके गुण गाते हुए कोई अन्त नहीं पाता।
फिर नरकों का वर्णन है: रौरव, सूकर, ताल, तप्तकुम्भ आदि, और बताया गया है कि कौन-से पाप किस नरक की ओर ले जाते हैं। साथ ही यह आशा का सन्देश है: पाप के बाद सच्चा पश्चात्ताप और भगवान का स्मरण सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है। "हरि का स्मरण" सब प्रायश्चित्तों में श्रेष्ठ बताया गया है।
अध्याय 7: ऊपर के लोक
पृथ्वी (भूलोक) के ऊपर भुवर्लोक (पृथ्वी और सूर्य के बीच), स्वर्लोक (सूर्य से ध्रुव तक), फिर महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) हैं। ये सब मिलकर ब्रह्माण्ड बनाते हैं, जो सब ओर से तत्त्वों के आवरणों से ढका है।
अध्याय 8 से 12: सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह
सूर्य का रथ एक पहिए का है, जिसमें सात घोड़े (सात छन्द) जुते हैं, और उसके साथ हर महीने अलग-अलग आदित्य, ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, नाग और राक्षस चलते हैं। सूर्य की गति से दिन-रात, उत्तरायण-दक्षिणायन और ऋतुएँ होती हैं। चन्द्रमा का रथ, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, राहु और केतु के रथों का भी वर्णन है।
आकाश में एक शिशुमार (मगरमच्छ/डॉल्फ़िन) के आकार का नक्षत्र-चक्र बताया गया है, जिसकी पूँछ पर ध्रुव है, और यह सब भगवान विष्णु का ही रूप है। जो इस शिशुमार चक्र का दर्शन और ध्यान करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं।
अध्याय 13 से 16: जड़भरत की कथा
ऋषभदेव के पुत्र राजा भरत (जिनके नाम पर भारतवर्ष है) ने राज्य छोड़कर शालग्राम तीर्थ में तप किया। एक दिन नदी में एक गर्भवती हिरणी सिंह की गर्जना से डरकर कूदी, उसका बच्चा जल में गिर गया और हिरणी मर गई। दयालु भरत उस हिरण के बच्चे को आश्रम ले आए और पालने लगे। धीरे-धीरे उनका सारा ध्यान उसी में लग गया, और मरते समय भी वे उसी हिरण का चिन्तन कर रहे थे। अन्त समय के चिन्तन के कारण अगले जन्म में वे हिरण बने, पर पिछले जन्म की स्मृति बनी रही, और वे उस जन्म में भी विरक्त रहे।
अगले जन्म में वे एक ब्राह्मण के घर जन्मे। पिछली भूल याद रखते हुए उन्होंने किसी से आसक्ति न हो, इसलिए जड़ (मूर्ख, गूँगे) जैसा व्यवहार किया; इसलिए "जड़भरत" कहलाए। एक बार सौवीर देश के राजा की पालकी उठाने के लिए उन्हें बेगार में पकड़ा गया। वे चलते हुए छोटे जीवों को बचाने के लिए रुक-रुककर चलते, जिससे पालकी हिलती। राजा ने डाँटा: क्या तुम थक गए हो? तुम्हारा शरीर तो मोटा-ताज़ा है।
तब जड़भरत ने उत्तर दिया: पालकी न मैं उठा रहा हूँ, न तुम बैठे हो। पालकी लकड़ी की है, उसे कन्धे उठा रहे हैं, कन्धे शरीर पर हैं, शरीर पैरों पर, पैर पृथ्वी पर। "मैं" तो आत्मा हूँ, जो न थकता है, न बोझ उठाता है। राजा चकित होकर पालकी से उतरा और उनके चरणों में गिरकर ज्ञान माँगा। जड़भरत ने उसे आत्मा और परमात्मा का ज्ञान दिया।
ऋभु और निदाघ का संवाद: उपदेश के अन्त में जड़भरत ने ऋभु और उनके शिष्य निदाघ की कथा सुनाई। ऋभु ने निदाघ को समझाया कि "मैं" और "तुम", "राजा" और "हाथी", सब भेद अज्ञान से हैं; एक ही आत्मा सबमें है। जब निदाघ ने यह जान लिया, तो वह सब प्राणियों को अपने समान देखने लगा।
इस अंश की सीख
- भारत भूमि कर्मभूमि है; यहाँ जन्म अपने आप में बड़ा अवसर है, इसे व्यर्थ न जाने दें।
- पूरा ब्रह्माण्ड, सूर्य से ध्रुव तक, एक ही ईश्वर का रूप है।
- दया अच्छी है, पर आसक्ति बन्धन है; भरत की कथा यही दिखाती है।
- हम शरीर नहीं, आत्मा हैं; यह समझ घमण्ड और भेदभाव दोनों मिटाती है।
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