विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में
विष्णु पुराण तृतीय अंश: मन्वन्तर, वेद विभाजन, वर्णाश्रम धर्म, सदाचार और श्राद्ध
विष्णु पुराण का तीसरा अंश (18 अध्याय): चौदह मनु, व्यास परम्परा और वेदों का विभाजन, यमराज का अपने दूतों को उपदेश, आश्रम धर्म, सदाचार और श्राद्ध की विधि।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।तीसरा अंश समय, ज्ञान और आचरण पर है: ब्रह्मा के एक दिन में कितने मनु होते हैं, वेदों का ज्ञान कैसे विभाजित हुआ, और एक मनुष्य को जीवन के हर पड़ाव पर कैसे जीना चाहिए।
अध्याय 1 और 2: चौदह मन्वन्तर
ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं, और हर मनु का काल "मन्वन्तर" कहलाता है। हर मन्वन्तर में अलग इन्द्र, अलग सप्तर्षि, अलग देवगण होते हैं, और भगवान विष्णु किसी रूप में धर्म की रक्षा करते हैं।
बीते छह मनु: स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष। वर्तमान सातवें मनु वैवस्वत (सूर्य के पुत्र) हैं, जिनके वंश में इक्ष्वाकु और श्रीराम हुए। आगे आने वाले सात मनु: सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, रौच्य (देवसावर्णि) और भौत्य (इन्द्रसावर्णि)।
अध्याय 3 से 6: व्यास परम्परा और वेदों का विभाजन
हर द्वापर युग में एक व्यास होते हैं जो एक वेद को चार भागों में बाँटते हैं, ताकि कम आयु और कम सामर्थ्य वाले लोग उसे पढ़ सकें। इस मन्वन्तर में अट्ठाईस व्यास हुए; अट्ठाईसवें कृष्ण द्वैपायन व्यास हैं, जो पराशर जी के पुत्र हैं।
वेदव्यास जी ने वेदों को इस प्रकार बाँटा:
- ऋग्वेद पैल को।
- यजुर्वेद वैशम्पायन को।
- सामवेद जैमिनि को।
- अथर्ववेद सुमन्तु को।
- इतिहास और पुराण रोमहर्षण (सूत जी) को।
याज्ञवल्क्य की कथा: वैशम्पायन जी के शिष्य याज्ञवल्क्य ने गुरु से विवाद के बाद, गुरु की आज्ञा से, सीखा हुआ यजुर्वेद उगल दिया। दूसरे शिष्यों ने तीतर बनकर उसे ग्रहण किया, इसलिए वह भाग "तैत्तिरीय" (कृष्ण यजुर्वेद) कहलाया। फिर याज्ञवल्क्य ने सूर्य की उपासना की, और सूर्य ने घोड़े (वाजी) के रूप में उन्हें नया यजुर्वेद दिया, जो "वाजसनेयी" या शुक्ल यजुर्वेद कहलाया।
अध्याय 7: यम गीता
भीष्म जी ने नकुल को बताया कि एक बार यमराज ने अपने दूतों से कहा: जो लोग भगवान विष्णु के भक्त हैं, उनके पास मत जाना; मैं सबका स्वामी हूँ, पर विष्णु भक्तों का नहीं। विष्णु भक्त कौन है? जो अपने धर्म से विचलित नहीं होता, मित्र-शत्रु में सम है, किसी का धन नहीं छीनता, किसी को नहीं सताता, जिसका मन शुद्ध है, जो झूठ नहीं बोलता और सबमें भगवान को देखता है। ऐसे व्यक्ति को यमदूत दूर से ही प्रणाम करें।
अध्याय 8 से 10: वर्ण और आश्रम धर्म
भगवान की आराधना का सबसे बड़ा उपाय है अपने धर्म का पालन। हर वर्ण के कर्तव्य बताए गए, और जीवन के चार आश्रम:
- ब्रह्मचर्य: गुरु के पास रहकर संयम से विद्या प्राप्त करना।
- गृहस्थ: विवाह करके परिवार चलाना, अतिथि सत्कार, दान, और सब आश्रमों का पालन करना। गृहस्थ को सबसे महत्त्वपूर्ण आश्रम कहा गया, क्योंकि बाकी सब उसी पर निर्भर हैं।
- वानप्रस्थ: सन्तान के बड़े होने पर धीरे-धीरे विषयों से हटकर साधना की ओर जाना।
- संन्यास: सब आसक्ति छोड़कर भगवान में मन लगाना।
बच्चे के जन्म से विवाह तक के संस्कारों और विवाह के प्रकारों का भी वर्णन है।
अध्याय 11 और 12: सदाचार
गृहस्थ के दैनिक आचरण पर विस्तार से बताया गया:
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान का स्मरण करना।
- शौच, स्नान, सन्ध्या वन्दन और देव पूजा।
- पाँच महायज्ञ: वेद पढ़ना (ब्रह्म यज्ञ), पितरों को जल देना (पितृ यज्ञ), हवन (देव यज्ञ), प्राणियों को अन्न देना (भूत यज्ञ) और अतिथि सत्कार (मनुष्य यज्ञ)।
- अतिथि को कभी खाली हाथ न लौटाना; अतिथि में भगवान का रूप देखना।
- सत्य और प्रिय बोलना, किसी की निन्दा न करना, गुरुजनों का आदर करना, मर्यादित भोजन करना।
अध्याय 13 से 16: श्राद्ध
पितरों के लिए श्राद्ध का महत्त्व, समय और विधि बताई गई: अमावस्या, पितृ पक्ष, और जन्म-मृत्यु के अवसरों पर। श्राद्ध में श्रद्धा सबसे प्रधान है (इसीलिए उसका नाम श्राद्ध है)। यदि सामर्थ्य न हो, तो पितरों के नाम से जल, तिल और प्रार्थना, या केवल गाय को घास खिलाना भी पर्याप्त है। विष्णु पुराण में एक सुन्दर प्रसंग है: जिसके पास कुछ न हो, वह निर्जन स्थान में दोनों हाथ उठाकर पितरों से कहे कि मेरे पास न धन है, न अन्न; मैं केवल श्रद्धा और भक्ति से आपको प्रणाम करता हूँ, आप तृप्त हों।
अध्याय 17 और 18: मायामोह और शतधनु की कथा
देवता असुरों से हार रहे थे, क्योंकि असुर वेद-धर्म का पालन कर रहे थे। विष्णु जी ने अपने शरीर से मायामोह को प्रकट किया, जिसने असुरों को वेद-विरोधी तर्क सिखाकर धर्म से भटका दिया, और वे दुर्बल हो गए। यह कथा बताती है कि धर्म ही बल है, और जो उसे छोड़ते हैं, वे अपने आप दुर्बल हो जाते हैं।
अन्त में राजा शतधनु और उनकी पत्नी शैब्या की कथा है। एक बार स्नान के बाद राजा ने एक पाखण्डी से बात कर ली, जबकि रानी ने उससे मुँह फेर लिया। इसके कारण राजा को अगले कई जन्म पशु योनियों में बिताने पड़े, और पतिव्रता रानी ने हर जन्म में उन्हें स्मरण दिलाकर उनका उद्धार किया। सन्देश: धर्म-विरोधी संगति से बचना चाहिए, और जीवन-साथी एक-दूसरे का उद्धार कर सकते हैं।
इस अंश की सीख
- ज्ञान को समय के अनुसार सरल रूप में बाँटना भी ईश्वर का काम है; व्यास जी ने वेदों को बाँटा ताकि सब पढ़ सकें।
- सच्चे भक्त से यमराज भी डरते हैं; भक्त की पहचान उसका आचरण है।
- गृहस्थ आश्रम सबका आधार है; अतिथि सत्कार और दान गृहस्थ का धर्म है।
- श्राद्ध में धन नहीं, श्रद्धा प्रधान है; खाली हाथ भी प्रणाम पितरों तक पहुँचता है।
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