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ग्रन्थ अध्याय

विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में

विष्णु पुराण प्रथम अंश: सृष्टि, समुद्र मन्थन, ध्रुव चरित और प्रह्लाद कथा

विष्णु पुराण का पहला अंश (22 अध्याय): मैत्रेय का प्रश्न, पराशर जी को पुराण कैसे मिला, विष्णु से सृष्टि, वराह अवतार, लक्ष्मी और समुद्र मन्थन, ध्रुव, राजा पृथु और भक्त प्रह्लाद।

चित्रण: विष्णु पुराण प्रथम अंश: सृष्टि, समुद्र मन्थन, ध्रुव चरित और प्रह्लाद कथा
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विष्णु पुराण का पहला अंश संसार के आरम्भ से शुरू होता है और दो महान बाल-भक्तों, ध्रुव और प्रह्लाद, की कथाओं पर पहुँचता है। यह अंश बताता है कि सृष्टि कैसे हुई और भक्ति की शक्ति कितनी बड़ी है।

अध्याय 1 से 2: मैत्रेय का प्रश्न और पराशर जी

मैत्रेय मुनि ने अपने गुरु पराशर जी से पूछा: यह जगत कैसे उत्पन्न हुआ, किसमें स्थित है, किसमें लीन होगा, और इसका स्वरूप क्या है? पराशर जी ने पहले बताया कि उन्हें यह ज्ञान कैसे मिला: उनके पिता शक्ति मुनि को एक राक्षस ने मार डाला था। क्रोधित होकर पराशर जी ने राक्षसों के विनाश के लिए यज्ञ आरम्भ किया, जिसमें निर्दोष राक्षस भी जलने लगे। उनके पितामह वसिष्ठ जी ने समझाया कि क्रोध ऋषियों को शोभा नहीं देता, और पराशर जी ने यज्ञ रोक दिया। प्रसन्न होकर राक्षसों के पूर्वज पुलस्त्य ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम पुराणों के रचयिता बनोगे। फिर पराशर जी ने उत्तर दिया: यह जगत विष्णु से उत्पन्न हुआ, उन्हीं में स्थित है, और वही इसकी स्थिति और प्रलय के कारण हैं; जगत विष्णु ही है।

अध्याय 2 से 7: सृष्टि का क्रम

सृष्टि से पहले केवल परब्रह्म विष्णु थे। उनके चार रूप बताए गए: प्रधान (प्रकृति), पुरुष, व्यक्त (प्रकट जगत) और काल। काल की प्रेरणा से प्रकृति में हलचल हुई और महत् तत्त्व बना, फिर अहंकार, फिर पाँच तन्मात्राएँ, पाँच महाभूत, इन्द्रियाँ और मन। इन सबसे ब्रह्माण्ड रूपी अण्डा बना, जिसमें विष्णु ब्रह्मा बनकर सृष्टि करते हैं, विष्णु रूप में पालन करते हैं और रुद्र रूप में संहार।

काल की गणना भी बताई गई: मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात, चार युग (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) मिलकर एक चतुर्युग, एक हज़ार चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन, और ब्रह्मा की आयु सौ वर्ष।

प्रलय के जल से पृथ्वी को निकालने के लिए विष्णु जी ने वराह (सूअर) का रूप धारण किया और अपने दाँतों पर पृथ्वी को उठाकर जल पर स्थापित किया। फिर ब्रह्मा जी ने नौ प्रकार की सृष्टि की: वनस्पति, पशु, देवता, मनुष्य आदि। ब्रह्मा जी के क्रोध से रुद्र प्रकट हुए, जो रोने के कारण "रुद्र" कहलाए और जिन्हें आठ नाम और आठ स्थान मिले। ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा से मनुष्य सृष्टि चली।

अध्याय 8 से 10: लक्ष्मी और भृगु वंश

लक्ष्मी जी विष्णु जी की नित्य शक्ति हैं: जैसे विष्णु सर्वव्यापी हैं, वैसे ही लक्ष्मी। विष्णु अर्थ हैं तो लक्ष्मी वाणी, विष्णु दीपक हैं तो लक्ष्मी प्रकाश। भृगु ऋषि के वंश और अन्य ऋषि-वंशों का वर्णन भी है।

अध्याय 9: दुर्वासा का शाप और समुद्र मन्थन

दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को एक दिव्य माला भेंट की। इन्द्र ने उसे अपने हाथी ऐरावत के सिर पर रख दिया, और हाथी ने उसे ज़मीन पर फेंककर कुचल दिया। अपमानित दुर्वासा ने शाप दिया कि तुम्हारा ऐश्वर्य (लक्ष्मी) नष्ट हो जाए। लक्ष्मी तीनों लोकों से चली गईं, और देवता दुर्बल होकर असुरों से हारने लगे।

विष्णु जी के कहने पर देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मन्थन किया: मन्दराचल पर्वत मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी, और विष्णु जी ने कच्छप (कछुआ) बनकर पर्वत को अपनी पीठ पर सँभाला। समुद्र से कामधेनु, वारुणी, पारिजात वृक्ष, अप्सराएँ, चन्द्रमा, विष (जिसे शिव जी ने पिया), धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर, और अन्त में कमल पर बैठी लक्ष्मी जी प्रकट हुईं, जिन्होंने विष्णु जी को वरण किया। विष्णु जी ने मोहिनी बनकर असुरों को मोहित किया और देवताओं को अमृत पिलाया। इन्द्र ने लक्ष्मी जी की स्तुति की, और लक्ष्मी ने वर दिया कि जो इस स्तोत्र से उनकी स्तुति करेगा, उसके घर से वे कभी नहीं जाएँगी।

अध्याय 11 से 12: ध्रुव चरित

राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं: सुनीति और सुरुचि। सुनीति के पुत्र ध्रुव और सुरुचि के पुत्र उत्तम थे। राजा सुरुचि को अधिक प्रेम करते थे। एक दिन पाँच वर्ष के ध्रुव पिता की गोद में बैठना चाहते थे, पर सुरुचि ने उन्हें यह कहकर हटा दिया कि यदि पिता की गोद चाहिए तो भगवान की तपस्या करके मेरे गर्भ से जन्म लो।

रोते हुए ध्रुव माँ के पास आए। माँ सुनीति ने समझाया: बेटा, किसी का बुरा मत सोचो; यदि ऊँचा स्थान चाहिए तो भगवान विष्णु की आराधना करो। ध्रुव वन की ओर चल पड़े। रास्ते में सप्तर्षि (और परम्परा में नारद जी) मिले, जिन्होंने उन्हें "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मन्त्र और ध्यान की विधि दी। ध्रुव ने मधुवन (यमुना तट) में कठोर तप किया: पहले फल, फिर पत्ते, फिर केवल जल, फिर केवल वायु, और अन्त में श्वास रोककर एक पैर पर खड़े होकर। देवताओं ने माया से उन्हें डराना और फुसलाना चाहा, पर वे अडिग रहे।

भगवान विष्णु प्रकट हुए। ध्रुव ने उनकी स्तुति की और कहा: मैं ऐसा स्थान चाहता था जो सबसे ऊँचा हो, पर आपके दर्शन के बाद मुझे कुछ नहीं चाहिए। भगवान ने उन्हें ध्रुव पद दिया: आकाश में सबसे ऊँचा, अटल स्थान (ध्रुव तारा), जिसके चारों ओर सब नक्षत्र घूमते हैं। ध्रुव ने लौटकर बहुत समय तक धर्म से राज्य किया, और उनकी माता सुनीति भी उनके साथ उस स्थान पर तारा रूप में हैं।

अध्याय 13: वेन और पृथु

ध्रुव के वंश में राजा अंग का पुत्र वेन अत्याचारी था और उसने यज्ञ-पूजा बन्द करवा दी। ऋषियों ने उसे मार डाला। उसके शरीर के मन्थन से पहले निषाद और फिर दाहिने हाथ से धर्मात्मा राजा पृथु उत्पन्न हुए। अत्याचार के कारण पृथ्वी ने अन्न छिपा लिया था। पृथु धनुष लेकर उसके पीछे दौड़े, तो पृथ्वी गाय बनकर भागी और फिर शरण आई। पृथु ने उसे बछड़ा (स्वायम्भुव मनु) बनाकर दुहा, और सब प्राणियों के लिए अन्न और वनस्पतियाँ प्राप्त हुईं। पृथ्वी ने पृथु को पिता माना, इसलिए उसका नाम "पृथ्वी" पड़ा। पृथु ने भूमि को समतल करवाया, नगर और गाँव बसाए, और खेती आरम्भ हुई।

अध्याय 14 से 15: प्रचेता और दक्ष

राजा प्राचीनबर्हि के दस पुत्र प्रचेता थे, जिन्होंने समुद्र के जल में दस हज़ार वर्ष तप किया। लौटने पर उन्होंने देखा कि पृथ्वी वृक्षों से ढक गई है, और क्रोध से वृक्षों को जलाने लगे। चन्द्रमा (सोम) ने उन्हें शान्त किया और वृक्षों की पुत्री मारिषा से उनका विवाह कराया। उनके पुत्र दक्ष प्रजापति हुए, जिनकी पुत्रियों से देवता, असुर, मनुष्य और सब प्राणी उत्पन्न हुए।

अध्याय 15 से 21: भक्त प्रह्लाद

कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर तीनों लोक जीत लिए और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया। उसका पुत्र प्रह्लाद जन्म से ही विष्णु भक्त था। गुरुकुल में पढ़कर जब प्रह्लाद लौटे और पिता ने पूछा कि क्या सीखा, तो प्रह्लाद ने कहा: जो अनादि, अनन्त, सबके आधार विष्णु हैं, उन्हें नमस्कार।

क्रोधित हिरण्यकशिपु ने बार-बार प्रह्लाद को मारने का प्रयत्न किया:

  • असुरों ने शस्त्रों से प्रहार किए, पर प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ।
  • विषैले साँपों से डसवाया, पर विष का असर नहीं हुआ।
  • दिग्गजों (हाथियों) से कुचलवाना चाहा, पर उनके दाँत टूट गए।
  • आग में डाला, पर आग शीतल हो गई।
  • पुरोहितों ने मन्त्र से कृत्या (विनाशकारी शक्ति) उत्पन्न की, पर वह उलटकर पुरोहितों को ही जलाने लगी; प्रह्लाद ने प्रार्थना करके उन्हें भी बचा लिया।
  • भोजन में विष दिया, पर वह पच गया।
  • ऊँचे महल से फेंका, पर पृथ्वी ने उन्हें सँभाल लिया।
  • माया से डराया, पर सुदर्शन चक्र ने माया काट दी।
  • बाँधकर समुद्र में डालकर ऊपर पर्वत रख दिए; वहीं प्रह्लाद ने विष्णु जी की स्तुति की और भगवान ने प्रकट होकर उन्हें मुक्त किया।

भगवान ने वर माँगने को कहा। प्रह्लाद ने माँगा: मेरी भक्ति आपमें अटल रहे, और मेरे पिता को मुझसे द्वेष करने के पाप से मुक्ति मिले। भगवान ने दोनों वर दिए। आगे भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया, और प्रह्लाद दैत्यों के राजा बने। (विष्णु पुराण में नृसिंह प्रसंग संक्षेप में है; विस्तार भागवत पुराण में है।)

अध्याय 21 और 22: कश्यप वंश और विभूतियाँ

अंश के अन्त में कश्यप ऋषि की पत्नियों से उत्पन्न आदित्य, दैत्य, दानव, नाग, गरुड़ आदि का वर्णन है, और बताया गया है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि में सबके राजा नियुक्त किए: वनस्पतियों के सोम, जल के वरुण, पितरों के यम, और इसी प्रकार।

इस अंश की सीख

  • क्रोध ऋषि को भी अन्यायी बना देता है; वसिष्ठ जी की सीख से पराशर जी पुराणकर्ता बने।
  • अहंकार ऐश्वर्य छीन लेता है, जैसे इन्द्र की लक्ष्मी चली गई; विनम्रता और परिश्रम (मन्थन) से वह लौटती है।
  • पाँच वर्ष का बालक भी दृढ़ संकल्प से सबसे ऊँचा स्थान पा सकता है; ध्रुव ने अपमान को साधना में बदला।
  • सच्चा भक्त कष्ट देने वाले का भी भला चाहता है; प्रह्लाद ने पिता और पुरोहितों के लिए भी प्रार्थना की।

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