विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में
विष्णु पुराण षष्ठ अंश: कलियुग, चार प्रकार के प्रलय, केशिध्वज-खाण्डिक्य संवाद और मोक्ष
विष्णु पुराण का अन्तिम अंश (8 अध्याय): कलियुग के लक्षण और कलियुग सबसे सरल क्यों, चार प्रकार के प्रलय, तीन प्रकार के दुःख, योग पर खाण्डिक्य-केशिध्वज संवाद, और पुराण श्रवण का फल।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।विष्णु पुराण का अन्तिम अंश छोटा है, पर उसमें पूरे पुराण का सार है: समय कैसे बदलता है, सब कुछ कैसे लीन होता है, और इस सबके बीच मनुष्य मुक्ति कैसे पाए।
अध्याय 1: कलियुग के लक्षण
पराशर जी कलियुग के लक्षण बताते हैं: लोग धर्म और वेद-मार्ग से हटेंगे, धन ही प्रतिष्ठा का आधार होगा, बलवान ही राजा होगा, राजा प्रजा की रक्षा नहीं, शोषण करेंगे, झूठ और छल बढ़ेगा, आयु और बल घटेंगे, लोग थोड़े में अधिक घमण्ड करेंगे, और रिश्ते स्वार्थ पर टिकेंगे।
अध्याय 2: फिर भी कलियुग श्रेष्ठ क्यों
एक बार ऋषियों ने व्यास जी से पूछा कि कौन-सा युग श्रेष्ठ है। व्यास जी गंगा में स्नान करते हुए बोले: "कलियुग साधु है", "शूद्र साधु हैं", "स्त्रियाँ साधु हैं"। ऋषियों के आश्चर्य पर उन्होंने समझाया:
- सत्ययुग में जो फल दस वर्ष के तप से, त्रेता में एक वर्ष से और द्वापर में एक महीने से मिलता था, कलियुग में वही एक दिन-रात में मिल जाता है।
- सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में पूजा से जो मिलता था, कलियुग में वह केवल भगवान केशव के नाम-कीर्तन से मिल जाता है।
- शूद्र (सेवा करने वाले) केवल सेवा से, और स्त्रियाँ केवल पति और परिवार की सेवा से, बिना कठिन नियमों के, वह पुण्य पा लेती हैं जो दूसरों को कठिन साधना से मिलता है।
सन्देश: कलियुग कठिन है, पर इसमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग सबसे सरल है: नाम स्मरण और सेवा।
अध्याय 3 और 4: चार प्रकार के प्रलय
- नैमित्तिक प्रलय: ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) के अन्त में, जब तीनों लोक जलमग्न होते हैं और भगवान शेषशय्या पर सोते हैं। सौ वर्षों तक अकाल, फिर सूर्य की सात किरणों से सब सूख जाना, फिर संवर्तक मेघों की वर्षा से सब जलमय।
- प्राकृतिक प्रलय: ब्रह्मा की आयु पूरी होने पर, जब सारे तत्त्व क्रम से अपने कारण में लीन होते हैं: पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में, वायु आकाश में, आकाश अहंकार में, अहंकार महत् में, महत् प्रकृति में, और प्रकृति परमात्मा में।
- आत्यन्तिक प्रलय: जब ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान से संसार के बन्धन से सदा के लिए मुक्त हो जाता है; यह मोक्ष है।
- नित्य प्रलय: हर क्षण प्राणियों का जन्म और मरण, जो निरन्तर चलता रहता है।
अध्याय 5: तीन प्रकार के दुःख
संसार में तीन प्रकार के ताप (दुःख) हैं:
- आध्यात्मिक: शरीर के रोग और मन के कष्ट (चिन्ता, क्रोध, भय, ईर्ष्या)।
- आधिभौतिक: दूसरे प्राणियों से मिलने वाले कष्ट (हिंसक पशु, साँप, चोर, शत्रु)।
- आधिदैविक: प्रकृति और दैवी शक्तियों से (सर्दी, गर्मी, वर्षा, आँधी, बिजली, भूकम्प)।
जन्म के पहले गर्भ में, जन्म के समय, बचपन, जवानी, बुढ़ापे और मृत्यु में मनुष्य जो कष्ट पाता है, उनका भी वर्णन है। इन सब दुःखों की एक ही दवा है: भगवान की प्राप्ति, जो ज्ञान और भक्ति से होती है। "भगवान" शब्द का अर्थ भी बताया गया: जिनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, ये छह गुण पूर्ण रूप से हैं।
अध्याय 6 और 7: केशिध्वज और खाण्डिक्य का संवाद
निमि वंश में दो चचेरे भाई थे: खाण्डिक्य जनक, जो कर्मकाण्ड में निपुण थे, और केशिध्वज, जो आत्मज्ञानी थे। केशिध्वज ने खाण्डिक्य का राज्य जीत लिया था, और खाण्डिक्य वन में रहते थे।
एक बार केशिध्वज के यज्ञ की गाय को सिंह ने मार डाला। उन्होंने पुरोहितों से प्रायश्चित्त पूछा, पर कोई नहीं जानता था; सबने खाण्डिक्य का नाम लिया। केशिध्वज अपने शत्रु खाण्डिक्य के पास गए। खाण्डिक्य के मन्त्रियों ने कहा कि शत्रु हाथ आया है, मार दो। पर खाण्डिक्य ने धर्म को चुना और प्रायश्चित्त बता दिया। यज्ञ पूरा होने पर केशिध्वज गुरु-दक्षिणा देने आए। खाण्डिक्य ने राज्य नहीं माँगा; उन्होंने कहा: मुझे वह ज्ञान दो जिससे दुःख मिटे।
केशिध्वज ने उन्हें योग का ज्ञान दिया:
- "मैं" और "मेरा" का भाव ही अविद्या है; शरीर को "मैं" और वस्तुओं को "मेरा" मानना ही बन्धन है।
- मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है: विषयों में लगा मन बाँधता है, भगवान में लगा मन मुक्त करता है।
- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा से मन को शुद्ध करके, भगवान के मूर्त रूप (शंख, चक्र, गदा, पद्म धारी, पीताम्बर, कौस्तुभ) का ध्यान करो।
- धीरे-धीरे ध्यान करने वाला, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं; यही समाधि है।
ज्ञान पाकर खाण्डिक्य ने राज्य की इच्छा छोड़ दी और वन में ध्यान करते हुए मुक्त हुए। केशिध्वज भी समय आने पर निष्काम कर्म करते हुए मुक्त हुए।
अध्याय 8: पुराण का माहात्म्य और परम्परा
अन्त में पराशर जी बताते हैं कि यह पुराण ब्रह्मा जी से ऋभु, ऋभु से प्रियव्रत, और आगे की परम्परा से पराशर जी तक आया, और अब मैत्रेय तक। जो इसे श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसे सब तीर्थों और यज्ञों का फल मिलता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और अन्त में वह विष्णु लोक पाता है। पुराण का अन्तिम सन्देश है: जो सबके आदि, अन्त और आधार हैं, उन भगवान विष्णु का स्मरण ही सबसे बड़ा साधन है।
इस अंश की सीख
- कठिन समय में भी ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग सबसे सरल है: नाम स्मरण और निःस्वार्थ सेवा।
- हर क्षण कुछ नष्ट और कुछ नया हो रहा है; इसलिए किसी वस्तु या स्थिति से चिपकना व्यर्थ है।
- शत्रु के प्रति भी धर्म निभाना चाहिए; खाण्डिक्य ने प्रतिशोध के स्थान पर धर्म चुना।
- सबसे बड़ी दक्षिणा धन या राज्य नहीं, ज्ञान है।
- "मैं" और "मेरा" का भाव छूटते ही बन्धन छूट जाता है।
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