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विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में

विष्णु पुराण चतुर्थ अंश: सूर्यवंश और चन्द्रवंश — इक्ष्वाकु से श्रीराम तक, ययाति, यदु और पुरु

विष्णु पुराण का चौथा अंश (24 अध्याय): इक्ष्वाकु से मान्धाता, हरिश्चन्द्र, सगर, भगीरथ, रघु और श्रीराम तक अयोध्या का सूर्यवंश, पुरूरवा, ययाति, यदु और पुरु का चन्द्रवंश, स्यमन्तक मणि, और कलियुग के राजवंश।

चित्रण: विष्णु पुराण चतुर्थ अंश: सूर्यवंश और चन्द्रवंश — इक्ष्वाकु से श्रीराम तक, ययाति, यदु और पुरु
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चौथा अंश पुराण का इतिहास भाग है: इसमें भारत के दो महान राजवंशों, सूर्यवंश और चन्द्रवंश, की वंशावली और उनके प्रमुख राजाओं की कथाएँ हैं। अयोध्या का रघुकुल इसी सूर्यवंश का भाग है, इसलिए यह अंश श्रीराम जन्मभूमि के पाठकों के लिए विशेष है।

अध्याय 1 और 2: सूर्यवंश का आरम्भ

वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु से सूर्यवंश चला, जिसकी राजधानी अयोध्या थी। मनु की एक सन्तान इला (जो कभी स्त्री, कभी पुरुष सुद्युम्न रहीं) से चन्द्रवंश भी जुड़ा, क्योंकि इला का विवाह चन्द्रमा के पुत्र बुध से हुआ।

ककुत्स्थ: इक्ष्वाकु के वंशज पुरंजय ने देवासुर संग्राम में बैल रूपी इन्द्र के ककुद (कूबड़) पर बैठकर युद्ध किया, इसलिए "ककुत्स्थ" कहलाए; श्रीराम को "काकुत्स्थ" इसी से कहा जाता है।

मान्धाता: राजा युवनाश्व ने भूल से पुत्र प्राप्ति के लिए अभिमन्त्रित जल पी लिया और उनके शरीर से पुत्र हुआ। इन्द्र ने उसे अपनी उँगली चुसाई और कहा "मां धास्यति" (यह मुझे पिएगा), इसलिए नाम मान्धाता पड़ा। मान्धाता चक्रवर्ती सम्राट बने।

सौभरि ऋषि: मान्धाता के समय सौभरि ऋषि ने जल में मछलियों का पारिवारिक सुख देखकर गृहस्थ बनना चाहा और मान्धाता की पचास पुत्रियों से विवाह किया। अपार वैभव और सन्तान के बाद भी इच्छाएँ बढ़ती गईं। अन्त में उन्होंने समझा कि इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं, और फिर से वैराग्य लेकर वन में गए।

अध्याय 3 और 4: त्रिशंकु से श्रीराम तक

  • त्रिशंकु: सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे; विश्वामित्र ने उनके लिए अलग स्वर्ग रच दिया।
  • हरिश्चन्द्र: सत्यवादी राजा, जिन्होंने सत्य के लिए राज्य, पत्नी और पुत्र तक त्याग दिए।
  • सगर: उनके साठ हज़ार पुत्र अश्वमेध के घोड़े को खोजते हुए कपिल मुनि को चोर समझ बैठे और उनकी दृष्टि से भस्म हो गए।
  • अंशुमान, दिलीप और भगीरथ: तीन पीढ़ियों ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का तप किया। भगीरथ के तप से गंगा उतरीं, शिव जी ने उन्हें जटा में धारण किया, और गंगा ने सगर पुत्रों का उद्धार किया।
  • कल्माषपाद (सौदास), अश्मक, खट्वांग: खट्वांग ने देवताओं की सहायता के बाद जाना कि आयु केवल एक मुहूर्त बची है, और उस एक मुहूर्त में भगवान का ध्यान करके मुक्ति पाई।
  • दीर्घबाहु (दिलीप), रघु, अज, दशरथ: रघु के नाम पर यह वंश रघुवंश कहलाया।
  • श्रीराम: दशरथ के पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में भगवान स्वयं अवतरित हुए। विष्णु पुराण संक्षेप में बताता है: विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, ताड़का वध, शिव धनुष तोड़कर सीता विवाह, पिता के वचन के लिए वनवास, सीता हरण, रावण वध, अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक, और रामराज्य। राम के पुत्र कुश और लव हुए।

श्रीराम के बाद कुश से अतिथि, निषध, नल, नभ और आगे बृहद्बल तक वंश चला, जो महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथों मारे गए।

अध्याय 5: निमि वंश और सीता

इक्ष्वाकु के पुत्र निमि के शरीर के मन्थन से जनक उत्पन्न हुए; इसी से उनके वंशज "जनक" और "वैदेह" कहलाए, और नगरी "मिथिला"। इसी वंश में सीरध्वज जनक हुए, जिन्हें हल चलाते समय भूमि से सीता जी प्राप्त हुईं।

अध्याय 6 से 10: चन्द्रवंश

चन्द्रमा (सोम) के पुत्र बुध, बुध और इला के पुत्र पुरूरवा।

  • पुरूरवा और उर्वशी: अप्सरा उर्वशी ने कुछ शर्तों पर पुरूरवा से विवाह किया; शर्त टूटने पर वह चली गई, और पुरूरवा विरह में भटके।
  • नहुष: इन्द्र पद पाकर अहंकारी हुए, ऋषियों से पालकी उठवाई, और अगस्त्य के शाप से अजगर बने।
  • ययाति: शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और असुरराज की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह किया। शुक्राचार्य के शाप से बुढ़ापा आया, तो पुत्रों से उसे बदलने को कहा। केवल सबसे छोटे पुरु ने स्वीकार किया। हज़ार वर्ष भोग के बाद ययाति ने कहा: "न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति" — कामनाएँ भोगने से कभी शान्त नहीं होतीं, जैसे घी डालने से आग और भड़कती है। उन्होंने पुरु को यौवन लौटाकर राज्य दिया।

ययाति के पुत्रों से वंश चले: यदु से यदुवंश, पुरु से पुरुवंश (आगे कुरुवंश), तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु से अन्य वंश।

अध्याय 11 से 15: यदुवंश और स्यमन्तक मणि

यदुवंश में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) हुए, जिन्होंने रावण को भी बन्दी बनाया, पर परशुराम के हाथों मारे गए। आगे ज्यामघ, विदर्भ, वृष्णि, अन्धक आदि शाखाएँ चलीं।

स्यमन्तक मणि की कथा: सत्राजित को सूर्य से स्यमन्तक मणि मिली, जो प्रतिदिन सोना देती थी। श्रीकृष्ण ने कहा था कि यह मणि राजा उग्रसेन के पास रहनी चाहिए, पर सत्राजित ने नहीं दी। सत्राजित का भाई प्रसेन मणि पहनकर शिकार पर गया और सिंह ने उसे मार दिया; सिंह को जाम्बवान ने मारकर मणि ले ली। लोगों ने श्रीकृष्ण पर मणि चुराने का कलंक लगाया। श्रीकृष्ण खोजते हुए जाम्बवान की गुफा पहुँचे, इक्कीस दिन युद्ध हुआ। जाम्बवान ने पहचान लिया कि ये उनके प्रभु राम ही हैं, और अपनी पुत्री जाम्बवती और मणि श्रीकृष्ण को दे दी। श्रीकृष्ण ने मणि सत्राजित को लौटाई, जिसने लज्जित होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से किया। (परम्परा में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन के कलंक की बात इसी कथा से जुड़ी है।)

इसी वंश में वसुदेव और देवकी हुए, जिनके पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण थे।

अध्याय 16 से 20: पुरुवंश और कुरुवंश

पुरु के वंश में दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भरत हुए, जिनके नाम पर भी देश "भारत" कहलाता है। आगे हस्ती (हस्तिनापुर के संस्थापक), कुरु (कुरुक्षेत्र), शान्तनु, भीष्म, धृतराष्ट्र, पाण्डु, पाण्डव और कौरव, और अर्जुन के पौत्र परीक्षित। परीक्षित के पुत्र जनमेजय हुए।

अध्याय 21 से 24: कलियुग के राजा

भविष्य के रूप में मगध के राजवंश बताए गए: बृहद्रथ, प्रद्योत, शिशुनाग, नन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य (चाणक्य द्वारा स्थापित), शुंग, कण्व, आन्ध्र और अन्य। अन्त में कलियुग में राजाओं के लोभ, अन्याय और प्रजा के कष्ट का वर्णन है, और कहा गया है कि इतने बड़े-बड़े राजा भी समय के साथ केवल कथाएँ बनकर रह गए; इसलिए "यह मेरा है" का अहंकार व्यर्थ है।

इस अंश की सीख

  • रघुकुल के राजाओं की कथाएँ बताती हैं कि सत्य, वचन-पालन और त्याग ही किसी कुल को महान बनाते हैं।
  • ययाति का अनुभव: इच्छाएँ भोग से नहीं, विवेक से शान्त होती हैं।
  • स्यमन्तक कथा: झूठा कलंक लगे तो धैर्य से सत्य सामने लाना चाहिए।
  • बड़े-बड़े साम्राज्य भी समय में खो जाते हैं; केवल धर्म और यश रहता है।

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