विष्णु पुराण: सभी छह अंश सरल हिन्दी में
विष्णु पुराण पंचम अंश: सम्पूर्ण श्रीकृष्ण चरित — जन्म से परमधाम गमन तक
विष्णु पुराण का पाँचवाँ अंश (38 अध्याय), श्रीकृष्ण का जीवन: कंस के कारागार में जन्म, गोकुल-वृन्दावन की बाल लीलाएँ, गोवर्धन और रास, कंस वध, द्वारका, विवाह और युद्ध, और यदुवंश का अन्त।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।पाँचवाँ अंश विष्णु पुराण का हृदय है। इसमें भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन क्रम से बताया गया है। भागवत पुराण के दशम स्कन्ध से पहले की यह सबसे प्राचीन विस्तृत कृष्ण कथाओं में गिनी जाती है।
अध्याय 1 से 3: पृथ्वी की प्रार्थना और जन्म
असुरों के भार से पीड़ित पृथ्वी गाय बनकर देवताओं के साथ ब्रह्मा जी और फिर विष्णु जी के पास गई। विष्णु जी ने अपने दो केश, एक श्वेत और एक श्याम, निकाले और कहा कि ये पृथ्वी पर अवतरित होकर भार हरेंगे; श्वेत केश बलराम और श्याम केश श्रीकृष्ण बने। (यह प्रसंग विष्णु पुराण की विशेषता है।)
मथुरा के राजा कंस को आकाशवाणी से पता चला कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसे मारेगा। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके छह पुत्रों को मार डाला। सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया, जो बलराम (संकर्षण) बने। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण प्रकट हुए। वसुदेव उन्हें यमुना पार गोकुल में नन्द जी के घर ले गए और यशोदा की पुत्री (योगमाया) को ले आए। कंस ने उसे मारना चाहा, तो वह आकाश में उड़ गई और बोली: तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है।
अध्याय 4 से 7: गोकुल की बाल लीलाएँ
- पूतना: कंस ने विषैले स्तन वाली राक्षसी पूतना को भेजा; बालक कृष्ण ने दूध के साथ उसके प्राण भी पी लिए।
- शकट भंजन: एक बार बालक कृष्ण ने पैर मारकर बड़ी गाड़ी (शकट) उलट दी।
- यमलार्जुन: माँ यशोदा ने शरारत के कारण उन्हें ऊखल से बाँधा; वे ऊखल घसीटते हुए दो अर्जुन वृक्षों के बीच से निकले और वृक्ष गिर पड़े (नलकूबर और मणिग्रीव शाप-मुक्त हुए)। इसी से "दामोदर" नाम पड़ा।
- वृन्दावन गमन: उपद्रवों के कारण नन्द जी सबको लेकर वृन्दावन चले गए।
- कालिय दमन: यमुना के एक कुण्ड में विषैला कालिय नाग रहता था। कृष्ण कूदकर उसके फनों पर नाचे; नाग-पत्नियों की प्रार्थना पर उसे समुद्र में जाने का आदेश देकर छोड़ दिया।
अध्याय 8 से 13: वृन्दावन की लीलाएँ
- धेनुकासुर और प्रलम्ब: बलराम जी ने गधे के रूप वाले धेनुक और ग्वाल बनकर आए प्रलम्ब असुर का वध किया।
- गोवर्धन: कृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा कि इन्द्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करो, क्योंकि वही हमारा पालन करते हैं। क्रोधित इन्द्र ने सात दिन मूसलाधार वर्षा की। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को एक हाथ पर उठा लिया और सब उसके नीचे सुरक्षित रहे। इन्द्र ने हार मानकर कृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें "गोविन्द" नाम दिया।
- रास लीला: शरद पूर्णिमा की रात कृष्ण की बाँसुरी सुनकर गोपियाँ सब छोड़कर वन में आईं। कृष्ण ने उनके साथ रास किया; यह लीला जीव और ईश्वर के प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।
- अरिष्ट (बैल रूपी) और केशी (घोड़े रूपी) असुर का वध।
अध्याय 14 से 21: मथुरा और कंस वध
कंस ने अक्रूर को भेजकर कृष्ण-बलराम को धनुष यज्ञ के बहाने मथुरा बुलाया। गोपियों के विरह के बीच दोनों मथुरा गए। मथुरा में:
- कंस के धोबी को दण्ड दिया, जो वस्त्र देने से मना कर रहा था; माली सुदामा ने फूल दिए, और कुब्जा ने चन्दन लगाया, जिसकी कमर कृष्ण ने सीधी कर दी।
- धनुष यज्ञ के धनुष को उठाकर तोड़ दिया।
- रंगभूमि के द्वार पर कुवलयापीड हाथी को मारा।
- मल्ल युद्ध में कृष्ण ने चाणूर और बलराम ने मुष्टिक का वध किया।
- फिर कृष्ण ने मंच पर कूदकर कंस को बालों से पकड़कर नीचे गिराया और उसका वध किया।
कृष्ण ने उग्रसेन को फिर राजा बनाया, माता-पिता देवकी-वसुदेव को मुक्त किया, और फिर दोनों भाई उज्जैन में सान्दीपनि मुनि के गुरुकुल में चौंसठ दिनों में चौंसठ कलाएँ सीखकर आए। गुरु-दक्षिणा में उन्होंने गुरु के मृत पुत्र को यमलोक से वापस लाकर दिया।
अध्याय 22 से 25: जरासन्ध और द्वारका
कंस के ससुर जरासन्ध ने मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया और हर बार हारा। फिर कालयवन ने आक्रमण किया। कृष्ण ने समुद्र के बीच द्वारका नगरी बसाई और सब यादवों को वहाँ पहुँचाया। फिर कालयवन को एक गुफा में ले गए, जहाँ राजा मुचुकुन्द सो रहे थे, जिन्हें वरदान था कि जो उन्हें जगाएगा वह उनकी दृष्टि से भस्म होगा। कालयवन ने उन्हें कृष्ण समझकर लात मारी और भस्म हो गया। मुचुकुन्द ने कृष्ण की स्तुति की और तप के लिए गए। बलराम जी का विवाह रेवती से हुआ।
अध्याय 26 से 33: विवाह और युद्ध
- रुक्मिणी हरण: विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने कृष्ण को पत्र भेजा; उनका भाई रुक्मी उन्हें शिशुपाल से ब्याहना चाहता था। कृष्ण उन्हें रथ में बैठाकर ले आए और विवाह हुआ। उनके पुत्र प्रद्युम्न (कामदेव का अवतार) हुए।
- प्रद्युम्न और शम्बर: शम्बरासुर ने शिशु प्रद्युम्न को समुद्र में फेंक दिया; मछली के पेट से वे शम्बर के ही रसोईघर में पहुँचे, जहाँ मायावती (रति) ने उन्हें पाला। बड़े होकर प्रद्युम्न ने शम्बर का वध किया।
- अन्य पत्नियाँ: जाम्बवती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रविन्दा, नाग्नजिती (सत्या), भद्रा और लक्ष्मणा, कुल आठ पटरानियाँ।
- नरकासुर: प्राग्ज्योतिषपुर के नरकासुर ने सोलह हज़ार राजकुमारियों को बन्दी बनाया था। कृष्ण ने सत्यभामा के साथ उसका वध किया और सब राजकुमारियों को मुक्त कर सम्मान दिया।
- पारिजात: स्वर्ग से सत्यभामा के लिए पारिजात वृक्ष लाए, जिस पर इन्द्र से विवाद हुआ, जो बाद में शान्त हुआ।
- बाणासुर और उषा-अनिरुद्ध: कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा का प्रेम हुआ। बाणासुर ने अनिरुद्ध को बन्दी बनाया। कृष्ण के आक्रमण में शिव जी बाणासुर की ओर से लड़े। कृष्ण ने बाणासुर की भुजाएँ काटीं, पर शिव जी के कहने पर उसे जीवित छोड़ा, और उषा-अनिरुद्ध का विवाह हुआ।
अध्याय 34 और 35: पौण्ड्रक, द्विविद और साम्ब
पौण्ड्रक नाम का राजा नकली शंख-चक्र धारण करके स्वयं को "वासुदेव" कहता था; कृष्ण ने उसका वध किया। बलराम जी ने द्विविद वानर का वध किया, और कौरवों द्वारा बन्दी बनाए गए कृष्ण-पुत्र साम्ब को छुड़ाने के लिए हल से हस्तिनापुर को गंगा की ओर खींचने लगे, तब कौरवों ने क्षमा माँगी।
अध्याय 36 से 38: यदुवंश का अन्त और परमधाम
यदुवंश के युवकों ने साम्ब को स्त्री वेष में सजाकर ऋषियों से मज़ाक किया कि इसके पेट से क्या होगा। ऋषियों ने शाप दिया: एक मूसल (मुशल) पैदा होगा, जिससे यदुवंश का नाश होगा। मूसल को घिसकर समुद्र में फेंका गया, पर उसके चूरे से उगी घास (एरका) से प्रभास क्षेत्र में आपसी झगड़े में यादव एक-दूसरे को मारकर नष्ट हो गए। बलराम जी ने योग से शरीर छोड़ा।
श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे ध्यान में बैठे थे; जरा नाम के व्याध ने उनके पैर के तलवे को हिरण का मुख समझकर बाण मारा। व्याध के क्षमा माँगने पर कृष्ण ने उसे क्षमा करके स्वर्ग भेजा, और स्वयं परमधाम चले गए। अर्जुन यादव स्त्रियों को लेकर इन्द्रप्रस्थ गए, पर मार्ग में डाकुओं से हार गए; गाण्डीव का बल भी चला गया। व्यास जी ने समझाया कि कृष्ण के जाने के साथ उनका दिया बल भी चला गया, अब समय बदल गया है। समुद्र ने द्वारका को डुबो दिया, और कलियुग आरम्भ हुआ। पाण्डव परीक्षित को राज्य देकर हिमालय चले गए।
इस अंश की सीख
- भगवान का बचपन माखन चोरी और खेल से भरा है; ईश्वर प्रेम से जीते जाते हैं, भय से नहीं।
- गोवर्धन पूजा का सन्देश: जो प्रकृति (पर्वत, गायें, नदी) हमें पालती है, उसका सम्मान करो।
- गुरु का सम्मान और गुरु-दक्षिणा: भगवान ने भी गुरुकुल में विनम्रता से विद्या ली।
- अहंकार और मज़ाक में ऋषियों का अपमान पूरे वंश के नाश का कारण बना।
- जीवन में जो बल मिला, वह ईश्वर का दिया है; उसके जाने पर अर्जुन का गाण्डीव भी काम न आया।
अंतिम अद्यतन:
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