नागेश्वरनाथ मंदिर: कुश द्वारा स्थापित
अयोध्या में राम की पैड़ी पर स्थित शिव मंदिर नागेश्वरनाथ श्रीराम के पुत्र कुश द्वारा स्थापित माना जाता है। खोए हुए कंगन की कथा।
कथा
श्रीराम के पुत्र कुश सरयू में स्नान कर रहे थे कि उनका कंगन खिसककर बह गया। वह एक नागकन्या को मिला, जो जल के नीचे रहने वाले नागों की राजकुमारी थी, और वह कुश पर मोहित हो गई। वह शिव-भक्त थी, और उसके लिए कुश ने नागेश्वरनाथ, अर्थात् नागों के स्वामी शिव का यह मंदिर बनवाया। कुछ कथाओं में कुश ने उससे विवाह किया।
अयोध्या के लिए महत्त्व
परम्परा इस मंदिर को नगर की स्मृति में विशेष स्थान देती है। कहा जाता है कि जब आगे चलकर अयोध्या उजड़ गई और वन से ढक गई, तब केवल इसी मंदिर में पूजा चलती रही, और इसी चिह्न से राजा विक्रमादित्य ने खोई हुई नगरी और राम के जीवन के स्थलों को पहचानकर उनका जीर्णोद्धार कराया। इतिहास ठीक ऐसा रहा हो या नहीं, यह कथा बताती है कि नागेश्वरनाथ को अयोध्या का प्रधान शिव मंदिर क्यों माना जाता है।
वर्तमान भवन लगभग 1750 में अवध के नवाब सफ़दरजंग के मंत्री नवल राय ने बनवाया।
राम की नगरी में शिव का मंदिर
यात्री कभी-कभी पूछते हैं कि राम की नगरी में शिव मंदिर इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है। रामायण की परम्परा दोनों को अलग नहीं करती। राम लंका जाने से पहले शिव की पूजा करते हैं; शिव निरन्तर राम-नाम जपते माने जाते हैं। तुलसीदास राम से कहलवाते हैं कि शिव का द्रोही मुझे प्रिय नहीं हो सकता। इसलिए श्रद्धालु अयोध्या यात्रा में नागेश्वरनाथ को जल अर्पित करते हैं।
दर्शन
- मंदिर राम की पैड़ी के घाटों पर ही है, इसलिए इसे संध्या की सैर और सरयू घाट की आरती के साथ देखा जा सकता है।
- महाशिवरात्रि पर भारी भीड़ और शोभायात्रा होती है; सोमवार और सावन मास में भी भीड़ रहती है।
- श्रद्धालु परम्परा से सरयू में स्नान कर नदी का जल शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
कुश की अयोध्या वापसी के बारे में लव और कुश पृष्ठ पर पढ़ें।
समय, प्रवेश नियम, मार्ग और दरें बदलती रहती हैं, विशेषकर पर्वों पर। यात्रा से पहले मंदिर, जिला प्रशासन या सेवा प्रदाता से पुष्टि अवश्य करें।
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