श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

जीवन-शिक्षा

सच्ची मित्रता: गुह, सुग्रीव और विभीषण

श्रीराम ने निषादराज, निर्वासित वानर और शत्रु के भाई को मित्र बनाया। रामायण के अनुसार मित्र कौन है और मित्र का कर्तव्य क्या है।

प्रसंग

गंगा तट पर निषादराज गुह ने वनवासी राजकुमार को अपना छोटा-सा राज्य ही अर्पित कर दिया। राम ने उन्हें बराबर का मानकर गले लगाया। किष्किन्धा में राम और सुग्रीव ने, जिन दोनों ने पत्नी और राज्य खोया था, अग्नि के सामने मैत्री की शपथ ली और अपने दुःख बाँटे; देखें किष्किन्धाकाण्ड। और लंका के सामने समुद्र तट पर शत्रु का भाई विभीषण शरण माँगने आया। मंत्रियों को छल का सन्देह था। राम ने उसे तुरन्त अपना लिया।

तर्क

रामचरितमानस में राम सुग्रीव को मित्र के लक्षण बताते हैं: जो अपने पहाड़ जैसे दुःख को धूल समझे और मित्र के धूल जैसे दुःख को पहाड़; जो मित्र को कुमार्ग से हटाकर सुमार्ग पर चलाए; उसके गुण प्रकट करे और अवगुण ढके; देने-लेने में शंका न रखे; और विपत्ति में सौ गुना स्नेह करे। जो सामने मीठा बोले और पीठ पीछे बुराई करे, ऐसे मित्र को छोड़ देना ही भला।

इन प्रसंगों से तीन बातें निकलती हैं। पहली, राम ने मित्र पद देखकर नहीं चुने; केवट, वानर और राक्षस एक राजकुमार के साथ खड़े थे। दूसरी, मैत्री में कर्तव्य था: राम ने कुछ माँगने से पहले सुग्रीव को उसका राज्य दिलाया, और जब सुग्रीव अपना वचन भूले तो उन्हें दृढ़ता से स्मरण कराया गया। जो मित्र कभी अप्रिय सत्य न कहे, वह मित्र का काम नहीं कर रहा। तीसरी, राम ने पहले विश्वास किया। उन्हें छले जाने का जोखिम उस अधर्म से छोटा लगा जो ज़रूरतमन्द को लौटाने में है।

इसे कैसे अपनाएँ

  • मित्र चरित्र देखकर चुनें, पद या उपयोगिता देखकर नहीं।
  • मित्र के बुरे समय में बिना बुलाए पहुँचें।
  • मित्र भटके तो एकान्त में और स्नेह से कहें।
  • अपना काम निकल जाने के बाद भी अपना वचन निभाएँ।

आगे: समता और करुणा। राम के सबसे बड़े मित्र और सेवक का अपना पृष्ठ है: हनुमान।

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