विनम्रता और सेवा: हनुमान का मार्ग
हनुमान ने समुद्र लाँघा, लंका जलाई और पर्वत उठाया, और किसी का श्रेय नहीं लिया। बल, कर्म और अहंकार पर उनके उदाहरण की सीख।
प्रसंग
जब हनुमान सीता का पता लगाकर लंका से लौटे, राम ने पूछा कि तुमने समुद्र कैसे लाँघा और दुर्ग-नगरी कैसे जलाई। रामचरितमानस में हनुमान का उत्तर है कि वानर का पुरुषार्थ तो बस एक डाल से दूसरी डाल पर कूदना है; जो कुछ हुआ, प्रभु के प्रताप से हुआ। वनवासी राम के पास देने को कुछ न था; उन्होंने हनुमान को हृदय से लगाया और कहा कि मैं तुम्हारा ऋण कभी नहीं चुका सकता।
बाद में अयोध्या में राज्याभिषेक पर सीता ने हनुमान को अपनी मोतियों की माला दी। प्रसिद्ध कथा है कि वे हर मोती को तोड़कर देखने लगे, और पूछने पर बोले कि इनमें राम को खोज रहा हूँ; जिसमें राम नहीं, वह मेरे किस काम का। उन्होंने एक ही वर माँगा: जब तक राम-कथा कही जाए, तब तक पृथ्वी पर रहूँ।
तर्क
हनुमान रामायण के सबसे बलवान पात्र हैं, और सबसे विद्वान तथा श्रेष्ठ वक्ता भी। उनकी पूजा बल के लिए नहीं, इसलिए होती है कि उन्होंने उस बल का क्या किया। पूरा बल दूसरे के कार्य में लगाया और यश में से कुछ नहीं रखा।
यह दिखावटी विनय नहीं है। हनुमान जानते थे कि वे क्या कर सकते हैं; स्मरण कराते ही वे बिना झिझके समुद्र लाँघ गए। उनकी विनम्रता इस बात की सही समझ है कि सामर्थ्य कहाँ से आता है और किसलिए है। तुलना करें रावण से, जो उतना ही गुणी था, जिसने हर गुण अपने लिए लगाया और सब खो दिया।
यही उनकी कार्य-कुशलता का रहस्य भी है। जो अपने यश के लिए काम करता है, उसे रुककर दिखना पड़ता है। हनुमान रुकते नहीं; लंका के मार्ग में वे उस पर्वत पर भी विश्राम नहीं करते जो उन्हें आसन देने उठा था।
इसे कैसे अपनाएँ
- काम पूरा करें और घोषणा किसी और को करने दें।
- प्रशंसा मिले तो श्रेय अपने साथियों, गुरुओं और ईश्वर को दें।
- अपनी विशेष शक्ति, जो भी हो, स्वयं से बड़े किसी कार्य में लगाएँ।
- व्यवहार में कोमल और उद्देश्य में दृढ़ रहें: हनुमान सीता के पास विनम्र होकर गए और रावण के सामने निर्भय।
- विश्राम से पहले कार्य पूरा करें।
आगे: अहंकार पर विजय। अयोध्या में श्रद्धालु परम्परा से राम के दर्शन से पहले हनुमानगढ़ी में हनुमान की आज्ञा लेते हैं। उनकी महायात्रा सुन्दरकाण्ड है।
अंतिम अद्यतन:
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