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रघुकुल

महाराज रघु: जिनसे वंश का नाम पड़ा

महाराज रघु ने चारों दिशाएँ जीतीं, फिर अपना सर्वस्व दान कर दिया। कौत्स की गुरु-दक्षिणा की कथा, और श्रीराम को राघव क्यों कहा जाता है।

कथा

दिलीप के पुत्र रघु इस वंश के सबसे बड़े विजेता थे। कालिदास का रघुवंश उनकी दिग्विजय का वर्णन करता है, जिसमें अयोध्या की पताका हर दिशा में पहुँची। पर वे जिस बात के लिए याद किए जाते हैं, वह उसके बाद हुई: उन्होंने विश्वजित् यज्ञ किया, जिसमें यजमान अपना सर्वस्व दान कर देता है। यज्ञ के बाद सम्राट के पास केवल मिट्टी के पात्र बचे।

उसी समय कौत्स नामक एक युवा विद्वान आए। उनके गुरु वरतन्तु ने पहले कोई दक्षिणा नहीं माँगी थी; शिष्य के बार-बार आग्रह से खिन्न होकर उन्होंने एक असम्भव दक्षिणा कह दी: चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ, सिखाई गई हर विद्या के लिए एक करोड़। कौत्स प्रसिद्ध दानी के पास आए और मिट्टी के पात्र देखे। वे बिना माँगे लौटने लगे।

रघु ने उन्हें रोका: जो आवश्यकता लेकर मेरे पास आया, वह दूसरे द्वार नहीं जाएगा। उन्होंने कुछ दिन माँगे और धनपति कुबेर पर चढ़ाई की तैयारी की। भोर से पहले कोष भरा मिला: कुबेर ने रात में स्वर्ण-वर्षा कर दी थी। रघु ने सब अर्पित कर दिया। कौत्स ने ठीक चौदह करोड़ लिए, एक मुद्रा अधिक नहीं। दोनों का आग्रह था कि शेष दूसरे का है।

उनका महत्त्व

रघु का इतना सम्मान था कि वंश ने उनका नाम ले लिया। राम राघव हैं, रघुनन्दन, रघुपति, रघुनाथ। प्राण देकर भी वचन निभाने की प्रसिद्ध चौपाई इसी राजा के कुल का नाम लेती है: रघुकुल रीति।

सीख

ख़ूब कमाओ और ख़ूब दो। रघु की विजय भुला दी गई; उनका ख़ाली कोष नहीं। कथा दूसरे व्यक्ति का भी सम्मान करती है: कौत्स, जिन्होंने आवश्यकता से अधिक नहीं लिया। सर्वस्व देने वाला दाता और केवल आवश्यक लेने वाला ग्रहीता, दोनों मिलकर एक ईमानदार व्यवस्था बनाते हैं।

वंश में आगे: अज। वंश का परिचय: रघुकुल।

अंतिम अद्यतन:

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