श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रघुकुल

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र

अयोध्या के राजा हरिश्चन्द्र ने वचन तोड़ने के बजाय राज्य दे दिया और स्वयं को बेच दिया। उनकी कथा ने उनके नाम को सत्य का पर्याय बना दिया।

कथा

इक्ष्वाकु वंश के प्राचीन राजा हरिश्चन्द्र दो बातों के लिए प्रसिद्ध थे: वे कभी असत्य नहीं बोलते थे और कभी वचन से नहीं फिरते थे। ऋषि विश्वामित्र ने उनकी परीक्षा ली। वचन दे चुके राजा ने अपना पूरा राज्य ऋषि को दान कर दिया। तब विश्वामित्र ने दान के ऊपर दक्षिणा माँगी। पास कुछ न बचने पर हरिश्चन्द्र काशी गए, पत्नी शैव्या (तारामती) और बालक पुत्र रोहिताश्व को सेवा में बेच दिया, और स्वयं को श्मशान के स्वामी के हाथ बेच दिया, जहाँ उनका काम हर शव के दाह का कर वसूलना था।

फिर साँप के काटने से पुत्र की मृत्यु हो गई। पत्नी रात में शव लेकर उसी श्मशान में आई, कर देने को कुछ न था। हरिश्चन्द्र ने उन्हें पहचान लिया, फिर भी स्वामी का कर नहीं छोड़ा। शैव्या ने अपने एकमात्र वस्त्र का आधा भाग कर के रूप में देना चाहा। उसी क्षण देवता प्रकट हुए, बालक जीवित हो उठा, और विश्वामित्र ने यह कहकर राज्य लौटा दिया कि परीक्षा पूर्ण हुई।

उनका महत्त्व

अयोध्याकाण्ड में राम का निर्णय इस पूर्वज को ध्यान में रखकर अधिक समझ आता है। इस कुल में भारी मूल्य चुकाकर वचन निभाना अपवाद नहीं, विरासत था। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने लिखा कि बचपन में हरिश्चन्द्र का नाटक देखकर उनके मन में प्रश्न उठा कि सब लोग उन जैसे सत्यवादी क्यों न हों।

सीख

सत्य की परीक्षा तभी होती है जब वह महँगा पड़े। जब ईमानदारी से लाभ हो, तब ईमानदार रहना सरल है। हरिश्चन्द्र की कथा पूछती है कि क्या हम तब भी सच्चे रहेंगे जब पद दाँव पर हो, और क्या हम अपने परिवार के लिए नियम तोड़ेंगे जब कोई देख न रहा हो। पढ़ें वचन की शक्ति।

वंश में आगे: सगर।

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