श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

पात्र

भरत: जिन्होंने सिंहासन ठुकरा दिया

कैकेयी-पुत्र भरत को अयोध्या मिली और उन्होंने लौटा दी। चौदह वर्ष उन्होंने नन्दीग्राम से श्रीराम की पादुकाओं के नाम पर शासन किया।

वे कौन हैं

भरत दशरथ और कैकेयी के पुत्र तथा माण्डवी के पति थे। अनेक भक्त उन्हें रामायण में निःस्वार्थता का सबसे निर्मल उदाहरण मानते हैं; तुलसीदास राम से कहलवाते हैं कि भरत न जन्मे होते तो संसार धर्म को न जान पाता।

उनका जीवन

जब उनके नाम पर राम को वन भेजा गया, भरत ननिहाल में थे। लौटे तो नगर मौन था, पिता नहीं रहे थे, और माता को धन्यवाद की आशा थी। उन्होंने धन्यवाद नहीं दिया। उन्होंने अभिषेक ठुकराया, सभा से कहा कि राज्य राम का है, और रानियों, गुरुओं और आधी अयोध्या के साथ भाई को लौटाने वन को चल पड़े।

चित्रकूट में उन्होंने राम से लौटने की विनती की और उनके स्थान पर स्वयं वनवास काटने का प्रस्ताव रखा। राम पिता का वचन तोड़ने को तैयार न हुए। तब भरत ने राम की खड़ाऊँ माँगीं, उन्हें सिर पर रखकर लाए और सिंहासन पर स्थापित किया। स्वयं नगर के बाहर नन्दीग्राम में वल्कल और जटा धारण कर, भूमि पर सोकर, तपस्वी का आहार लेकर, पादुकाओं के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाया। उनका प्रण था कि चौदह वर्ष पूरे होने के दिन राम न लौटे तो वे अग्नि में प्रवेश करेंगे। आगे भेजे गए हनुमान ठीक समय पर पहुँचे। कथा अयोध्याकाण्ड में है।

वे किसके प्रतीक हैं

राम ने वह राज्य छोड़ा जो उनसे छीना गया था। भरत ने वह छोड़ा जो उन्हें सौंपा गया था, जो अधिक कठिन है। वे यह भी दिखाते हैं कि हमारे लाभ के लिए किया गया अन्याय हमें बाँधता नहीं: वे कह सकते थे कि "यह मैंने नहीं किया" और मुकुट रख लेते। उन्होंने लाभ ठुकराया और पद के बिना काम किया।

उनके चौदह वर्ष न्यासी-भाव का आदर्श हैं: पूरा दायित्व, कोई स्वामित्व नहीं। पढ़ें भ्रातृ-प्रेम और परिवार और रामराज्य: सेवा के रूप में नेतृत्व। आगे: शत्रुघ्न।

अंतिम अद्यतन:

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रामायण

अयोध्याकाण्ड: वचन और वनवास

रामायण का दूसरा काण्ड: राज्याभिषेक की तैयारी, कैकेयी के दो वर, सीता-लक्ष्मण सहित राम का वनवास, और भरत का राज्य लेने से इनकार।

रघुकुल

राजा दिलीप और नन्दिनी की सेवा

अयोध्या के राजा दिलीप ने सेवक की भाँति नन्दिनी गाय की सेवा की और उसे बचाने के लिए सिंह को अपना शरीर अर्पित किया। कालिदास वर्णित रघु के पिता।

रघुकुल

लव और कुश: राम-सीता के पुत्र

श्रीराम और सीता के जुड़वाँ पुत्र लव-कुश वाल्मीकि आश्रम में पले, पिता के सामने रामायण गाई और उनके बाद रघुकुल को आगे बढ़ाया।