श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण

अयोध्याकाण्ड: वचन और वनवास

रामायण का दूसरा काण्ड: राज्याभिषेक की तैयारी, कैकेयी के दो वर, सीता-लक्ष्मण सहित राम का वनवास, और भरत का राज्य लेने से इनकार।

कथा

दशरथ राम को युवराज बनाने का निश्चय करते हैं और अयोध्या आनन्द में डूब जाती है। उसी रात दासी मन्थरा रानी कैकेयी का मन फेर देती है। कैकेयी वे दो वर माँगती हैं जो राजा ने युद्ध में प्राण-रक्षा के बदले कभी दिए थे: पुत्र भरत के लिए राज्य और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।

राजा टूट जाते हैं, राम नहीं। वे उसी दिन वन जाने को कहते हैं और पिता को दोष देने के स्थान पर उन्हें धीरज बँधाते हैं। सीता कहती हैं कि पत्नी का स्थान सुख में भी और संकट में भी पति के साथ है। लक्ष्मण पीछे रहना स्वीकार नहीं करते। पूरी अयोध्या तमसा तक रथ के पीछे चलती है। गंगा तट पर निषादराज गुह मित्र की तरह राम का स्वागत करते हैं और केवट उन्हें पार उतारता है। दशरथ राम का नाम लेते हुए शोक में प्राण त्याग देते हैं।

ननिहाल से लौटे भरत पाते हैं कि पिता नहीं रहे और उन्हीं के नाम पर भाई को वन भेज दिया गया है। वे राज्य ठुकरा देते हैं, पूरी सभा के साथ चित्रकूट जाते हैं और राम से लौटने की विनती करते हैं। राम पिता का वचन नहीं तोड़ते। भरत राम की पादुकाएँ ले आते हैं, उन्हें सिंहासन पर रखते हैं और नन्दीग्राम में तपस्वी की भाँति रहकर चौदह वर्ष सेवक की तरह राज्य चलाते हैं।

निर्णायक क्षण

  • राम बिना क्रोध और बिना विलम्ब के वनवास स्वीकार करते हैं।
  • सीता और लक्ष्मण स्वेच्छा से कष्ट चुनते हैं; उन्हें कोई आदेश नहीं देता।
  • भरत को राज्य सौंपा जाता है और वे उसे लौटा देते हैं।

सीख

इसी काण्ड ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया। वे कह सकते थे कि वचन अनुचित ढंग से लिया गया; प्रजा और सेना उनके साथ थी। पर उन्होंने पिता के सम्मान और उस विश्वास की रक्षा चुनी जिस पर राज्य चलता है: "प्राण जाइ पर वचन न जाई।" पढ़ें वचन की शक्ति।

भरत उतनी ही दुर्लभ बात सिखाते हैं: जो दूसरे के अन्याय से मिले, वह हमारा नहीं। देखें भ्रातृ-प्रेम और परिवार।

अयोध्या में इसे कहाँ अनुभव करें

नन्दीग्राम का भरत कुण्ड, जहाँ मान्यता है कि भरत ने राम के नाम पर राज्य चलाया, और दशरथ महल देखें। कथा अरण्यकाण्ड में आगे बढ़ती है।

यह काण्ड विस्तार से पढ़ें और सुनें

  1. 1राज्याभिषेक की घोषणा और मन्थरा की कुटिल सलाहदशरथ अगली सुबह राम का राज्याभिषेक करने का निश्चय करते हैं और अयोध्या आनन्द मनाती है। उसी रात दासी मन्थरा रानी कैकेयी की प्रसन्नता को भय में…
  2. 2कैकेयी के दो वरकोप-भवन में कैकेयी अपने दो वर माँगती हैं: भरत के लिए राज्य और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास। राम बिना क्षण भर क्रोध किए स्वीकार कर लेते हैं।
  3. 3राम, सीता और लक्ष्मण का वन-गमनकौशल्या का शोक, लक्ष्मण का क्रोध, वनवास में साथ चलने का सीता का आग्रह, सुमित्रा का आशीर्वाद, और रथ के पीछे तमसा तक चलती पूरी अयोध्या।
  4. 4निषादराज गुह, केवट और चित्रकूटगंगा तट पर निषादराज गुह रात भर पहरा देते हैं, केवट राम के चरण धोकर ही नाव में बैठाता है, और तीनों चित्रकूट में कुटिया बनाते हैं।
  5. 5महाराज दशरथ का देहान्तसुमन्त्र ख़ाली रथ लेकर लौटते हैं। दशरथ को वह तपस्वी बालक याद आता है जिसे उन्होंने भूल से मारा था, और वह शाप, और वे राम को पुकारते हुए प्राण…
  6. 6भरत की वापसी और राज्य का त्यागभरत सूनी अयोध्या में लौटते हैं, जानते हैं कि उनके नाम पर क्या हुआ, शोक में माता को धिक्कारते हैं, मुकुट ठुकराते हैं और राम को लौटाने चल पड़…
  7. 7भरत-मिलाप और सिंहासन पर पादुकाएँचित्रकूट में भाइयों का मिलन होता है। राम पिता का वचन नहीं तोड़ते, तो भरत उनकी पादुकाएँ ले आते हैं और नन्दीग्राम से उनके सेवक बनकर राज्य चला…

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