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श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय 11: नारायणी स्तुति — सर्वमङ्गलमङ्गल्ये, और देवी के भावी अवतार

अध्याय 11: अग्नि आदि देवता हिन्दू धर्म की सबसे प्रिय स्तुतियों में से एक, नारायणी स्तुति, से देवी की वन्दना करते हैं, और देवी वचन देती हैं कि जब-जब बुराई बढ़ेगी, वे नन्दा, रक्तदन्तिका, शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी के रूप में आएँगी।

चित्रण: दुर्गा सप्तशती अध्याय 11: नारायणी स्तुति — सर्वमङ्गलमङ्गल्ये, और देवी के भावी अवतार
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ग्यारहवाँ अध्याय सप्तशती का स्तुति-शिखर है। शुम्भ वध के बाद अग्नि आदि देवता देवी को "नारायणी" कहकर जो स्तुति करते हैं, उसका एक श्लोक हर पूजा और हर शुभ कार्य में बोला जाता है।

नारायणी स्तुति

इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके प्रसन्न मुख से देवी की स्तुति करने लगे:

  • हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी, प्रसन्न होओ। हे सारे जगत की माता, प्रसन्न होओ। हे विश्वेश्वरी, विश्व की रक्षा करो; तुम्हीं चर-अचर की ईश्वरी हो।
  • तुम पृथ्वी रूप में जगत की आधार हो, और जल रूप में सारे जगत को तृप्त करती हो।
  • तुम अनन्त बल वाली वैष्णवी शक्ति हो, विश्व का बीज हो, परम माया हो; तुमने सारे जगत को मोहित कर रखा है, और प्रसन्न होने पर मुक्ति देती हो।
  • संसार की सब विद्याएँ और सब स्त्रियाँ तुम्हारे ही रूप हैं।

हर श्लोक के अन्त में देवता कहते हैं: "नारायणि नमोऽस्तु ते", हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार।

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे सब मंगलों का भी मंगल करने वाली, कल्याणकारिणी शिवा, सब कार्यों को सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी, हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति रूप सनातनी देवी, गुणों की आधार और गुणमयी नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: शरण में आए दीनों और पीड़ितों की रक्षा में तत्पर, सबकी पीड़ा हरने वाली देवी नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।

फिर देवताओं ने देवी को हर रूप में नमस्कार किया: हंस वाले विमान पर ब्रह्माणी, बैल पर माहेश्वरी, मोर पर कौमारी, शंख-चक्र धारिणी वैष्णवी, दाँतों पर पृथ्वी उठाए वाराही, नृसिंह रूपा नारसिंही, वज्र धारिणी ऐन्द्री, और भयंकर चामुण्डा। अन्त में प्रसिद्ध श्लोक:

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे सर्वस्वरूपा, सबकी ईश्वरी, सब शक्तियों से सम्पन्न देवी, हमें सब भयों से बचाओ; हे दुर्गा देवी, तुम्हें नमस्कार है।

और समस्त बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना:

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

अर्थ: हे सर्वेश्वरी, इसी प्रकार तुम तीनों लोकों की सब बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करो।

देवी का वरदान और भावी अवतार

देवी ने प्रसन्न होकर वर दिया और भविष्य के अपने अवतार बताए:

  • नन्दा: वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें युग में शुम्भ-निशुम्भ फिर होंगे, तब मैं नन्द गोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर विन्ध्याचल पर रहकर उनका नाश करूँगी (विन्ध्यवासिनी)।
  • रक्तदन्तिका: वैप्रचित्ति वंश के असुरों को खाकर मेरे दाँत अनार के फूल जैसे लाल होंगे।
  • शताक्षी: सौ वर्ष तक वर्षा न होने पर मैं अयोनिजा होकर प्रकट होऊँगी और सौ नेत्रों से लोगों को देखूँगी।
  • शाकम्भरी: अपने शरीर से उत्पन्न शाक (सब्ज़ियों) से वर्षा होने तक लोगों का पालन करूँगी।
  • दुर्गा: दुर्गम नामक असुर का वध करके दुर्गा नाम से प्रसिद्ध होऊँगी।
  • भीमा: हिमालय पर भयंकर रूप धरकर मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का संहार करूँगी।
  • भ्रामरी: अरुण नामक असुर के उपद्रव पर असंख्य भौंरों (भ्रमरों) का रूप धरकर उसे मारूँगी।

"इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति। तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥" — इस प्रकार जब-जब असुरों से बाधा होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का नाश करूँगी।

इस अध्याय की सीख

  • "सर्वमङ्गलमङ्गल्ये" हर शुभ काम में बोलने की परम्परा है: सबसे पहले माँ से मंगल की प्रार्थना।
  • माँ के हर रूप में, कोमल गौरी से भयंकर चामुण्डा तक, एक ही भाव है: बच्चों की रक्षा।
  • गीता के "यदा यदा हि धर्मस्य" की तरह देवी का भी वचन है: जब-जब संकट, तब-तब मैं।
  • शाकम्भरी रूप बताता है कि भोजन और प्रकृति भी देवी का ही रूप है।

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