श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
दुर्गा सप्तशती अध्याय 3: सेनापतियों का वध और महिषासुर मर्दन
अध्याय 3: देवी चिक्षुर, चामर और महिषासुर के अन्य सेनापतियों का वध करती हैं; महिषासुर भैंसे के रूप में आक्रमण करता है, बार-बार रूप बदलता है, और अन्त में भैंसे के शरीर से आधा निकलते ही मारा जाता है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।तीसरे अध्याय में वह क्षण आता है जिसके लिए देवी प्रकट हुईं: महिषासुर का वध। इसी कारण देवी "महिषासुरमर्दिनी" कहलाती हैं, और शरद नवरात्रि के बाद विजयादशमी इसी विजय का उत्सव भी मानी जाती है।
सेनापतियों का वध
अपनी सेना को नष्ट होते देख महासेनापति चिक्षुर क्रोध से देवी पर बाण बरसाता हुआ आगे आया, जैसे मेघ पर्वत पर जल बरसाता है। देवी ने उसके बाण काट दिए, घोड़े और सारथी को मार दिया, उसका धनुष और ध्वजा काट दी, और फिर शूल से उसकी छाती बेध दी।
चामर हाथी पर चढ़कर आया और शक्ति चलाई; देवी ने हुंकार से उसे निष्फल कर दिया। देवी का सिंह उछलकर हाथी के मस्तक पर चढ़ गया और चामर से भिड़ गया, और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर देवी ने उदग्र को पत्थरों और वृक्षों से, कराल को दाँतों और मुक्कों से, उद्धत को गदा से, बाष्कल को भिन्दिपाल से, ताम्र और अन्धक को बाणों से, और उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु को त्रिशूल से मार डाला। बिडाल का सिर तलवार से काटा, और दुर्धर और दुर्मुख को बाणों से यमलोक भेजा।
महिषासुर का आक्रमण
अपनी सेना और सेनापतियों को नष्ट देखकर महिषासुर स्वयं भैंसे के रूप में आया और देवी के गणों को मारने लगा: किसी को थूथन से, किसी को खुरों से, किसी को पूँछ से, किसी को सींगों से। उसके दौड़ने से पृथ्वी फटने लगी, पूँछ से समुद्र उछलने लगा, सींगों से बादल छिन्न-भिन्न हो गए, और उसकी साँस से उड़े पर्वत आकाश से गिरने लगे।
उसे आते देख देवी ने उसे पाश में बाँधा। बन्धन में आते ही उसने भैंसे का रूप छोड़कर सिंह का रूप धारण किया। देवी ने उसका सिर काटने को तलवार उठाई, तो वह तलवार लिए मनुष्य बन गया। देवी ने बाणों से उसे और उसकी ढाल को काटा, तो वह विशाल हाथी बन गया और सूँड़ से देवी के सिंह को खींचने लगा। देवी ने तलवार से सूँड़ काट दी। तब वह फिर से भैंसा बन गया और तीनों लोकों को हिलाने लगा।
देवी का मधुपान और महिषासुर वध
तब क्रोधित जगन्माता ने दिव्य पात्र से मधु पिया और लाल आँखों से हँसने लगीं। महिषासुर अपने बल के घमण्ड में गरजा और सींगों से पर्वत उठाकर देवी पर फेंकने लगा। देवी ने बाणों से पर्वतों को चूर्ण कर दिया और कहा:
"गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्। मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥" — रे मूढ़, जब तक मैं मधु पीती हूँ, क्षण भर गरज ले; मेरे हाथों तेरे मरते ही यहीं देवता गरजेंगे।
ऐसा कहकर देवी उछलकर उस महादैत्य पर चढ़ गईं, उसे पैर से दबाकर उसकी गर्दन पर शूल से प्रहार किया। देवी के पैर से दबा महिषासुर अपने भैंसे के मुख से अपने वास्तविक रूप में आधा ही निकल पाया था कि देवी ने अपनी बड़ी तलवार से उसका सिर काटकर गिरा दिया।
असुर सेना हाहाकार करती हुई भाग गई। सब देवता प्रसन्न हुए, दिव्य महर्षियों के साथ देवी की स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं।
इस अध्याय की सीख
- बुराई बार-बार रूप बदलती है (भैंसा, सिंह, मनुष्य, हाथी); उसे हर रूप में पहचानकर रोकना पड़ता है।
- महिषासुर हमारे भीतर के अज्ञान, आलस्य और अहंकार (तमोगुण) का प्रतीक है; देवी की शक्ति उसे जीतती है।
- अपनी शक्ति पर घमण्ड पतन से पहले आता है; महिषासुर गरजता रहा और मारा गया।
- विजय के बाद कृतज्ञता: देवताओं ने सबसे पहले देवी की स्तुति की।
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