श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
दुर्गा सप्तशती अध्याय 9: निशुम्भ वध
अध्याय 9: राजा सुरथ आगे की कथा पूछते हैं; निशुम्भ असुरों के साथ युद्ध करता है, देवी से भयंकर लड़ता है, गिरकर दस हज़ार भुजाओं के साथ फिर उठता है, और अन्त में देवी के शूल और तलवार से मारा जाता है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।नौवें अध्याय में शुम्भ का छोटा भाई निशुम्भ युद्ध में उतरता है। यह अध्याय दिखाता है कि अधर्म की शक्ति कितनी बार भी उठे, धर्म के सामने अन्त में गिरती है।
राजा सुरथ का प्रश्न
राजा सुरथ ने मेधा ऋषि से कहा: भगवन, आपने रक्तबीज वध की अद्भुत कथा सुनाई; अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि उसके बाद क्रोधित शुम्भ और निशुम्भ ने क्या किया।
निशुम्भ का युद्ध
ऋषि बोले: रक्तबीज और अन्य असुरों के मारे जाने पर शुम्भ और निशुम्भ बहुत क्रोधित हुए। प्रधान असुरों के साथ निशुम्भ अपनी सेना लेकर आगे चला, और उसके आगे-पीछे और दोनों ओर बड़े-बड़े असुर चले। शुम्भ भी मातृकाओं से लड़ने अपनी सेना के साथ आया।
शुम्भ और निशुम्भ मेघों की तरह बाणों की वर्षा करने लगे। देवी ने उनके बाणों को अपने बाणों से काट दिया और अस्त्रों से उनके अंगों पर प्रहार किया।
निशुम्भ ने तलवार और चमकती ढाल लेकर देवी के सिंह के सिर पर प्रहार किया। देवी ने क्षुरप्र (तेज धार वाले) बाण से उसकी तलवार और ढाल काट दी। तब उसने शक्ति चलाई, जिसे देवी ने चक्र से काट दिया। फिर उसने शूल फेंका, जिसे देवी ने मुक्के से चूर कर दिया। उसने गदा घुमाकर फेंकी, जो देवी के त्रिशूल से राख हो गई। तब देवी ने फरसे से उसे घायल किया और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
शुम्भ का आक्रमण
भाई को गिरा देखकर शुम्भ अत्यन्त क्रोधित होकर देवी को मारने दौड़ा। वह रथ पर बैठा, आठ लम्बी भुजाओं में श्रेष्ठ अस्त्र लिए, सारे आकाश को घेरकर शोभा पा रहा था। उसे आते देख देवी ने शंख बजाया और धनुष की टंकार की, जो अत्यन्त भयंकर थी, और घण्टे की ध्वनि से सारी दिशाएँ गूँज उठीं, जिससे असुरों का तेज नष्ट हो गया।
शुम्भ ने जलती हुई शक्ति चलाई, जिसे देवी ने एक बड़े उल्का (अग्नि-अस्त्र) से रोक दिया। शुम्भ के सिंहनाद से तीनों लोक गूँज उठे। शुम्भ और देवी ने एक-दूसरे पर हज़ारों बाण चलाए। देवी ने शूल से शुम्भ पर प्रहार किया, और वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
निशुम्भ फिर उठता है
इसी बीच निशुम्भ को होश आया और उसने धनुष उठाकर बाणों से देवी, काली और सिंह को घायल कर दिया। फिर उस असुर ने दस हज़ार भुजाएँ बनाकर दस हज़ार चक्रों से देवी को ढक दिया। तब दुर्गा ने क्रोधित होकर अपने बाणों से उन चक्रों और बाणों को काट डाला। फिर निशुम्भ गदा लेकर दौड़ा; देवी ने तलवार से गदा काट दी, और उसने शूल उठाया।
निशुम्भ का वध
निशुम्भ को शूल लिए आते देख देवी ने वेग से अपना शूल चलाकर उसकी छाती बेध दी। शूल से फटे हुए उसके हृदय से एक दूसरा महाबली पुरुष "ठहरो" कहता हुआ निकला। उसके निकलते ही देवी ने ज़ोर से हँसकर तलवार से उसका सिर काट डाला, और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
फिर सिंह ने अपनी तीखी दाढ़ों से असुरों की गर्दनें कुचल डालीं, और काली तथा शिवदूती ने दूसरे असुरों को खा डाला। कौमारी की शक्ति से, ब्रह्माणी के मन्त्र-जल से, माहेश्वरी के त्रिशूल से, वाराही के प्रहारों से, वैष्णवी के चक्र से और ऐन्द्री के वज्र से असुर नष्ट हुए। कुछ भाग गए, कुछ काली, शिवदूती और सिंह के भोजन बन गए।
इस अध्याय की सीख
- बुराई गिरकर फिर उठती है, कभी और बड़े रूप में (दस हज़ार भुजाएँ); इसलिए साधना में ढील नहीं देनी चाहिए।
- निशुम्भ के हृदय से निकला दूसरा पुरुष भीतर छिपे अहंकार का प्रतीक है; जब तक वह न कटे, लड़ाई पूरी नहीं होती।
- शंख, घण्टा और धनुष की ध्वनि ने असुरों का तेज घटाया; पूजा में शंख और घण्टे का महत्त्व इसी भाव से है।
- अच्छाई की टीम (मातृकाएँ, सिंह, काली) मिलकर काम करती है; हर एक की अपनी भूमिका है।
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