श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
दुर्गा सप्तशती अध्याय 10: शुम्भ वध — "एकैवाहं जगत्यत्र"
अध्याय 10: शुम्भ ताना मारता है कि तुम दूसरों के बल पर लड़ती हो; देवी सब मातृकाओं को अपने में लीन करके कहती हैं कि इस संसार में मैं एक ही हूँ; धरती और आकाश में भयंकर युद्ध के बाद शुम्भ मारा जाता है और संसार में शान्ति लौटती है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।दसवें अध्याय में अन्तिम युद्ध होता है। इसका सबसे गहरा क्षण है जब देवी बताती हैं कि सारी शक्तियाँ उन्हीं का रूप हैं: वे एक ही हैं, अनेक दिखती हैं।
शुम्भ का ताना
प्राणों से प्रिय भाई निशुम्भ को मरा और सेना को नष्ट होते देख शुम्भ ने क्रोध में कहा: हे दुर्गे, तू बल के घमण्ड में गर्व मत कर। तू बड़ी अभिमानी है, पर दूसरी स्त्रियों (मातृकाओं) के बल के सहारे लड़ती है।
एकैवाहं: मैं एक ही हूँ
देवी ने उत्तर दिया:
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥
अर्थ: इस संसार में मैं एक ही हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है? रे दुष्ट, देख, ये मेरी ही विभूतियाँ (शक्तियाँ) मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं।
यह कहते ही ब्रह्माणी आदि सब देवियाँ देवी के शरीर में लीन हो गईं, और केवल अम्बिका अकेली रह गईं। देवी ने कहा: मैं अपनी विभूति से यहाँ अनेक रूपों में स्थित थी; उन्हें मैंने समेट लिया। अब मैं अकेली युद्ध में खड़ी हूँ; तू भी स्थिर हो जा।
अन्तिम युद्ध
फिर सब देवताओं और असुरों के देखते-देखते देवी और शुम्भ में भयंकर युद्ध हुआ। देवी ने सैकड़ों बाण, तीखे अस्त्र और भयंकर शस्त्र बरसाए, और शुम्भ ने भी। देवी ने खेल-खेल में हुंकार से उसके दिव्य अस्त्रों को निष्फल कर दिया। शुम्भ ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक दिया, तो देवी ने क्रोध से बाणों से उसका धनुष काट दिया। धनुष कटने पर उसने शक्ति उठाई, जिसे देवी ने चक्र से काट दिया। फिर वह सौ चन्द्रमाओं जैसी चमकती ढाल और तलवार लेकर दौड़ा; देवी ने तीखे बाणों से उसकी तलवार और ढाल काट दी, फिर घोड़े और सारथी को मारकर रथ नष्ट कर दिया।
तब वह मुद्गर लेकर दौड़ा, जिसे देवी ने बाणों से काट दिया। फिर उसने मुक्के से देवी की छाती पर प्रहार किया, और देवी ने भी उसकी छाती पर थप्पड़ मारा, जिससे वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, पर फिर उठ खड़ा हुआ।
आकाश में युद्ध
तब शुम्भ देवी को पकड़कर ऊपर उछला और आकाश में जाकर देवी से युद्ध करने लगा। देवी और शुम्भ में आकाश में ऐसा युद्ध हुआ, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था, जिसे देखकर सिद्ध और मुनि आश्चर्य में पड़ गए। बहुत देर तक युद्ध करने के बाद देवी ने उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया।
शुम्भ वध
पटका हुआ वह दुष्ट फिर उठकर मुक्का ताने देवी को मारने दौड़ा। तब देवी ने उसे आते देख अपने शूल से उसकी छाती विदीर्ण करके उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। देवी के शूल से घायल होकर वह असुर प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, और उसके गिरने से समुद्र, द्वीप और पर्वतों सहित पूरी पृथ्वी काँप उठी।
शान्ति की वापसी
उस दुष्ट के मरते ही सारा जगत प्रसन्न और स्वस्थ हो गया, आकाश निर्मल हो गया। पहले जो उत्पात के मेघ और उल्काएँ थीं, वे शान्त हो गईं, नदियाँ अपने मार्ग पर बहने लगीं। देवता आनन्दित हुए, गन्धर्व मधुर गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं, पवित्र हवा चलने लगी, सूर्य की प्रभा उत्तम हो गई, और यज्ञ की अग्नियाँ शान्त भाव से जलने लगीं।
इस अध्याय की सीख
- सारी शक्तियाँ एक ही परम शक्ति के रूप हैं; अनेकता में एकता यही है।
- बुराई अन्त तक ताने मारती है और भ्रम फैलाती है ("तू दूसरों के बल पर लड़ती है"), पर सत्य शान्त रहकर उत्तर देता है।
- अधर्म का अन्त होते ही प्रकृति भी शान्त और प्रसन्न हो जाती है; अन्याय का प्रभाव पूरे वातावरण पर होता है।
- अन्तिम विजय तक धैर्य रखना पड़ता है; शुम्भ बार-बार उठा, पर देवी नहीं रुकीं।
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