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श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय 5: "या देवी सर्वभूतेषु" स्तुति, कौशिकी का प्राकट्य और शुम्भ का दूत

अध्याय 5 से उत्तम चरित्र आरम्भ: शुम्भ-निशुम्भ स्वर्ग छीन लेते हैं; देवता हिमालय पर "या देवी सर्वभूतेषु" से स्तुति करते हैं; पार्वती के शरीर से कौशिकी प्रकट होती हैं; शुम्भ विवाह का प्रस्ताव भेजता है और देवी अपनी प्रतिज्ञा बताती हैं।

चित्रण: दुर्गा सप्तशती अध्याय 5: "या देवी सर्वभूतेषु" स्तुति, कौशिकी का प्राकट्य और शुम्भ का दूत
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पाँचवें अध्याय से "उत्तम चरित्र" आरम्भ होता है, जिसकी देवी महासरस्वती हैं। यह सप्तशती का सबसे बड़ा भाग है (अध्याय 5 से 13)। पाँचवें अध्याय में ही वह स्तुति है जो लगभग हर हिन्दू घर में गूँजती है: "या देवी सर्वभूतेषु..."।

शुम्भ और निशुम्भ

प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो असुर भाइयों ने अपने बल के घमण्ड में इन्द्र का राज्य और यज्ञ का भाग छीन लिया। सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, यम, वरुण और अग्नि के अधिकार भी ले लिए। अपमानित देवताओं ने देवी के उस वरदान को याद किया कि "संकट में स्मरण करने पर मैं आऊँगी", और हिमालय पर जाकर देवी की स्तुति करने लगे।

या देवी सर्वभूतेषु (अपराजिता स्तुति)

देवताओं ने पहले कहा: देवी को नमस्कार, महादेवी शिवा को सदा नमस्कार, प्रकृति और भद्रा को नमस्कार। फिर उन्होंने हर रूप में देवी को तीन बार नमस्कार किया:

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया नाम से कही जाती हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें बार-बार नमस्कार।

इसी तरह देवताओं ने देवी को सब प्राणियों में इन रूपों में स्थित बताकर नमस्कार किया:

  • चेतना (चैतन्य), बुद्धि, निद्रा, क्षुधा (भूख), छाया।
  • शक्ति, तृष्णा (प्यास), क्षान्ति (क्षमा), जाति, लज्जा।
  • शान्ति, श्रद्धा, कान्ति (शोभा), लक्ष्मी, वृत्ति (आजीविका)।
  • स्मृति, दया, तुष्टि (सन्तोष), माता, और भ्रान्ति (भ्रम)।

अन्त में: जो इन्द्रियों की अधिष्ठात्री हैं, सब प्राणियों में व्याप्त हैं, और चेतना रूप से सारे जगत में व्याप्त हैं, उन देवी को नमस्कार।

इस स्तुति का भाव यह है कि देवी केवल मन्दिर में नहीं, हमारी हर अनुभूति में हैं: भूख में भी, नींद में भी, दया में भी, और माँ के रूप में भी।

कौशिकी का प्राकट्य

उसी समय पार्वती जी गंगा में स्नान करने आईं। उन्होंने पूछा: आप लोग किसकी स्तुति कर रहे हैं? तभी उनके शरीर के कोश से शिवा (अम्बिका) प्रकट हुईं और बोलीं: शुम्भ के सताए देवता मेरी ही स्तुति कर रहे हैं। पार्वती के शरीर-कोश से निकलने के कारण वे "कौशिकी" कहलाईं। उनके निकलने के बाद पार्वती जी का रंग काला हो गया, और वे हिमालय पर रहने वाली "कालिका" कहलाईं।

चण्ड-मुण्ड और शुम्भ का दूत

शुम्भ के सेवक चण्ड और मुण्ड ने अत्यन्त सुन्दर अम्बिका को देखा और शुम्भ से कहा: तीनों लोकों के सब रत्न आपके पास हैं; यह स्त्री-रत्न भी आपके पास होना चाहिए। शुम्भ ने सुग्रीव नाम के दूत को विवाह का प्रस्ताव देकर भेजा। दूत ने मधुर शब्दों में शुम्भ के वैभव का वर्णन किया और कहा: शुम्भ या उनके भाई निशुम्भ को पति रूप में स्वीकार करो।

देवी की प्रतिज्ञा

देवी मुस्कुराईं और बोलीं: तुमने सत्य कहा, शुम्भ तीनों लोकों का स्वामी है। पर मैंने अल्प बुद्धि के कारण पहले एक प्रतिज्ञा कर ली है:

"यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥" — जो मुझे युद्ध में जीत ले, जो मेरा घमण्ड दूर कर दे, और जो संसार में मेरे बराबर बलवान हो, वही मेरा पति होगा।

इसलिए शुम्भ या निशुम्भ यहाँ आकर मुझे जीत लें, फिर विवाह कर लें। दूत ने कहा: तुम घमण्ड में बोल रही हो; जिनके सामने इन्द्र आदि देवता नहीं टिके, उनके सामने तुम अकेली स्त्री कैसे टिकोगी? देवी ने कहा: यही बात है, पर प्रतिज्ञा तो प्रतिज्ञा है; जाकर अपने स्वामी को सब बता दो।

इस अध्याय की सीख

  • देवी हमारे भीतर हर भाव में हैं; भूख, नींद, दया, क्षमा, सबको पवित्र दृष्टि से देखना ही यह स्तुति है।
  • "भ्रान्ति" (भ्रम) में भी देवी हैं: माया भी उन्हीं की, और उससे मुक्ति भी उन्हीं से।
  • स्त्री को वस्तु या "रत्न" समझने वाला अहंकार ही शुम्भ के विनाश का कारण बना।
  • अपने स्वाभिमान और सिद्धान्त पर दृढ़ रहना शक्ति है; देवी ने प्रस्ताव पर नहीं, अपनी प्रतिज्ञा पर बात की।

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