श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
दुर्गा सप्तशती अध्याय 8: सप्त मातृकाएँ, शिवदूती और रक्तबीज वध
अध्याय 8: शुम्भ पूरी सेना भेजता है; देवताओं की शक्तियाँ मातृकाओं के रूप में प्रकट होती हैं; देवी शिव जी को दूत बनाकर भेजती हैं और "शिवदूती" कहलाती हैं; रक्तबीज, जिसके रक्त की हर बूँद से नया असुर पैदा होता था, काली द्वारा रक्त पीने पर मारा जाता है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।आठवें अध्याय में युद्ध सबसे बड़ा हो जाता है। सब देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ लड़ने आती हैं, और सबसे कठिन असुर रक्तबीज का वध होता है।
शुम्भ की पूरी सेना
चण्ड-मुण्ड के मारे जाने और सेना के नष्ट होने पर शुम्भ ने अपनी सारी सेना को युद्ध की आज्ञा दी: उदायुध नाम के छियासी असुर सेनापति, कम्बु वंश के चौरासी, कोटिवीर्य वंश के पचास, धौम्र वंश के सौ, और कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय असुर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ चलें।
सप्त मातृकाएँ
विशाल सेना आती देख देवी ने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश को गुँजा दिया, सिंह गरजा, और काली ने अपना मुख फैलाकर उस गर्जना को और बढ़ा दिया। तभी असुरों के विनाश और देवताओं के कल्याण के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु और इन्द्र की शक्तियाँ उन्हीं के रूप, आभूषण और वाहनों के साथ उनके शरीर से निकलकर देवी के पास आईं:
- ब्रह्माणी: हंस पर, अक्षमाला और कमण्डलु के साथ।
- माहेश्वरी: बैल पर, त्रिशूल धारण किए, चन्द्रमा और साँपों से सजी।
- कौमारी: मोर पर, शक्ति (भाला) लिए, कार्तिकेय के रूप में।
- वैष्णवी: गरुड़ पर, शंख, चक्र, गदा, धनुष और तलवार के साथ।
- वाराही: वराह (सूअर) के रूप में।
- नारसिंही: नृसिंह के रूप में, जिनके केशों के झटके से तारे बिखरने लगे।
- ऐन्द्री: ऐरावत पर, वज्र लिए, हज़ार नेत्रों वाली।
फिर शिव जी उन शक्तियों के साथ आए और देवी से बोले: मेरी प्रसन्नता के लिए शीघ्र असुरों का वध करो।
शिवदूती
तब देवी के शरीर से एक अत्यन्त उग्र शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों गीदड़ियों की तरह आवाज़ करती थी। उसने शिव जी से कहा: आप शुम्भ-निशुम्भ के पास दूत बनकर जाइए और कहिए कि यदि जीना चाहते हो तो पाताल लौट जाओ, इन्द्र को स्वर्ग लौटा दो, और देवताओं को यज्ञ का भाग मिले; यदि बल के घमण्ड में युद्ध चाहते हो, तो आओ, मेरी गीदड़ियाँ तुम्हारे माँस से तृप्त होंगी। शिव जी को दूत बनाकर भेजने के कारण वे "शिवदूती" कहलाईं।
असुरों ने बात नहीं मानी और युद्ध हुआ। ब्रह्माणी ने कमण्डलु के जल से, माहेश्वरी ने त्रिशूल से, वैष्णवी ने चक्र से, कौमारी ने शक्ति से, ऐन्द्री ने वज्र से, वाराही ने थूथन से और नारसिंही ने नाखूनों से असुरों का संहार किया। शिवदूती के अट्टहास से असुर गिरने लगे, और वह उन्हें खा जाती।
रक्तबीज
असुर सेना भागने लगी, तो महा असुर रक्तबीज क्रोध से लड़ने आया। उसे वरदान था कि जब उसके शरीर से रक्त की एक बूँद पृथ्वी पर गिरेगी, तो उससे उसी के समान बलवान एक नया असुर पैदा होगा। ऐन्द्री ने वज्र मारा, तो रक्त की धारा बही, और उससे उसी जैसे हज़ारों असुर पैदा हो गए। वैष्णवी के चक्र, कौमारी की शक्ति, वाराही की तलवार और माहेश्वरी के त्रिशूल से जितना रक्त गिरा, उतने ही रक्तबीज पैदा होते गए, और सारा संसार रक्तबीजों से भर गया। देवता घबरा गए।
रक्तबीज का वध
तब चण्डिका ने काली से हँसते हुए कहा: हे चामुण्डा, अपना मुख फैलाओ। मेरे शस्त्रों से गिरने वाले रक्त-बिन्दुओं और उनसे पैदा होने वाले असुरों को तुम अपने मुख में लेती जाओ। इस प्रकार रक्त गिरेगा नहीं, नए असुर पैदा नहीं होंगे, और यह स्वयं क्षीण होकर नष्ट होगा।
देवी ने शूल से रक्तबीज पर प्रहार किया और काली ने उसका रक्त मुख में ले लिया। उससे जो असुर काली के मुख में पैदा हुए, उन्हें भी वे खा गईं। अन्त में रक्तहीन होकर रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा। देवता प्रसन्न हुए, और मातृकाएँ असुरों के रक्त से उन्मत्त होकर नाचने लगीं।
इस अध्याय की सीख
- सब शक्तियाँ जब एक लक्ष्य के लिए मिलती हैं, तो बड़ी से बड़ी बुराई हारती है; हर देवता ने अपनी शक्ति दी।
- युद्ध से पहले शान्ति का सन्देश: देवी ने शिव को दूत बनाकर पहले समझौते का अवसर दिया।
- रक्तबीज हमारी इच्छाओं जैसा है: एक इच्छा काटो, तो उससे दस नई पैदा होती हैं। उन्हें जड़ से (उनके स्रोत को रोककर) समाप्त करना पड़ता है।
- केवल ताकत से नहीं, युक्ति से भी काम होता है; रक्त को गिरने से रोकना ही उपाय था।
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