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श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय 1: राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ वध (प्रथम चरित्र)

दुर्गा सप्तशती का पहला अध्याय: राजा सुरथ और समाधि वैश्य मेधा ऋषि से पूछते हैं कि मोह क्यों नहीं छूटता; ऋषि महामाया की महिमा, ब्रह्मा जी की योगनिद्रा स्तुति और विष्णु जी द्वारा मधु-कैटभ वध की कथा सुनाते हैं।

चित्रण: दुर्गा सप्तशती अध्याय 1: राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ वध (प्रथम चरित्र)
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दुर्गा सप्तशती का पहला अध्याय "प्रथम चरित्र" है, जिसकी देवी महाकाली हैं। इसमें पूरी कथा का ढाँचा बनता है: दो दुःखी मनुष्य एक ऋषि के पास पहुँचते हैं, और ऋषि उन्हें देवी की महिमा सुनाते हैं।

राजा सुरथ और समाधि वैश्य

स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। शत्रुओं से युद्ध में हारकर और अपने ही मन्त्रियों के विश्वासघात से राज्य खोकर वे अकेले घोड़े पर वन में निकल पड़े और मेधा ऋषि के शान्त आश्रम में पहुँचे। वहाँ भी उनका मन राज्य, सेना, खज़ाने और हाथियों की चिन्ता में लगा रहा।

वहीं उन्हें समाधि नाम का एक वैश्य (व्यापारी) मिला, जिसे उसकी पत्नी और पुत्रों ने धन के लोभ में घर से निकाल दिया था। आश्चर्य यह कि वह भी उन्हीं घरवालों की कुशलता के बारे में सोच-सोचकर दुःखी था।

ऋषि से प्रश्न

दोनों ने मेधा ऋषि से पूछा: हम जानते हैं कि जिन्होंने हमें धोखा दिया, उनसे मोह व्यर्थ है, फिर भी मन उन्हीं में क्यों लगा है? ज्ञान होते हुए भी यह मोह क्यों?

ऋषि ने कहा: ज्ञान तो पशु-पक्षियों को भी होता है; पक्षी भूखे होते हुए भी अपने बच्चों के मुँह में दाना डालते हैं। यह भगवती महामाया का प्रभाव है, जो ज्ञानियों के मन को भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वही प्रसन्न होकर मुक्ति भी देती हैं। वे ही संसार के बन्धन का कारण हैं और वही मोक्ष का।

मधु और कैटभ

राजा ने पूछा: वह देवी कौन हैं, कैसे प्रकट हुईं? ऋषि ने कहा: वे नित्य हैं, फिर भी देवताओं के कार्य के लिए प्रकट होती हैं।

कल्प के अन्त में जब सारा संसार जल में डूबा था और भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में सो रहे थे, तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए। वे विष्णु जी की नाभि के कमल पर बैठे ब्रह्मा जी को मारने दौड़े। ब्रह्मा जी ने देखा कि भगवान सो रहे हैं, तो उन्हें जगाने के लिए भगवान की आँखों में निवास करने वाली योगनिद्रा देवी की स्तुति की:

"तुम्हीं स्वाहा हो, तुम्हीं स्वधा हो, तुम्हीं वषट्कार हो; तुम्हीं सृष्टि करती हो, पालन करती हो और अन्त में संहार करती हो। तुम महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति हो। तुम्हीं कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि हो। हे देवी, भगवान विष्णु को जगाओ ताकि वे इन असुरों का वध करें।"

विष्णु जी का युद्ध

स्तुति से प्रसन्न होकर योगनिद्रा भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष से निकलकर ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हुईं, और भगवान जाग गए। उन्होंने मधु-कैटभ से पाँच हज़ार वर्ष तक बाहु-युद्ध किया। महामाया ने असुरों को मोहित कर दिया। अहंकार में भरकर असुरों ने कहा: हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं, वर माँगो।

भगवान ने कहा: यदि प्रसन्न हो, तो यही वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ। असुरों ने देखा कि सब ओर जल ही जल है, तो चतुराई से कहा: ठीक है, पर हमें वहाँ मारो जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो। भगवान ने "तथास्तु" कहकर दोनों के सिर अपनी जाँघों पर रखकर चक्र से काट दिए। इस प्रकार ब्रह्मा जी की स्तुति से प्रकट हुई महामाया (महाकाली) ने सृष्टि की रक्षा की।

इस अध्याय की सीख

  • धोखा देने वालों से भी मोह छूटता नहीं; यह मानव स्वभाव है, और इसे पहचानना पहला कदम है।
  • बन्धन और मुक्ति, दोनों उसी एक शक्ति के हाथ में हैं; इसलिए उनकी शरण ही उपाय है।
  • अहंकार ("तुम वर माँगो") बड़े से बड़े बलवान को भी हरा देता है।
  • संकट में पहले प्रार्थना, फिर पुरुषार्थ; ब्रह्मा जी की स्तुति से ही भगवान जागे।

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