श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
दुर्गा सप्तशती अध्याय 4: शक्रादि स्तुति — देवताओं द्वारा देवी की स्तुति और वरदान
अध्याय 4: महिषासुर वध के बाद इन्द्र आदि देवता देवी की प्रसिद्ध स्तुति करते हैं, और देवी वरदान देती हैं कि संकट में स्मरण करने पर वे आएँगी और इस स्तुति से उनकी उपासना करने वालों की रक्षा करेंगी।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।चौथा अध्याय मध्यम चरित्र का अन्तिम अध्याय है। युद्ध समाप्त होने पर इन्द्र (शक्र) आदि देवता देवी की स्तुति करते हैं, इसलिए इसे "शक्रादि स्तुति" कहते हैं। यह सप्तशती की सबसे सुन्दर स्तुतियों में है।
देवताओं की स्तुति
देवताओं ने सिर झुकाकर, रोमांचित होकर कहा:
- सब देवताओं की शक्ति के समूह से बनी, सारे जगत में व्याप्त, देवताओं और महर्षियों से पूजित अम्बिका को हम भक्ति से प्रणाम करते हैं; वे हमारा कल्याण करें।
- जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी नहीं कर सकते, वे चण्डिका सारे जगत के पालन और अशुभ भय के नाश का विचार करें।
- जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं लक्ष्मी, पापियों के यहाँ दरिद्रता, शुद्ध हृदय वालों में बुद्धि, सज्जनों में श्रद्धा और कुलीन लोगों में लज्जा के रूप में रहती हैं, उन देवी को हम नमस्कार करते हैं; हे देवी, विश्व का पालन करो।
- तुम्हारे इस अचिन्त्य रूप, असुरों का नाश करने वाले अतुल पराक्रम और युद्ध में किए अद्भुत कार्यों का वर्णन कैसे करें?
- तुम सारे जगत की उत्पत्ति का कारण हो, तीनों गुणों वाली होकर भी दोषों से नहीं जानी जातीं; विष्णु और शिव भी तुम्हें नहीं जानते; तुम सबका आश्रय हो।
- हे देवी, तुम्हीं स्वाहा हो, जिसके उच्चारण से देवता तृप्त होते हैं; तुम्हीं स्वधा हो, जिससे पितर तृप्त होते हैं।
- तुम्हीं मुक्ति देने वाली महाविद्या, शब्द रूपी वेद, और लोकों की पालन करने वाली वार्ता (कृषि-व्यापार की विद्या) हो।
- तुम्हीं मेधा (बुद्धि) हो, तुम्हीं दुर्गम भवसागर से पार करने वाली नाव "दुर्गा" हो, तुम्हीं विष्णु के हृदय में रहने वाली लक्ष्मी और शिव की पत्नी गौरी हो।
- शत्रु के मुख को देखकर भी तुम क्रोध में दया रखती हो: युद्ध में मरे असुर भी तुम्हारे शस्त्रों से पवित्र होकर स्वर्ग गए।
स्तुति के अन्त में देवताओं ने चारों ओर से रक्षा की प्रार्थना की:
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥
अर्थ: हे देवी, शूल से हमारी रक्षा करो; हे अम्बिके, तलवार से रक्षा करो; घण्टे की ध्वनि से और धनुष की टंकार से हमारी रक्षा करो।
फिर पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण, सब दिशाओं में, और तीनों लोकों में रक्षा की प्रार्थना की। देवताओं ने दिव्य फूलों, चन्दन और धूप से देवी की पूजा की।
देवी का वरदान
प्रसन्न होकर देवी ने कहा: हे देवताओं, जो चाहो माँगो। देवताओं ने कहा: हे भगवती, आपने हमारा सब काम पूरा कर दिया, शत्रु महिषासुर मारा गया। फिर भी यदि वर देना है, तो यह वर दीजिए:
- जब-जब हम आपका स्मरण करें, आप हमारी बड़ी से बड़ी आपत्तियाँ नष्ट करें।
- जो मनुष्य इन स्तोत्रों से आपकी स्तुति करे, उसे धन, ऐश्वर्य, सुख, समृद्धि, स्त्री और सन्तान से बढ़ाएँ, और सदा उस पर प्रसन्न रहें।
देवी ने "ऐसा ही हो" कहा और अन्तर्धान हो गईं। मेधा ऋषि ने राजा सुरथ से कहा: इस प्रकार देवताओं के शरीर से प्रकट हुई देवी की कथा मैंने कही। अब वे फिर गौरी के शरीर से कैसे प्रकट हुईं, वह सुनो (उत्तम चरित्र)।
इस अध्याय की सीख
- सफलता के बाद सबसे पहला काम कृतज्ञता है; देवताओं ने पहले स्तुति की, फिर वर माँगा।
- देवी हर अच्छे गुण में हैं: पुण्यात्मा के घर में लक्ष्मी, सज्जन में श्रद्धा, शुद्ध हृदय में बुद्धि।
- माँ दण्ड देते समय भी दया रखती है; शत्रु को भी पवित्र करती है।
- संकट में स्मरण करने पर ईश्वर अवश्य आते हैं; यह देवी का वचन है।
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