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श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय 7: चण्ड-मुण्ड वध और देवी का "चामुण्डा" नाम

अध्याय 7: चण्ड और मुण्ड आक्रमण करते हैं; देवी के क्रोध से टेढ़ी भौंहों वाले ललाट से भयंकर काली प्रकट होती हैं, जो सेना को निगल जाती हैं और दोनों का वध करती हैं; उनके सिर अम्बिका को भेंट करने पर उनका नाम "चामुण्डा" पड़ता है।

चित्रण: दुर्गा सप्तशती अध्याय 7: चण्ड-मुण्ड वध और देवी का "चामुण्डा" नाम
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सातवें अध्याय में देवी का सबसे उग्र रूप, काली, प्रकट होता है। इसी अध्याय से देवी का "चामुण्डा" नाम पड़ा, जो नवार्ण मन्त्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" में आता है।

चण्ड-मुण्ड का आक्रमण

शुम्भ की आज्ञा से चण्ड और मुण्ड चतुरंगिणी सेना लेकर हथियार उठाए चले। हिमालय की सुनहरी चोटी पर उन्होंने सिंह पर बैठी, मन्द-मन्द मुस्कुराती देवी को देखा। उन्हें देखकर असुर पकड़ने के लिए आगे बढ़े; कुछ धनुष ताने, कुछ तलवारें खींचे देवी के पास पहुँचे।

काली का प्राकट्य

तब अम्बिका ने शत्रुओं पर बड़ा क्रोध किया। क्रोध से उनका मुख काला पड़ गया। उनकी टेढ़ी भौंहों वाले ललाट से तुरन्त एक अत्यन्त भयंकर देवी प्रकट हुईं, जिनका मुख विकराल था, हाथों में तलवार और पाश थे। वे विचित्र खट्वांग (कपाल लगा दण्ड) धारण किए, नरमुण्डों की माला पहने, बाघ की खाल ओढ़े, सूखे माँस वाली, बहुत बड़े मुख वाली, लपलपाती जीभ वाली, धँसी हुई लाल आँखों वाली और अपनी गर्जना से दिशाओं को भरने वाली थीं। ये काली थीं।

काली का संहार

काली बड़े वेग से असुर सेना पर टूट पड़ीं और उसे निगलने लगीं। वे हाथियों को उनके महावतों, घण्टों और रक्षकों सहित एक हाथ से उठाकर मुख में डाल लेतीं। घोड़ों को रथों और सारथियों सहित मुख में डालकर दाँतों से चबा डालतीं। किसी को केश पकड़कर, किसी को गला पकड़कर, किसी को पैरों से कुचलकर और किसी को छाती से धक्का देकर मार डालतीं। असुरों के चलाए अस्त्र-शस्त्र भी उन्होंने मुख में लेकर चबा डाले।

चण्ड-मुण्ड का वध

अपनी सेना नष्ट होती देख चण्ड काली की ओर दौड़ा, और मुण्ड ने भयंकर बाणों और हज़ारों चक्रों से काली को ढक दिया। वे चक्र काली के मुख में ऐसे समा गए जैसे सूर्य के अनेक बिम्ब बादलों में समा जाते हैं। तब काली भयंकर अट्टहास करती हुई अपने बड़े सिंह पर चढ़कर चण्ड की ओर दौड़ीं, उसके केश पकड़कर तलवार से उसका सिर काट डाला। चण्ड को मरा देखकर मुण्ड दौड़ा, तो देवी ने उसे भी तलवार से मार गिराया। बची हुई सेना भय से भाग गई।

चामुण्डा नाम

तब काली ने चण्ड और मुण्ड के सिर हाथ में लेकर अम्बिका के पास जाकर प्रचण्ड अट्टहास के साथ कहा: मैंने चण्ड और मुण्ड नाम के इन दो महापशुओं को तुम्हें भेंट किया है; अब युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और निशुम्भ का वध तुम स्वयं करना।

अम्बिका ने मधुर वाणी में कहा: "यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता। चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥" — हे देवी, तुम चण्ड और मुण्ड को लेकर आई हो, इसलिए संसार में "चामुण्डा" नाम से प्रसिद्ध होगी।

इस अध्याय की सीख

  • काली का भयंकर रूप भक्तों के लिए नहीं, बुराई के लिए भयंकर है; माँ का क्रोध बच्चों की रक्षा के लिए है।
  • चण्ड (उग्रता, क्रोध) और मुण्ड (जड़ता, अहंकार का सिर) हमारे भीतर के दोषों के प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें देवी नष्ट करती हैं।
  • बड़े से बड़ा हथियार भी सत्य की शक्ति के मुख में समा जाता है।
  • काम के बाद श्रेय बाँटना: काली ने विजय अम्बिका को भेंट की, और अम्बिका ने काली को नाम दिया।

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