शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण रुद्र संहिता, सती खण्ड: सती-शिव विवाह, दक्ष यज्ञ और वीरभद्र
सती खण्ड: दक्ष के घर सती का जन्म, तप और शिव से विवाह, वन में श्रीराम की परीक्षा, दक्ष का द्वेष, शिव के बिना यज्ञ, सती का देह-त्याग और वीरभद्र द्वारा यज्ञ विध्वंस।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।सती खण्ड भगवान शिव और उनकी पहली पत्नी सती की कथा है: प्रेम, परीक्षा, अपमान और त्याग की कथा। यह बताती है कि अहंकार परिवार को कैसे तोड़ता है, और सच्चे प्रेम में सम्मान कितना आवश्यक है।
कामदेव और सन्ध्या
सृष्टि के बाद ब्रह्मा जी के मन से कामदेव और सन्ध्या उत्पन्न हुए। कामदेव को वरदान मिला कि उसके बाण सबको मोहित करेंगे। उसने अपनी शक्ति ब्रह्मा जी और ऋषियों पर ही आज़माई, जिससे वे मोहित हुए। शिव जी ने यह देखकर उन्हें धिक्कारा। ब्रह्मा जी को लगा कि शिव भी कभी मोहित हों, इसके लिए उन्हें पत्नी चाहिए। उन्होंने विष्णु जी के कहने पर देवी शिवा (आदि शक्ति) की तपस्या की, और देवी ने वरदान दिया कि मैं दक्ष की पुत्री बनकर शिव की पत्नी बनूँगी।
सती का जन्म और तप
प्रजापति दक्ष और उनकी पत्नी वीरिणी के घर देवी ने सती के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही सती शिव का ध्यान करती थीं। बड़ी होकर उन्होंने शिव को पति रूप में पाने के लिए नन्दा व्रत और कठोर तप किया। प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुए और उन्हें स्वीकार किया। ब्रह्मा जी की मध्यस्थता से दक्ष ने विवाह स्वीकार किया, और चैत्र मास में धूमधाम से सती और शिव का विवाह हुआ। शिव सती को लेकर कैलास चले गए, जहाँ दोनों ने आनन्द से बहुत समय बिताया।
सती द्वारा श्रीराम की परीक्षा
एक बार शिव और सती दण्डकारण्य से जा रहे थे। वहाँ श्रीराम सीता के वियोग में वन-वन भटक रहे थे और "हा सीते" कहकर विलाप कर रहे थे। शिव जी ने उन्हें दूर से प्रणाम किया और "जय सच्चिदानन्द" कहा। सती को आश्चर्य हुआ कि जो पत्नी के लिए साधारण मनुष्य की तरह रो रहा है, उसे शिव क्यों प्रणाम कर रहे हैं। शिव जी ने समझाया कि ये विष्णु के अवतार हैं, पर सती का सन्देह नहीं गया। शिव जी ने कहा: तो स्वयं परीक्षा ले लो।
सती ने सीता का रूप धरा और श्रीराम के सामने गईं। श्रीराम ने तुरन्त उन्हें पहचान लिया, प्रणाम किया और पूछा: माता, आप अकेली वन में क्यों घूम रही हैं, शिव जी कहाँ हैं? सती लज्जित होकर लौट आईं। शिव जी ने ध्यान में सब जान लिया। उन्होंने मन में संकल्प किया कि जिसने सीता (माता) का रूप धरा, उसे अब पत्नी भाव से स्वीकार नहीं करूँगा। वे समाधि में चले गए, और सती दुःख में रहने लगीं। (यही प्रसंग तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के बालकाण्ड में भी विस्तार से लिखा है।)
दक्ष का द्वेष
एक बार प्रयाग में ऋषियों और प्रजापतियों की सभा हुई। जब दक्ष आए तो सब खड़े हो गए, पर ब्रह्मा जी और शिव जी बैठे रहे। दक्ष को लगा कि दामाद होकर शिव ने उनका अपमान किया। उन्होंने शिव को भरी सभा में कटु वचन कहे और शाप दिया कि यज्ञों में शिव को भाग नहीं मिलेगा। नन्दी जी ने क्रोधित होकर दक्ष और उनका साथ देने वाले ब्राह्मणों को शाप दिया, और भृगु जी ने शिवगणों को। शिव जी शान्त रहकर सभा से चले गए।
दक्ष यज्ञ और सती का देह-त्याग
दक्ष ने कनखल (हरिद्वार के पास) में बहुत बड़ा यज्ञ किया, जिसमें सब देवताओं, ऋषियों और अपनी सब पुत्रियों को बुलाया, पर शिव और सती को नहीं। आकाश मार्ग से देवताओं को जाते देखकर सती ने पिता के यज्ञ में जाने की इच्छा की। शिव जी ने समझाया कि बिना बुलाए जाना ठीक नहीं, वहाँ अपमान होगा। पर सती नहीं मानीं, और शिव जी ने नन्दी और गणों के साथ उन्हें भेज दिया।
यज्ञ में पिता ने सती का आदर नहीं किया, केवल माँ और बहनों ने स्नेह दिखाया। सती ने देखा कि यज्ञ में शिव का भाग नहीं रखा गया। उन्होंने पिता को समझाया, पर दक्ष ने सबके सामने शिव का और अपमान किया। पति का अपमान सहन न कर सकने पर सती ने कहा कि दक्ष से मिले इस शरीर को मैं नहीं रखूँगी। उन्होंने योग द्वारा अपने शरीर में अग्नि प्रकट की और देह त्याग दी। मरते समय उन्होंने प्रार्थना की कि अगले जन्म में भी मुझे शिव ही पति रूप में मिलें।
वीरभद्र और यज्ञ विध्वंस
नारद जी से यह समाचार सुनकर शिव जी को भयंकर क्रोध आया। उन्होंने अपनी जटा का एक बाल पर्वत पर पटका, जिससे महाबली वीरभद्र और भयंकर महाकाली प्रकट हुए। वीरभद्र शिवगणों के साथ यज्ञ स्थल पहुँचे और यज्ञ नष्ट कर दिया। देवताओं और ऋषियों को दण्ड मिला, और वीरभद्र ने दक्ष का सिर काटकर यज्ञ की अग्नि में डाल दिया।
बाद में ब्रह्मा जी और विष्णु जी सब देवताओं के साथ कैलास गए और शिव जी की स्तुति करके क्षमा माँगी। शिव जी का क्रोध शान्त हुआ। वे यज्ञ स्थल आए, और दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित कर दिया। लज्जित दक्ष ने शिव जी की स्तुति की, और शिव जी को यज्ञ का भाग देकर यज्ञ पूरा हुआ। उसके बाद शिव जी सती के वियोग में हिमालय पर तपस्या में लीन हो गए।
इस खण्ड की सीख
- सन्देह होने पर परीक्षा लेने से पहले विश्वास करना सीखो; सती की एक परीक्षा ने बड़ा दुःख दिया।
- अहंकार सबसे निकट सम्बन्धों को भी तोड़ देता है; दक्ष का अभिमान पूरे परिवार का दुःख बना।
- जहाँ सम्मान न हो, वहाँ बिना बुलाए जाने से पहले विचार करना चाहिए।
- ईश्वर क्रोध में भी दया करते हैं: शिव ने अपमान करने वाले दक्ष को भी जीवनदान दिया।
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