शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण रुद्र संहिता, युद्ध खण्ड: त्रिपुरासुर, जलन्धर-वृन्दा, शंखचूड़ और अन्धकासुर
युद्ध खण्ड: एक बाण से त्रिपुर का दहन, जलन्धर और वृन्दा की कथा और तुलसी व शालग्राम की उत्पत्ति, शंखचूड़, अन्धकासुर जो भृंगी बने, और गजासुर।
अपनी भाषा में पढ़ें
English · বাংলা · मराठी · ગુજરાતી · ਪੰਜਾਬੀ · தமிழ் · తెలుగు · ಕನ್ನಡ · മലയാളം · ଓଡ଼ିଆ · नेपाली · اردو
अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।युद्ध खण्ड में भगवान शिव के उन युद्धों की कथाएँ हैं जिनमें उन्होंने देवताओं और संसार की रक्षा के लिए शक्तिशाली असुरों का अन्त किया। हर कथा में असुर किसी वरदान या पुण्य के बल पर अजेय हो जाते हैं, और उनका पतन उनके अपने अहंकार और अधर्म से होता है।
त्रिपुर दहन
तारकासुर के तीन पुत्र थे: तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से वरदान माँगा कि मय दानव उनके लिए तीन नगर बनाए, एक सोने का (स्वर्ग में), एक चाँदी का (आकाश में) और एक लोहे का (पृथ्वी पर), और ये तीनों नगर तभी नष्ट हों जब हज़ार वर्ष में एक बार एक सीध में आएँ और कोई एक ही बाण से तीनों को भेद दे।
आरम्भ में तीनों भाई धर्म से रहे और शिव के भक्त थे। पर समय के साथ वे अहंकारी हो गए और देवताओं को सताने लगे। विष्णु जी ने उनके बीच भ्रम फैलाने के लिए एक मायावी उपदेशक भेजा, जिससे वे धर्म से भटक गए। तब देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने युद्ध की तैयारी की: पृथ्वी उनका रथ बनी, सूर्य और चन्द्रमा पहिए, ब्रह्मा जी सारथी, वेद घोड़े, मेरु पर्वत धनुष, वासुकि डोरी, और स्वयं विष्णु बाण बने। जैसे ही तीनों नगर एक सीध में आए, शिव जी ने एक ही बाण से तीनों को भस्म कर दिया। इसीलिए वे "त्रिपुरारी" कहलाए। यह कार्तिक पूर्णिमा का दिन था, जिसे त्रिपुरारी पूर्णिमा या देव दीपावली कहते हैं। मय दानव शिव भक्त होने के कारण बचा लिया गया।
जलन्धर और वृन्दा
एक बार इन्द्र के अहंकार पर क्रोधित होकर शिव जी के तीसरे नेत्र से निकली अग्नि को उन्होंने समुद्र में डाल दिया। उससे एक बालक उत्पन्न हुआ, जिसे समुद्र ने पाला; उसका नाम जलन्धर पड़ा। वह महाबली असुर बना और कालनेमि की पुत्री वृन्दा से उसका विवाह हुआ। वृन्दा परम पतिव्रता और विष्णु भक्त थी; उसके पतिव्रत के बल से जलन्धर अजेय था।
जलन्धर ने देवताओं को जीत लिया और फिर पार्वती जी को पाने की इच्छा से कैलास पर चढ़ाई की। शिव और जलन्धर में भयंकर युद्ध हुआ, पर वृन्दा के सतीत्व के कारण वह मरता नहीं था। तब विष्णु जी ने जलन्धर का रूप धरकर वृन्दा का पतिव्रत भंग किया। उसी क्षण शिव जी ने अपने चक्र से जलन्धर का सिर काट दिया।
सत्य जानकर वृन्दा ने विष्णु जी को शाप दिया कि आप पत्थर बन जाएँ; इसीलिए विष्णु शालग्राम शिला के रूप में पूजे जाते हैं। वृन्दा ने स्वयं देह त्याग दी, और उसकी राख से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। विष्णु जी ने वरदान दिया कि तुलसी के बिना मेरी पूजा पूरी नहीं होगी, और तुलसी का विवाह शालग्राम से होगा। कार्तिक में तुलसी विवाह की परम्परा इसी से जुड़ी है।
शंखचूड़
शंखचूड़ दम्भ दानव का पुत्र था, जो पूर्व जन्म में श्रीकृष्ण का पार्षद सुदामा (गोप) था और शाप से असुर बना था। उसकी पत्नी तुलसी भी परम पतिव्रता थी, और उसके पास विष्णु जी का दिया एक कवच था। उसने देवताओं को सताया। शिव जी ने युद्ध किया, और विष्णु जी ने ब्राह्मण वेष में उससे कवच माँग लिया। तब शिव जी के त्रिशूल से शंखचूड़ का अन्त हुआ, और उसकी हड्डियों से शंख उत्पन्न हुए, जो देव पूजा में प्रयोग होते हैं (पर शिव पूजा में शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता, यह परम्परा इसी कथा से जुड़ी मानी जाती है)।
अन्धकासुर
एक बार पार्वती जी ने खेल में शिव जी के नेत्र बन्द कर दिए, जिससे सारे संसार में अन्धकार हो गया। उस अन्धकार से एक अन्धा बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम अन्धक पड़ा। शिव जी ने उसे सन्तानहीन असुर हिरण्याक्ष को दे दिया। बड़ा होकर अन्धक ने तप से वरदान पाया, दृष्टि भी पाई, और बहुत शक्तिशाली हो गया। अहंकार में वह यह भूल गया कि पार्वती उसकी माता हैं, और उन्हें पाने के लिए कैलास पर आक्रमण किया।
युद्ध में उसके रक्त की हर बूँद से नया अन्धक पैदा होता था। तब देवियों (मातृकाओं) ने उसका रक्त पी लिया, और शिव जी ने उसे त्रिशूल पर उठा लिया। हज़ारों वर्ष त्रिशूल पर लटके रहकर उसका अहंकार नष्ट हुआ और उसने शिव की स्तुति की। शिव जी ने उसे क्षमा करके अपना गण बनाया; वह "भृंगी" नाम से शिव के प्रमुख गणों में गिना गया।
गजासुर और अन्य
गजासुर (महिषासुर का पुत्र) ने काशी में शिव भक्तों को सताया। शिव जी ने उसका वध किया, और उसकी प्रार्थना पर उसकी खाल (गज-चर्म) धारण कर ली; इसलिए वे "कृत्तिवासा" कहलाए, और काशी में कृत्तिवासेश्वर लिंग स्थापित हुआ। इस खण्ड में दुन्दुभि-निर्ह्राद, विदल-उत्पल और बाणासुर के प्रसंग भी हैं; बाणासुर शिव भक्त था, और श्रीकृष्ण से युद्ध के बाद शिव जी की कृपा से उसके प्राण बचे।
इस खण्ड की सीख
- वरदान और शक्ति भी अधर्म के साथ टिकते नहीं; हर असुर का अन्त उसके अपने अहंकार से हुआ।
- जब सब शक्तियाँ एक लक्ष्य पर मिलती हैं (त्रिपुर दहन का रथ), तब असम्भव भी सम्भव होता है।
- तुलसी और शालग्राम की कथा पतिव्रता के सम्मान और देवताओं के भी अपने कर्मों के फल भोगने का सन्देश देती है।
- शिव शत्रु को भी पश्चात्ताप पर क्षमा करके अपना बना लेते हैं, जैसे अन्धक को भृंगी बनाया।
अंतिम अद्यतन:
आगे पढ़ें
श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय-दर-अध्याय: सभी 700 श्लोकों का भाव क्रम से सरल हिन्दी में, प्रमुख संस्कृत श्लोक अर्थ सहित और हर अध्याय की सीख। पढ़ें या सुनें।
श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य): मधु-कैटभ, महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज की कथा सहित सभी 13 अध्याय क्रम से, और नवरात्रि में पाठ की व…
गरुड़ पुराण: सरल हिन्दी में भाग-दर-भाग
गरुड़ पुराण शान्त और सरल भाषा में, क्रम से: गरुड़ जी के प्रश्न, मृत्यु के बाद जीव की यात्रा, कर्म और उनके फल, तेरह दिनों के संस्कार, दान का महत्त्व और मोक्ष का मार्ग।
हनुमान चालीसा: सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
गोस्वामी तुलसीदास रचित सम्पूर्ण हनुमान चालीसा, हर चौपाई के सरल अर्थ के साथ: कब पढ़ी जाती है और क्या सिखाती है।
श्रीराम स्तुति: श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन
गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीराम स्तुति "श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन": सम्पूर्ण पाठ, हर पद का सरल अर्थ, और यह कब गाई जाती है।