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ग्रन्थ अध्याय

शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में

शिव पुराण शतरुद्र संहिता: शिव के अवतार — नन्दी, भैरव, वीरभद्र, शरभ, हनुमान और किरात

शतरुद्र संहिता में शिव के अवतारों का वर्णन है: पाँच मुख, अर्धनारीश्वर, नन्दी, काशी के काल भैरव, वीरभद्र, नृसिंह को शान्त करने वाले शरभ, हनुमान, अश्वत्थामा और अर्जुन को आशीर्वाद देने वाले किरात।

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शतरुद्र संहिता में भगवान शिव के अनेक अवतारों और रूपों का वर्णन है। "शतरुद्र" का अर्थ है सौ रुद्र, यानी शिव के अनगिनत रूप। जैसे विष्णु धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं, वैसे ही शिव भी भक्तों की रक्षा और अहंकार के नाश के लिए अनेक रूप धरते हैं।

शिव के पाँच मुख (पंचब्रह्म)

सृष्टि के अलग-अलग कल्पों में शिव ब्रह्मा जी के सामने पाँच रूपों में प्रकट हुए, जो उनके पाँच मुख माने जाते हैं:

  • सद्योजात (पश्चिम मुख, श्वेत): सृष्टि का स्वरूप।
  • वामदेव (उत्तर मुख, लाल): पालन का स्वरूप।
  • अघोर (दक्षिण मुख, नीला-काला): संहार का स्वरूप।
  • तत्पुरुष (पूर्व मुख, पीला): तिरोभाव (छिपाने) का स्वरूप।
  • ईशान (ऊपर का मुख, स्फटिक जैसा): अनुग्रह (कृपा, मुक्ति) का स्वरूप।

शिव की आठ मूर्तियाँ (अष्टमूर्ति) भी बताई गई हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान (आत्मा)। यानी सारी प्रकृति शिव का ही शरीर है।

अर्धनारीश्वर

ब्रह्मा जी की सृष्टि आगे नहीं बढ़ रही थी, क्योंकि केवल पुरुष ही उत्पन्न हो रहे थे। उन्होंने शिव की तपस्या की। शिव जी आधे पुरुष और आधे स्त्री के रूप में, अर्धनारीश्वर बनकर प्रकट हुए। उन्होंने अपने स्त्री अंश (शक्ति) को अलग करके ब्रह्मा जी को दिखाया, और तब ब्रह्मा जी ने स्त्री-पुरुष के संयोग से सृष्टि आगे बढ़ाई। यह रूप बताता है कि शिव और शक्ति अलग नहीं, और पुरुष और स्त्री दोनों समान रूप से पूर्ण सृष्टि के अंग हैं।

नन्दी अवतार

शिलाद मुनि ने सन्तान के लिए शिव की तपस्या की। शिव जी ने स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। यज्ञ की भूमि जोतते समय एक दिव्य बालक मिला, जिसका नाम नन्दी (आनन्द देने वाला) रखा गया। मित्र और वरुण ऋषियों ने बताया कि इसकी आयु थोड़ी है। नन्दी ने भुवन नदी के तट पर शिव की घोर तपस्या की। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें अमर किया, अपने गणों का अध्यक्ष बनाया और अपना वाहन बनाया। इसीलिए हर शिव मन्दिर में नन्दी शिवलिंग की ओर मुख करके बैठे होते हैं।

काल भैरव अवतार

ब्रह्मा जी के अहंकार (और झूठ) पर शिव जी के क्रोध से भैरव प्रकट हुए। उन्होंने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर काट दिया। ब्रह्म-हत्या का पाप लगने से वह कपाल भैरव के हाथ से चिपक गया, और वे भिक्षु बनकर तीनों लोकों में घूमते रहे। जब वे काशी पहुँचे, तो कपाल हाथ से छूटकर गिर गया; वह स्थान "कपालमोचन" तीर्थ कहलाया। शिव जी ने भैरव को काशी का कोतवाल (रक्षक) बनाया। कहा जाता है कि काशी में रहने वालों के पाप-पुण्य का हिसाब भैरव रखते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को काल भैरव जयन्ती मनाई जाती है।

वीरभद्र अवतार

दक्ष यज्ञ में सती के देह-त्याग के बाद शिव की जटा से वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ का विध्वंस किया (सती खण्ड में विस्तार है)। वीरभद्र शिव के क्रोध और न्याय का रूप हैं।

शरभ अवतार

हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शान्त नहीं हो रहा था, और सारा संसार काँप उठा। देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने पहले वीरभद्र को भेजा, फिर स्वयं शरभ रूप धारण किया: आधा सिंह, आधा पक्षी, आठ पैरों वाला अद्भुत प्राणी। शरभ ने नृसिंह को शान्त किया, और नृसिंह ने अपने शान्त स्वरूप में शिव की स्तुति की। यह कथा बताती है कि क्रोध, चाहे धर्म के लिए हो, उसे भी शान्त होना चाहिए।

गृहपति अवतार

नर्मदा तट पर विश्वानर मुनि और उनकी पत्नी शुचिष्मती ने शिव जैसा पुत्र माँगा। शिव जी उनके पुत्र गृहपति बनकर जन्मे। नारद जी ने बताया कि बारहवें वर्ष में बिजली (या अग्नि) से संकट है। गृहपति ने काशी में शिव की तपस्या की, इन्द्र के वज्र से भी नहीं डरे, और शिव जी ने उन्हें अग्नि का स्वामी (अग्नीश्वर, दिक्पाल) बनाया।

हनुमान अवतार

शिव पुराण के अनुसार श्रीराम की सेवा के लिए भगवान शिव ने अपने ग्यारहवें रुद्र अंश से हनुमान के रूप में अवतार लिया। शिव जी का तेज पवनदेव द्वारा माता अंजनी के गर्भ में स्थापित हुआ, और केसरी के घर हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी ने श्रीराम के हर काम को सँवारा: सीता की खोज, लंका दहन, संजीवनी लाना। इसीलिए हनुमान चालीसा में उन्हें "शंकर सुवन केसरीनंदन" कहा गया है।

अश्वत्थामा

द्रोणाचार्य ने पुत्र के लिए शिव की तपस्या की, और शिव जी के अंश से अश्वत्थामा का जन्म हुआ। वे महाभारत के महान योद्धा और चिरंजीवी माने जाते हैं।

किरात अवतार

महाभारत में वनवास के समय अर्जुन ने दिव्य अस्त्र पाने के लिए इन्द्रकील पर्वत पर शिव की तपस्या की। मूक नाम का एक असुर सूअर बनकर अर्जुन को मारने आया। उसी समय शिव जी किरात (वनवासी शिकारी) का वेष धरकर आए। दोनों ने एक साथ सूअर पर बाण चलाया और सूअर मर गया। दोनों में विवाद हुआ कि सूअर किसके बाण से मरा, और युद्ध छिड़ गया। अर्जुन के सारे बाण निष्फल हो गए, धनुष भी छिन गया, और मल्ल-युद्ध में भी वे हार गए। तब उन्होंने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजा की, और जो माला चढ़ाई, वह किरात के गले में दिखाई दी। अर्जुन समझ गए कि किरात स्वयं शिव हैं। उन्होंने क्षमा माँगी, और शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें पाशुपत अस्त्र दिया।

अन्य अवतार

इस संहिता में शिव के और भी अनेक रूपों की कथाएँ हैं: पिप्पलाद मुनि (जिनके नाम से शनि पीड़ा शान्त होती मानी जाती है), वैश्यनाथ, द्विजेश्वर, यतिनाथ (हंस रूप), कृष्णदर्शन, अवधूतेश्वर (इन्द्र का अहंकार तोड़ा), भिक्षुवर्य, सुरेश्वर (उपमन्यु की परीक्षा), ब्रह्मचारी (पार्वती की परीक्षा), सुनटनर्तक (नर्तक बनकर हिमवान के घर पार्वती माँगी) और साधु वेष।

इस संहिता की सीख

  • सारी प्रकृति, पृथ्वी से सूर्य तक, शिव का ही रूप है; प्रकृति का सम्मान शिव पूजा है।
  • अर्धनारीश्वर बताते हैं कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं।
  • भैरव और शरभ की कथाएँ सिखाती हैं कि अहंकार और अनियन्त्रित क्रोध, दोनों को रोकना पड़ता है।
  • सच्चे भक्त की परीक्षा होती है, पर अन्त में उसे मनचाहा फल मिलता है, जैसे अर्जुन को पाशुपत।

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