शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण कोटिरुद्र संहिता: 12 ज्योतिर्लिंगों की कथाएँ और महाशिवरात्रि व्रत कथा
कोटिरुद्र संहिता में सोमनाथ से घृष्णेश्वर तक बारहों ज्योतिर्लिंगों की उत्पत्ति की कथाएँ, शिवरात्रि व्रत की व्याध (शिकारी) वाली कथा, और विष्णु जी को सुदर्शन चक्र मिलने का प्रसंग है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।कोटिरुद्र संहिता में भारत भर में फैले शिवलिंगों और विशेष रूप से बारह ज्योतिर्लिंगों की कथाएँ हैं। ज्योतिर्लिंग वे स्थान हैं जहाँ भगवान शिव स्वयं ज्योति (प्रकाश) रूप में प्रकट हुए। परम्परा है कि बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम का सुबह-शाम स्मरण करने से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
1. सोमनाथ (गुजरात, सौराष्ट्र)
दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 पुत्रियों (नक्षत्रों) का विवाह चन्द्रमा से किया। चन्द्रमा केवल रोहिणी से प्रेम करते थे और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते थे। दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय रोग का शाप दिया। चन्द्रमा ने प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग की स्थापना करके महामृत्युंजय मन्त्र से तप किया। शिव जी ने वरदान दिया कि एक पक्ष में तुम्हारी कलाएँ घटेंगी और दूसरे में बढ़ेंगी; इसी से शुक्ल और कृष्ण पक्ष होते हैं। चन्द्रमा (सोम) के स्वामी होने से यह लिंग सोमनाथ कहलाया।
2. मल्लिकार्जुन (आन्ध्र प्रदेश, श्रीशैलम)
गणेश जी के पहले विवाह से रूठकर कार्तिकेय क्रौंच पर्वत पर चले गए। माता पार्वती (मल्लिका) और शिव जी (अर्जुन) उन्हें मनाने वहाँ गए और ज्योति रूप में बस गए। कहा जाता है कि अमावस्या को शिव और पूर्णिमा को पार्वती वहाँ आते हैं।
3. महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश, उज्जैन)
अवन्ती नगरी में वेदप्रिय नाम के ब्राह्मण के चार पुत्र शिव भक्त थे। दूषण नाम के असुर ने नगर पर आक्रमण किया और ब्राह्मणों को सताने लगा। ब्राह्मणों ने पार्थिव शिवलिंग की पूजा की। तभी धरती फटी और शिव जी महाकाल रूप में प्रकट होकर दूषण को भस्म कर दिया। भक्तों की प्रार्थना पर वे वहीं बस गए। महाकाल एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, और यहाँ की भस्म आरती प्रसिद्ध है। इस संहिता में बालक श्रीकर की कथा भी है, जिसने राजा चन्द्रसेन की शिव पूजा देखकर पत्थर को शिवलिंग मानकर पूजा की और उसकी भक्ति से सोने का मन्दिर प्रकट हुआ।
4. ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश, नर्मदा तट)
विन्ध्य पर्वत ने अहंकार छोड़कर ओंकार यन्त्र बनाकर शिव की तपस्या की। शिव जी प्रकट हुए और दो रूपों में वहाँ बसे: ओंकारेश्वर और अमलेश्वर (ममलेश्वर)। नर्मदा के बीच का द्वीप ॐ के आकार का माना जाता है।
5. केदारनाथ (उत्तराखण्ड, हिमालय)
विष्णु जी के अवतार नर और नारायण ने बदरिकाश्रम में पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिव की पूजा की। शिव जी ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा, और उन्होंने प्रार्थना की कि आप यहीं ज्योति रूप में रहें। परम्परा में पाण्डवों की कथा भी जुड़ी है: महाभारत के बाद गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पाण्डव शिव को खोजने आए; शिव बैल बनकर छिपे, भीम ने पकड़ा, और बैल की पीठ (कूबड़) केदार में शिला रूप में रह गई।
6. भीमाशंकर (महाराष्ट्र, सह्याद्रि)
कुम्भकर्ण का पुत्र भीम अपने पिता की मृत्यु (श्रीराम द्वारा) का बदला लेने के लिए तप करके बलवान हुआ और कामरूप के शिव भक्त राजा सुदक्षिण को बन्दी बना लिया। राजा ने जेल में ही पार्थिव लिंग बनाकर पूजा की। भीम ने तलवार से लिंग पर प्रहार किया, तभी शिव जी प्रकट हुए और भीम को भस्म कर दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वे भीमाशंकर नाम से वहाँ बसे।
7. काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश, वाराणसी)
काशी शिव की प्रिय नगरी है, जिसे वे प्रलय में भी नष्ट नहीं होने देते और अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं। यहाँ शिव विश्वेश्वर (विश्व के स्वामी) रूप में हैं। मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले को स्वयं शिव तारक मन्त्र सुनाते हैं और मुक्ति मिलती है।
8. त्र्यम्बकेश्वर (महाराष्ट्र, नासिक)
गौतम ऋषि के आश्रम में अकाल के समय भी उनके तप से अन्न होता था। ईर्ष्यालु ऋषियों ने छल से एक मायावी गाय भेजी जो गौतम जी के छूते ही मर गई, और उन पर गो-हत्या का आरोप लगाया। गौतम जी ने प्रायश्चित्त के लिए शिव की तपस्या की और गंगा को माँगा। शिव जी ने गंगा को गोदावरी (गौतमी) के रूप में भेजा और स्वयं त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले) रूप में वहाँ बसे।
9. वैद्यनाथ (झारखण्ड, देवघर)
रावण ने कैलास पर शिव की तपस्या की और अपने सिर एक-एक करके काटकर चढ़ाने लगा। शिव जी प्रसन्न हुए, उसके सिर लौटाए और उसे अपना लिंग लंका ले जाने की अनुमति दी, इस शर्त के साथ कि जहाँ रखेगा, वहीं स्थापित हो जाएगा। रास्ते में देवताओं की योजना से रावण को लघुशंका लगी और उसने लिंग एक ग्वाले (विष्णु जी) को पकड़ाया, जिसने उसे वहीं रख दिया। लिंग वहीं स्थापित हो गया। रावण के घावों का उपचार करने के कारण शिव वैद्यनाथ कहलाए।
10. नागेश्वर (गुजरात, द्वारका के पास)
दारुक नाम का राक्षस और उसकी पत्नी दारुका दारुकावन में रहते थे। उन्होंने सुप्रिय नाम के शिव भक्त व्यापारी को साथियों सहित बन्दी बना लिया। सुप्रिय जेल में भी "ॐ नमः शिवाय" जपता रहा। राक्षस उसे मारने आया, तो शिव जी प्रकट हुए, राक्षसों का संहार किया और सुप्रिय को पाशुपत अस्त्र दिया। वहाँ शिव नागेश्वर रूप में बसे।
11. रामेश्वरम् (तमिलनाडु)
लंका पर चढ़ाई से पहले श्रीराम ने समुद्र तट पर बालू का शिवलिंग बनाकर शिव की पूजा की और विजय का आशीर्वाद माँगा। शिव जी प्रकट हुए और श्रीराम की प्रार्थना पर ज्योति रूप में वहीं बस गए। "रामेश्वर" का अर्थ बताया जाता है: राम के ईश्वर (शिव), और शिव कहते हैं: जिनके ईश्वर राम हैं। यह ज्योतिर्लिंग अयोध्या के श्रीराम से सीधे जुड़ा है।
12. घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र, एलोरा के पास)
सुधर्मा नाम के ब्राह्मण की पत्नी सुदेहा को सन्तान नहीं थी, इसलिए उसने अपनी बहन घुश्मा का विवाह पति से करा दिया। घुश्मा परम शिव भक्त थी और प्रतिदिन 101 पार्थिव लिंग बनाकर पूजा के बाद तालाब में विसर्जित करती थी। उसे पुत्र हुआ। ईर्ष्या से सुदेहा ने उस पुत्र को मारकर उसी तालाब में फेंक दिया। घुश्मा दुःखी होते हुए भी पूजा करती रही, और जब लिंग विसर्जित करने गई, तो पुत्र जीवित होकर तालाब से निकल आया। शिव जी प्रकट हुए; घुश्मा ने बहन के लिए क्षमा माँगी। शिव जी घुश्मेश्वर (घृष्णेश्वर) रूप में वहाँ बस गए।
शिवरात्रि व्रत की कथा: व्याध गुरुद्रुह
गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी परिवार के भोजन के लिए शिकार करने वन में गया। संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि थी। दिन भर कुछ न मिलने पर वह रात को एक जलाशय के पास बेल के पेड़ पर चढ़ गया, जिसके नीचे एक शिवलिंग था। रात के चारों प्रहरों में एक-एक करके हिरण आए: पहले एक हिरणी, फिर दूसरी, फिर एक हिरण। हर बार वह बाण चढ़ाता, तो उसके हिलने से बेलपत्र और पानी शिवलिंग पर गिरता, और अनजाने में पूजा हो जाती। हर हिरण ने विनती की कि मुझे अपने परिवार से मिलकर लौटने दो, और व्याध ने दया करके जाने दिया।
सुबह सारे हिरण सत्य के अनुसार लौट आए। उनकी सत्यनिष्ठा देखकर और अनजाने में हुए उपवास, जागरण और पूजा से व्याध का हृदय बदल गया। उसने हिंसा छोड़ दी। शिव जी प्रकट हुए और उसे "गुह" नाम देकर वरदान दिया कि अगले जन्म में श्रीराम उसके घर आएँगे और उससे मित्रता करेंगे (निषादराज गुह)। इसीलिए महाशिवरात्रि पर उपवास, रात्रि जागरण, चार प्रहर की पूजा और बिल्वपत्र चढ़ाने का विधान है।
विष्णु जी को सुदर्शन चक्र
दैत्यों से पीड़ित होकर विष्णु जी ने कैलास पर शिव की उपासना की और प्रतिदिन एक हज़ार कमल शिव सहस्रनाम के साथ चढ़ाने लगे। एक दिन शिव जी ने परीक्षा के लिए एक कमल छिपा दिया। एक कम पाकर विष्णु जी ने अपना एक नेत्र ("कमलनयन") निकालकर चढ़ाना चाहा। शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें सुदर्शन चक्र दिया।
इस संहिता की सीख
- भक्ति में स्थान, जाति या धन का भेद नहीं: व्यापारी, शिकारी, गृहिणी, सबको शिव ने अपनाया।
- अनजाने में की गई पूजा भी फल देती है, तो जानकर श्रद्धा से की गई पूजा का फल कितना होगा।
- ईर्ष्या और अन्याय के बीच भी धैर्य और भक्ति न छोड़ना, घुश्मा की तरह।
- श्रीराम और शिव एक-दूसरे के आराध्य हैं; रामेश्वरम् इसका प्रमाण है।
अंतिम अद्यतन:
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