शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण उमा संहिता: दान, कर्मफल, यम मार्ग और देवी उमा की महिमा
उमा संहिता: पुत्र के लिए श्रीकृष्ण द्वारा शिव की उपासना, दान के प्रकार और फल, पाप और उनके परिणाम, यमलोक का मार्ग, व्यास जी का जन्म, और महाकाली, महालक्ष्मी और दुर्गा रूप में देवी की महिमा।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।उमा संहिता का नाम देवी उमा (पार्वती) पर है। इसके दो भाग माने जा सकते हैं: पहले भाग में धर्म, दान, पाप-पुण्य और कर्मफल की शिक्षा है, और दूसरे भाग में देवी के अवतारों और उनकी विजयों का वर्णन है।
श्रीकृष्ण द्वारा शिव की उपासना
संहिता की शुरुआत श्रीकृष्ण की कथा से होती है। श्रीकृष्ण ने पुत्र की इच्छा से हिमालय पर उपमन्यु ऋषि के आश्रम में जाकर उनसे शिव दीक्षा ली और शिव की तपस्या की। शिव-पार्वती ने प्रकट होकर उन्हें पुत्र (साम्ब) का वरदान दिया। इससे यह सन्देश मिलता है कि विष्णु और शिव एक-दूसरे के उपासक हैं।
दान और उसका फल
उमा संहिता में दान को धर्म का बड़ा अंग बताया गया है:
- अन्नदान: सबसे श्रेष्ठ दान, क्योंकि अन्न ही प्राण है। भूखे को भोजन कराना किसी भी यज्ञ से बढ़कर है।
- जलदान: प्यासे को पानी पिलाना, कुएँ, तालाब और प्याऊ बनवाना।
- विद्यादान: ज्ञान देना, जो कभी नष्ट नहीं होता।
- गोदान, भूमिदान, वस्त्रदान: ज़रूरतमन्द को देना।
- दान सम्मान के साथ, बिना अहंकार के, योग्य व्यक्ति को और अपनी सामर्थ्य के अनुसार देना चाहिए; दिखावे का दान फल नहीं देता।
पाप, कर्मफल और नरक
इस संहिता में बताया गया है कि मन, वाणी और शरीर से किए पाप किस प्रकार फल देते हैं:
- मन के पाप: दूसरे का धन पाने का विचार, किसी का अनिष्ट सोचना, गलत को सही मानना।
- वाणी के पाप: झूठ, कठोर वचन, चुगली और व्यर्थ बकवास।
- शरीर के पाप: हिंसा, चोरी, पर-स्त्री गमन।
इनके फलस्वरूप अलग-अलग नरकों और अगले जन्मों में दुःख का वर्णन है। यह वर्णन डराने के लिए नहीं, सावधान करने के लिए है: हर कर्म का फल मिलता है।
यमलोक का मार्ग
मृत्यु के बाद जीव यमलोक की यात्रा करता है। पापी के लिए यह मार्ग कठिन, अन्धकार भरा और कष्टकारी है, जबकि पुण्यात्मा, दानी और शिव भक्त के लिए वही मार्ग सुगम और सुखद होता है। जो जीवन में जल, अन्न, छाया, वस्त्र और दीपक दान करते हैं, उन्हें उस मार्ग पर वही सुविधाएँ मिलती हैं। यमराज और चित्रगुप्त हर जीव के कर्मों का लेखा रखते हैं। (इसी तरह का विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में भी है।)
व्यास जी का जन्म और पुराणों की परम्परा
इस संहिता में पराशर ऋषि और सत्यवती से वेदव्यास जी के जन्म की कथा है, और बताया गया है कि हर द्वापर युग में एक व्यास होते हैं जो वेदों का विभाजन करते हैं। अठारह पुराणों और उनकी परम्परा का भी वर्णन है।
देवी उमा की महिमा
उमा संहिता के उत्तर भाग में देवी के अवतारों का वर्णन है, जो दुर्गा सप्तशती से मिलता है:
- महाकाली: विष्णु जी की योगनिद्रा के रूप में, मधु और कैटभ के वध के लिए विष्णु जी को जगाने वाली।
- महालक्ष्मी: सब देवताओं के तेज से प्रकट होकर महिषासुर का वध करने वाली।
- महासरस्वती: पार्वती जी के शरीर से प्रकट कौशिकी, जिन्होंने शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का वध किया।
दुर्गा नाम की कथा और शाकम्भरी
दुर्गम नाम के असुर ने तप से वेदों को अपने अधीन कर लिया। वेद लुप्त होने से यज्ञ बन्द हो गए और सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई; भयंकर अकाल पड़ा। ऋषियों की प्रार्थना पर देवी प्रकट हुईं। लोगों का दुःख देखकर उनकी अनेक आँखों से नौ दिनों तक आँसू बहते रहे, जिससे नदियाँ भर गईं; इसलिए वे "शताक्षी" कहलाईं। उन्होंने अपने शरीर से शाक (सब्ज़ियाँ), फल और अन्न उत्पन्न करके लोगों का पेट भरा, इसलिए "शाकम्भरी" कहलाईं। फिर उन्होंने दुर्गम असुर का वध करके वेद वापस दिलाए, और तभी से "दुर्गा" कहलाईं।
इस संहिता की सीख
- दान धर्म की नींव है; भूखे को भोजन और प्यासे को पानी सबसे बड़ा पुण्य है।
- पाप केवल शरीर से नहीं, मन और वाणी से भी होता है; तीनों की शुद्धि आवश्यक है।
- हर कर्म का हिसाब होता है; आज के अच्छे कर्म कल के मार्ग को सुगम बनाते हैं।
- देवी माँ अपने बच्चों के दुःख में रोती भी हैं और उन्हें भोजन भी देती हैं: शाकम्भरी करुणा का रूप है।
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