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शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में

शिव पुराण विद्येश्वर संहिता: शिव पुराण माहात्म्य, शिवलिंग, पंचाक्षर और रुद्राक्ष

शिव पुराण का पहला भाग: इस पुराण के श्रवण की महिमा, देवराज और चंचुला की कथा, ब्रह्मा-विष्णु के बीच अग्नि-स्तम्भ, शिवलिंग पूजा, "ॐ नमः शिवाय", रुद्राक्ष और भस्म।

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विद्येश्वर संहिता शिव पुराण का प्रवेश द्वार है। इसमें पहले बताया गया है कि कलियुग में मनुष्य का कल्याण कैसे हो, फिर शिवलिंग की उत्पत्ति की प्रसिद्ध कथा आती है, और अन्त में शिव पूजा की व्यावहारिक विधि: लिंग पूजा, पंचाक्षर मन्त्र, रुद्राक्ष और भस्म।

शिव पुराण माहात्म्य: कथा सुनने का फल

नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से पूछा: कलियुग में मनुष्य पाप में डूबे होंगे, आयु थोड़ी होगी, मन चंचल होगा; ऐसे में उनका उद्धार कैसे होगा? सूत जी ने कहा: शिव पुराण का श्रवण सबसे सरल और उत्तम उपाय है।

देवराज की कथा: किरात नगर में देवराज नाम का एक ब्राह्मण था, जो धर्म-कर्म छोड़कर धन के लोभ में हर तरह का पाप करता था। एक बार वह प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग के पास) गया, जहाँ एक शिवालय में शिव पुराण की कथा हो रही थी। वहाँ ज्वर से पीड़ित होकर वह एक महीने तक पड़ा रहा और अनजाने में ही कथा उसके कानों में पड़ती रही। मृत्यु के बाद यमदूत उसे ले जाने आए, पर शिवगणों ने उन्हें रोक दिया और देवराज को शिवलोक ले गए। सन्देश यह है कि अनजाने में सुनी कथा भी इतनी शक्तिशाली है, तो श्रद्धा से सुनी कथा का फल कितना होगा।

चंचुला और बिन्दुग की कथा: बाष्कल गाँव में बिन्दुग नाम का एक दुराचारी ब्राह्मण था, जिसकी पत्नी चंचुला भी पति की देखा-देखी गलत मार्ग पर चली गई। बिन्दुग मरकर पिशाच बना। बाद में चंचुला गोकर्ण तीर्थ गई, वहाँ शिव पुराण की कथा सुनी और पश्चात्ताप से भर गई। कथावाचक ब्राह्मण से उसने उपदेश लिया, शिव भक्ति में जीवन बिताया और शिवलोक पहुँची। वहाँ उसने माता पार्वती से अपने पति के उद्धार की प्रार्थना की। पार्वती जी की आज्ञा से गन्धर्व तुम्बुरु ने विन्ध्य पर्वत पर पिशाच बने बिन्दुग को शिव पुराण सुनाया और वह भी मुक्त हो गया।

कथा सुनने की विधि: माहात्म्य में बताया गया है कि कथा के लिए शुभ मुहूर्त, स्वच्छ स्थान और श्रद्धावान वक्ता हों; श्रोता संयम से रहें, कथा के दिनों में सात्त्विक भोजन करें और ध्यान से सुनें। परम्परा में इसे सात दिनों में सुनने की विधि है।

साध्य और साधन

प्रयाग में ऋषियों के पूछने पर सूत जी ने बताया कि सबसे बड़ा साध्य (लक्ष्य) शिव की प्राप्ति है और उसके तीन साधन हैं: श्रवण (शिव की कथा और गुण सुनना), कीर्तन (उनका नाम और यश गाना) और मनन (उनके बारे में चिन्तन करना)। जो ये तीनों नहीं कर सकता, वह शिवलिंग की पूजा करे; यह सबके लिए सुलभ है।

अग्नि-स्तम्भ की कथा: शिवलिंग की उत्पत्ति

एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में विवाद हुआ कि दोनों में बड़ा कौन है। विवाद युद्ध तक पहुँच गया। तभी दोनों के बीच एक अनन्त, जलता हुआ अग्नि का स्तम्भ प्रकट हुआ, जिसका न आदि दिखता था, न अन्त। दोनों ने तय किया कि जो इसका छोर ढूँढ लेगा, वही बड़ा होगा। विष्णु जी वराह (सूअर) बनकर नीचे गए और ब्रह्मा जी हंस बनकर ऊपर। हज़ारों वर्ष बाद भी विष्णु जी को अन्त नहीं मिला और वे लौट आए और सत्य स्वीकार किया। ब्रह्मा जी को ऊपर से गिरता हुआ केतकी का फूल मिला। उन्होंने उसे झूठी गवाही देने को राज़ी किया और आकर कहा कि मैंने स्तम्भ का ऊपरी छोर देख लिया।

तब उस स्तम्भ से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने विष्णु जी की सत्यता की प्रशंसा की और उन्हें अपने समान पूज्य बताया। ब्रह्मा जी के झूठ पर क्रोधित होकर उन्होंने भैरव को प्रकट किया, जिन्होंने ब्रह्मा जी का वह (पाँचवाँ) सिर काट दिया जिसने झूठ बोला था। विष्णु जी के कहने पर शिव जी ने ब्रह्मा जी को क्षमा किया, पर कहा कि उनकी पूजा अलग से नहीं होगी। केतकी के फूल को शाप मिला कि वह शिव पूजा में नहीं चढ़ेगा।

यह स्तम्भ ही पहला शिवलिंग था। यह घटना मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र में हुई, इसलिए वह दिन शिव का विशेष दिन है। शिव ने कहा कि इस निराकार-साकार रूप (लिंग) की पूजा करने वाला मेरे साक्षात रूप की पूजा का फल पाएगा।

शिवलिंग पूजा की विधि

  • शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें।
  • बिल्वपत्र, धतूरा, आक के फूल, चन्दन, अक्षत (चावल) और भस्म अर्पित करें।
  • पार्थिव (मिट्टी के बने) शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्त्व बताया गया है, विशेषकर कलियुग में।
  • पूजा के बाद लिंग की आधी परिक्रमा की जाती है; जलधारी (सोमसूत्र) को लाँघा नहीं जाता।
  • सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि पूजा के विशेष दिन हैं।

पंचाक्षर मन्त्र: ॐ नमः शिवाय

शिव पुराण "नमः शिवाय" (ॐ सहित षडक्षर) को सबसे महान मन्त्र बताता है। इसे कोई भी, किसी भी समय, श्रद्धा से जप सकता है। "न" "म" "शि" "वा" "य" पाँच अक्षर पाँच तत्त्वों और शिव के पाँच मुखों के प्रतीक माने गए हैं। प्रणव "ॐ" को शिव का स्वरूप कहा गया है।

रुद्राक्ष और भस्म

रुद्राक्ष: शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव ने हज़ारों वर्ष तप के बाद जब आँखें खोलीं, तो उनकी आँखों से गिरे आँसुओं से रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। एक मुखी से चौदह मुखी तक के रुद्राक्षों का वर्णन है, और हर एक को किसी देवता का प्रतीक बताया गया है। रुद्राक्ष पवित्रता के साथ धारण किया जाता है।

भस्म और त्रिपुण्ड: माथे पर भस्म की तीन आड़ी रेखाएँ (त्रिपुण्ड) शिव भक्त का चिह्न हैं। भस्म यह याद दिलाती है कि यह शरीर अन्त में राख है, इसलिए अहंकार व्यर्थ है।

वार, ग्रह और दान

इस संहिता में बताया गया है कि सप्ताह के सात वार शिव ने ग्रहों के अनुसार रचे, और हर वार की पूजा और दान का अलग फल है। अन्न, जल, वस्त्र और विद्या का दान सबसे उत्तम कहा गया है।

इस संहिता की सीख

  • अहंकार और झूठ सबसे बड़े देवता को भी नीचा कर देते हैं; सत्य बोलने वाले विष्णु पूज्य बने।
  • ईश्वर अनन्त हैं; उन्हें नापने का प्रयास नहीं, उनके सामने झुकना ही ज्ञान है।
  • शिव पूजा कठिन नहीं: एक लोटा जल, एक बिल्वपत्र और "ॐ नमः शिवाय"।
  • कथा सुनना, गाना और उस पर विचार करना, यही भक्ति के तीन सरल साधन हैं।

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