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शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में

शिव पुराण रुद्र संहिता, पार्वती खण्ड: पार्वती का तप, कामदेव दहन और शिव-पार्वती विवाह

पार्वती खण्ड: हिमवान और मैना के घर पार्वती का जन्म, नारद की भविष्यवाणी, तारकासुर का वरदान, कामदेव दहन, अपर्णा बनकर पार्वती का तप, शिव की परीक्षा और शिव-पार्वती विवाह।

चित्रण: शिव पुराण रुद्र संहिता, पार्वती खण्ड: पार्वती का तप, कामदेव दहन और शिव-पार्वती विवाह
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पार्वती खण्ड शिव पुराण का सबसे मधुर भाग है। सती ने जिस प्रार्थना के साथ देह छोड़ी थी, वह पूरी होती है: वे हिमालय की पुत्री पार्वती बनकर जन्म लेती हैं, अपने तप से शिव को फिर पाती हैं, और देवताओं की रक्षा के लिए शिव-पार्वती का विवाह होता है।

हिमवान, मैना और पार्वती का जन्म

पर्वतराज हिमवान का विवाह पितरों की पुत्री मैना से हुआ। मैना और उनकी बहनों को पूर्व जन्म में सनकादि ऋषियों का अनादर करने के कारण शाप मिला था, जो इस प्रकार वरदान में बदला कि मैना जगदम्बा की माता बनेंगी। हिमवान और मैना ने देवी की उपासना की, और देवी ने उनकी पुत्री बनकर जन्म लिया। उनका नाम पार्वती (पर्वत की पुत्री) रखा गया; उन्हें उमा, गौरी और शैलजा भी कहते हैं।

नारद जी की भविष्यवाणी

एक दिन नारद जी हिमवान के घर आए। पार्वती का हाथ देखकर उन्होंने कहा: इसका पति योगी, नग्न, निर्गुण, अमंगल वेष वाला होगा। मैना दुःखी हुईं, पर नारद जी ने समझाया कि ये सारे लक्षण भगवान शिव के हैं, और शिव से विवाह इसके लिए परम सौभाग्य है। पार्वती के मन में तभी से शिव बस गए। पिता की आज्ञा से वे तपस्या में लीन शिव की सेवा करने लगीं, पर शिव समाधि से नहीं जागे।

तारकासुर का वरदान

उधर तारकासुर नाम के असुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान माँगा कि उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों हो। वह जानता था कि सती के वियोग में शिव तपस्या में हैं और विवाह नहीं करेंगे। वरदान पाकर उसने तीनों लोक जीत लिए और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवता ब्रह्मा जी के पास गए, और ब्रह्मा जी ने कहा कि शिव का विवाह पार्वती से होने पर ही उपाय होगा।

कामदेव दहन

देवताओं ने इन्द्र के कहने पर कामदेव को भेजा कि वह शिव के मन में पार्वती के प्रति प्रेम जगाए। कामदेव अपनी पत्नी रति और मित्र वसन्त के साथ गया। जब पार्वती शिव की पूजा के लिए आईं, कामदेव ने अपना पुष्प-बाण चलाया। शिव का मन क्षण भर के लिए विचलित हुआ, और उन्होंने देखा कि यह किसका काम है। कामदेव को देखकर क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुला और उससे निकली अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया।

रति विलाप करने लगीं। देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने कहा कि कामदेव बिना शरीर के (अनंग बनकर) सबके मन में रहेगा, और द्वापर में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर शरीर पाएगा। शिव फिर वहाँ से अन्तर्धान हो गए।

पार्वती का तप

पार्वती ने समझ लिया कि शिव बाहरी सुन्दरता से नहीं, तप और प्रेम से मिलेंगे। माता के रोकने पर भी ("उ मा", अरी, ऐसा मत कर, इसी से उमा नाम पड़ा) वे वन में तप करने चली गईं। उन्होंने पहले फल खाकर, फिर केवल पत्ते खाकर, और अन्त में पत्ते भी छोड़कर कठोर तप किया; इसीलिए उनका नाम "अपर्णा" पड़ा। गर्मी में अग्नि के बीच, सर्दी में जल में खड़ी होकर उन्होंने हज़ारों वर्ष तप किया। उनके तप से तीनों लोक तप्त हो गए।

शिव की परीक्षा

शिव जी ने पहले सप्तर्षियों को परीक्षा के लिए भेजा, जिन्होंने शिव की बुराई करके पार्वती को डिगाना चाहा, पर वे अडिग रहीं। फिर शिव स्वयं एक वृद्ध ब्रह्मचारी का वेष धरकर आए। उन्होंने कहा: तुम इतनी सुन्दर राजकुमारी उस श्मशानवासी, भस्म लगाने वाले, साँप लपेटे, बैल पर चढ़ने वाले, जिसके माता-पिता और कुल का पता नहीं, उस शिव के लिए क्यों तप कर रही हो?

पार्वती क्रोधित होकर बोलीं: तुम शिव को नहीं जानते। वे सबके आदि हैं, उनका कुल कोई क्या पूछे? जो उनकी निन्दा करता है और जो सुनता है, दोनों पाप के भागी हैं। मैं यहाँ से चली जाऊँगी। जैसे ही वे जाने लगीं, शिव जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए और बोले: मैं तुम्हारे तप और प्रेम से जीत लिया गया हूँ; तुम्हारा दास हूँ।

विवाह की तैयारी और अनोखी बारात

शिव जी ने सप्तर्षियों को हिमवान के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर भेजा। हिमवान और मैना प्रसन्न हुए, और विवाह की तिथि तय हुई। शिव जी की बारात अद्भुत थी: एक ओर ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और सब देवता, दूसरी ओर भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल और विचित्र रूपों वाले शिवगण। स्वयं शिव भस्म लगाए, बाघम्बर पहने, साँपों के आभूषण, जटा में गंगा और चन्द्रमा, बैल पर सवार।

यह रूप देखकर मैना मूर्छित हो गईं और विवाह से इनकार करने लगीं। नारद जी और देवताओं ने समझाया। पार्वती की प्रार्थना पर शिव जी ने अत्यन्त सुन्दर, करोड़ों कामदेवों से भी मोहक रूप धारण किया। मैना ने यह रूप देखकर विवाह स्वीकार कर लिया।

शिव-पार्वती विवाह

वेद मन्त्रों के साथ, ब्रह्मा जी के पौरोहित्य में हिमवान ने पार्वती का हाथ शिव जी के हाथ में दिया। देवताओं ने फूल बरसाए। विदाई के समय मैना और हिमवान ने रोते हुए पुत्री को विदा किया, और शिव पार्वती को लेकर कैलास आए। रति की प्रार्थना पर शिव जी ने कामदेव को भी फिर आशीर्वाद दिया।

इस खण्ड की सीख

  • सच्चा प्रेम बाहरी रूप पर नहीं, गुणों पर टिका होता है; पार्वती ने शिव के स्वरूप को नहीं, उनके तत्त्व को चुना।
  • दृढ़ संकल्प और तप से असम्भव भी सम्भव होता है।
  • जिसे हम प्रेम करते हैं, उसकी निन्दा सुनना भी स्वीकार नहीं करना चाहिए।
  • विवाह में दोनों परिवारों का सम्मान और माता-पिता की सहमति का महत्त्व; शिव ने मैना को मनाने के लिए अपना रूप भी बदला।

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