शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण कैलास संहिता: ॐकार (प्रणव) का अर्थ, संन्यास और शिव उपासना
कैलास संहिता: पार्वती जी का शिव से ॐकार का अर्थ पूछना, वामदेव मुनि के कार्तिकेय से प्रश्न, संन्यास की विधि, शिव की आन्तरिक उपासना और "शिवोऽहम्" का ज्ञान।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।कैलास संहिता शिव पुराण का दार्शनिक भाग है। पहले की संहिताओं में कथाएँ हैं; यहाँ उन कथाओं के पीछे का सार बताया गया है: ॐ का अर्थ क्या है, संन्यास क्या है, और शिव की सच्ची उपासना भीतर कैसे होती है।
पार्वती जी का प्रश्न
कैलास पर पार्वती जी ने शिव जी से पूछा: आपने अनेक मन्त्र और विधियाँ बताईं, पर इन सबका मूल क्या है? शिव जी ने उत्तर दिया: सब मन्त्रों का मूल प्रणव (ॐ) है। ॐ ही मेरा स्वरूप है, ॐ ही वेदों का सार है, और ॐ के ज्ञान से ही मुक्ति होती है।
ॐकार का अर्थ
ॐ तीन मात्राओं से बना है: अ, उ और म, और इनके बाद आता है अर्धमात्रा (बिन्दु और नाद)।
- अ: जाग्रत अवस्था, सृष्टि, ब्रह्मा।
- उ: स्वप्न अवस्था, पालन, विष्णु।
- म: सुषुप्ति (गहरी नींद), संहार, रुद्र।
- अर्धमात्रा (बिन्दु-नाद): तुरीय, चौथी अवस्था, जो तीनों से परे है: शुद्ध शिव तत्त्व।
ॐ का जप करते हुए साधक इन अवस्थाओं से ऊपर उठकर उस मौन में पहुँचता है जो ॐ के बाद आता है। इसलिए ॐ को "तारक" (पार उतारने वाला) मन्त्र कहा गया है।
वामदेव मुनि और कार्तिकेय
महान ज्ञानी वामदेव मुनि ने कैलास पर कार्तिकेय (स्कन्द) से प्रणव और शिव तत्त्व के बारे में पूछा। स्कन्द जी ने उन्हें विस्तार से समझाया: शिव ही सब कुछ हैं, जीव और शिव में वास्तव में भेद नहीं, केवल अज्ञान का पर्दा है। जैसे घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का आकाश एक ही है, वैसे ही शरीर के भीतर का चैतन्य और परम शिव एक ही हैं।
संन्यास की विधि
इस संहिता में संन्यास लेने की विधि बताई गई है: पहले वैराग्य, फिर गुरु से दीक्षा, फिर पूर्व जीवन के बन्धनों का त्याग, और प्रणव का निरन्तर जप। पर साथ ही यह भी कहा गया है कि सच्चा संन्यास बाहरी वेष से नहीं, अहंकार और आसक्ति के त्याग से होता है। गृहस्थ भी मन से विरक्त रहकर शिव का ध्यान कर सकता है।
शिव की आन्तरिक पूजा
बाहरी पूजा (जल, बिल्वपत्र, आरती) आरम्भ है; उसका अन्तिम रूप आन्तरिक पूजा है:
- हृदय को मन्दिर, मन को शिवलिंग और भक्ति को जल मानकर पूजा करना।
- इन्द्रियों के विषयों को फूलों की तरह शिव को अर्पित करना।
- श्वास के साथ "सोऽहम्" या "शिवोऽहम्" का भाव रखना।
- सब प्राणियों में शिव को देखना और उनकी सेवा करना।
शिवोऽहम्: मैं शिव हूँ
कैलास संहिता का अन्तिम सन्देश है: जो साधक प्रणव के अर्थ को जानकर, गुरु की कृपा से अपने भीतर शिव का अनुभव करता है, वह कहता है "शिवोऽहम्", मैं शिव हूँ। यह अहंकार नहीं, अहंकार का पूरी तरह मिट जाना है, क्योंकि "मैं" की जगह केवल शिव रह जाते हैं।
इस संहिता की सीख
- ॐ सबसे सरल और सबसे गहरा मन्त्र है; इसका प्रतिदिन कुछ मिनट जप मन को शान्त करता है।
- सच्चा संन्यास वेष नहीं, मन की स्थिति है।
- बाहरी पूजा से आरम्भ करें, पर उसे भीतर की पूजा तक ले जाएँ।
- हर प्राणी में शिव का अंश है; इसलिए सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।
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