शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण वायवीय संहिता: शिव तत्त्व, पशु-पाश-पति, पाशुपत योग और उपमन्यु की कथा
शिव पुराण का अन्तिम भाग, वायु देव द्वारा कथित: शिव पति, जीव पशु और बन्धन पाश, पाशुपत व्रत और शिव योग, बालक उपमन्यु की कथा, और पंचाक्षर से शिव पूजा की विधि।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।वायवीय संहिता शिव पुराण का अन्तिम और सबसे गहन भाग है। इसे वायु देव ने नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाया, इसलिए यह "वायवीय" कहलाती है। इसके दो खण्ड हैं: पूर्व खण्ड में शिव तत्त्व का दर्शन और सृष्टि, और उत्तर खण्ड में शिव उपासना, योग और भक्ति की विधि।
नैमिषारण्य की कथा
ब्रह्मा जी ने ऋषियों से कहा कि मैं एक मनोमय चक्र छोड़ता हूँ; जहाँ इसकी नेमि (धुरी) गिरेगी, वही तप के लिए सबसे पवित्र स्थान होगा। चक्र जहाँ गिरा, वह "नैमिष" या नैमिषारण्य कहलाया (वर्तमान उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में)। वहीं ऋषियों ने लम्बा यज्ञ किया, और यज्ञ के अन्त में वायु देव ने उन्हें यह संहिता सुनाई।
पति, पशु और पाश
वायवीय संहिता शैव दर्शन के तीन मूल तत्त्व बताती है:
- पति: भगवान शिव, जो सबके स्वामी, सर्वज्ञ और स्वतन्त्र हैं।
- पशु: जीव, जो अपनी सीमाओं में बँधे हैं। ब्रह्मा से लेकर तिनके तक सब जीव पशु हैं, और शिव उनके स्वामी "पशुपति" हैं।
- पाश: वे बन्धन जो जीव को बाँधते हैं: अज्ञान (आणव मल), कर्म (कर्म मल) और माया (माया मल)।
जीव का लक्ष्य शिव की कृपा से इन पाशों को काटकर अपने वास्तविक शिव स्वरूप को पहचानना है। यह कृपा भक्ति, ज्ञान और गुरु दीक्षा से मिलती है।
पाशुपत व्रत
पाशुपत व्रत शिव उपासना का विशेष व्रत है, जिसमें साधक भस्म धारण करता है, "अग्निरिति भस्म" आदि मन्त्रों से शरीर पर भस्म लगाता है, संयम और सादगी से रहता है, और निरन्तर शिव का ध्यान करता है। इसका उद्देश्य है "पशु" भाव से मुक्त होकर "पति" की ओर जाना। इस व्रत को बारह वर्ष, एक वर्ष, या बारह दिन तक भी करने का वर्णन है।
उपमन्यु की कथा
व्याघ्रपाद मुनि के पुत्र उपमन्यु बचपन में अपने मामा के घर गए, जहाँ उन्होंने गाय का दूध पिया। घर लौटकर उन्होंने माँ से दूध माँगा, पर गरीबी के कारण माँ ने आटे को पानी में घोलकर दिया। बालक ने कहा: यह दूध नहीं है। माँ ने रोते हुए कहा: बेटा, हम वनवासी तपस्वी हैं, हमारे पास दूध कहाँ? दूध तो शिव की कृपा से ही मिल सकता है।
बालक उपमन्यु ने उसी क्षण शिव की तपस्या आरम्भ कर दी। उन्होंने केवल वायु पीकर, एक पैर पर खड़े होकर "ॐ नमः शिवाय" का जप किया। उनके तप से संसार तपने लगा। शिव जी परीक्षा के लिए इन्द्र का रूप धरकर आए और बोले: शिव को छोड़ो, मेरी पूजा करो, मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा। उपमन्यु ने कहा: मुझे शिव के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए; यदि आप शिव की निन्दा करेंगे तो मैं आपको भस्म कर दूँगा या स्वयं प्राण त्याग दूँगा।
उनकी अटल भक्ति देखकर शिव-पार्वती प्रकट हुए। शिव जी ने उन्हें क्षीर सागर (दूध का समुद्र) दे दिया, अमरता दी और अपने गणों में स्थान दिया। यही उपमन्यु आगे चलकर श्रीकृष्ण के शिव-गुरु बने (उमा संहिता में यह प्रसंग है)।
शिव योग और ध्यान
उत्तर खण्ड में शिव योग का विस्तार है: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। साधक हृदय कमल में शिव का ध्यान करता है: पाँच मुख, तीन नेत्र, गले में नीला चिह्न (नीलकण्ठ), जटा में चन्द्रमा और गंगा, हाथों में त्रिशूल, डमरू, वर और अभय मुद्रा।
पंचाक्षर से पूजा की विधि
वायवीय संहिता में पंचाक्षर मन्त्र से शिव पूजा की पूरी विधि दी गई है: स्नान और शुद्धि, भस्म और रुद्राक्ष धारण, आसन पर बैठकर संकल्प, गणेश पूजन, शिवलिंग का अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, धूप, दीप, नैवेद्य, पंचाक्षर का जप (108 बार या अधिक), आरती और प्रदक्षिणा, और अन्त में क्षमा प्रार्थना। साथ में कहा गया है कि यदि साधन न हों, तो मन से की गई मानसिक पूजा भी उतनी ही फलदायी है।
शिव पुराण का समापन
अन्त में सूत जी बताते हैं कि जो इस सम्पूर्ण शिव पुराण को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, वह इस लोक में सुख और अन्त में शिव का सान्निध्य पाता है।
इस संहिता की सीख
- हम सब "पशु" हैं, अपनी आदतों, अज्ञान और इच्छाओं से बँधे; शिव "पशुपति" हमें इनसे मुक्त करते हैं।
- बालक उपमन्यु की तरह अटल भक्ति के आगे ईश्वर भी झुकते हैं; भक्ति में उम्र बाधा नहीं।
- गरीबी में भी माँ ने बच्चे को ईश्वर की ओर मोड़ा; सबसे बड़ी सम्पत्ति आस्था है।
- साधन न हों तो मन से की गई पूजा भी पूरी पूजा है।
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