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शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में

शिव पुराण रुद्र संहिता, कुमार खण्ड: कार्तिकेय जन्म, तारकासुर वध और गणेश जन्म कथा

कुमार खण्ड: कार्तिकेय का जन्म और कृत्तिकाओं द्वारा पालन, तारकासुर वध, पार्वती द्वारा गणेश की रचना, गजमुख, प्रथम पूज्य का वरदान और माता-पिता की परिक्रमा।

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कुमार खण्ड शिव-पार्वती के दोनों पुत्रों की कथा है: देवताओं के सेनापति कार्तिकेय, जिन्होंने तारकासुर का वध किया, और विघ्नहर्ता गणेश, जो हर शुभ काम में सबसे पहले पूजे जाते हैं।

कार्तिकेय का जन्म

विवाह के बाद शिव और पार्वती बहुत समय तक कैलास पर एकान्त में रहे। तारकासुर से पीड़ित देवता अधीर हो गए और अग्निदेव को भेजा। शिव जी का तेज (वीर्य) अग्निदेव ने ग्रहण किया, पर उसका ताप सहन न कर सके और उसे गंगा जी में छोड़ दिया। गंगा जी भी उसे न सह सकीं और उन्होंने उसे सरकण्डों के वन (शरवण) में रख दिया। वहाँ एक अत्यन्त तेजस्वी बालक प्रकट हुआ।

उस समय छह कृत्तिकाएँ (कृत्तिका नक्षत्र की देवियाँ) वहाँ स्नान करने आईं। सबने बालक को अपना पुत्र मानकर दूध पिलाना चाहा, तो बालक ने छह मुख धारण कर लिए। इसलिए उनके नाम हुए: कार्तिकेय (कृत्तिकाओं के पुत्र), षडानन (छह मुख वाले), शरवणभव, स्कन्द और कुमार। नारद जी से समाचार पाकर शिव-पार्वती ने उन्हें कैलास बुलाया, और बड़े उत्सव के साथ उनका स्वागत हुआ।

तारकासुर वध

देवताओं ने बालक कार्तिकेय को अपना सेनापति बनाया। शिव जी ने उन्हें शक्ति (भाला) दी, और मोर उनका वाहन बना। देवताओं और असुरों में भयंकर युद्ध हुआ। तारकासुर ने इन्द्र, विष्णु और अन्य देवताओं को भी पीछे धकेल दिया। अन्त में कुमार कार्तिकेय ने अपनी शक्ति से तारकासुर का वध किया। देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिला। कार्तिकेय ने बाणासुर से पीड़ित क्रौंच पर्वत की भी रक्षा की और प्रलम्ब आदि असुरों का भी वध किया।

गणेश जी का जन्म

एक बार पार्वती जी स्नान करने जा रही थीं। उनकी सखियों जया और विजया ने कहा कि नन्दी आदि सारे गण शिव जी के हैं, हमारा अपना कोई गण नहीं जो हमारी आज्ञा माने। पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन (मैल) से एक सुन्दर, बलवान बालक बनाया और उसमें प्राण डाले। उन्होंने उसे अपना पुत्र कहा और द्वार पर खड़ा करके कहा: मेरी आज्ञा के बिना किसी को भीतर मत आने देना।

तभी शिव जी आए। बालक ने उन्हें रोक दिया, क्योंकि वह उन्हें नहीं जानता था। शिव जी ने गणों को भेजा; बालक ने अकेले ही सबको हरा दिया। फिर देवता आए, विष्णु जी भी आए, पर बालक अडिग रहा। अन्त में युद्ध में शिव जी ने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया।

पार्वती का क्रोध और गजमुख

यह जानकर पार्वती जी को भयंकर क्रोध आया। उन्होंने अनेक शक्तियाँ प्रकट कीं जो संहार करने लगीं। देवता और ऋषि डर गए और नारद जी के साथ पार्वती जी से क्षमा माँगी। पार्वती जी ने कहा: मेरा पुत्र जीवित हो और सब देवताओं में पूज्य हो, तभी शान्ति होगी।

शिव जी ने गणों को उत्तर दिशा में भेजा और कहा कि जो पहला प्राणी मिले, उसका सिर ले आओ। उन्हें एक हाथी (गज) मिला, जिसका एक दाँत था। उसका सिर लाकर बालक के धड़ पर लगाया गया, और शिव जी ने उसे जीवित कर दिया। शिव जी ने उसे अपना पुत्र स्वीकार किया और अपने गणों का स्वामी (गणपति, गणेश) बनाया।

प्रथम पूज्य का वरदान

सब देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया। शिव जी ने वरदान दिया कि हर शुभ कार्य और पूजा में सबसे पहले गणेश की पूजा होगी; उनकी पूजा के बिना किया गया काम सफल नहीं होगा। वे विघ्नहर्ता (बाधाएँ दूर करने वाले) कहलाएँगे। गणेश चतुर्थी का व्रत और पूजा भी इसी प्रसंग से जुड़ी है; चतुर्थी तिथि गणेश जी को प्रिय मानी गई।

माता-पिता की परिक्रमा

जब दोनों पुत्र बड़े हुए, तो दोनों का विवाह करने का प्रश्न उठा। दोनों पहले विवाह करना चाहते थे। शिव-पार्वती ने कहा: जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, उसका विवाह पहले होगा। कार्तिकेय तुरन्त अपने मोर पर बैठकर निकल पड़े। गणेश जी का वाहन चूहा था। उन्होंने सोचा, फिर स्नान करके माता-पिता को आसन पर बैठाया, उनकी पूजा की और उनकी सात परिक्रमाएँ कर लीं।

उन्होंने कहा: शास्त्र कहते हैं कि माता-पिता की परिक्रमा पृथ्वी की परिक्रमा के समान है; मेरे लिए आप ही सारा संसार हैं। शिव-पार्वती उनकी बुद्धि से प्रसन्न हुए, और प्रजापति विश्वरूप की दो पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से गणेश जी का विवाह हुआ। उनके दो पुत्र हुए, क्षेम और लाभ।

जब कार्तिकेय लौटे और यह सब देखा, तो वे दुःखी होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए। माता-पिता उनसे मिलने वहाँ गए; वही स्थान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कहलाया (कोटिरुद्र संहिता में यह कथा है)।

इस खण्ड की सीख

  • गणेश जी ने आज्ञा पालन के लिए स्वयं शिव का भी सामना किया; कर्तव्य निष्ठा सबसे बड़ा गुण है।
  • बुद्धि बल से बड़ी है; गणेश जी ने छोटे वाहन से भी परिक्रमा जीत ली।
  • माता-पिता ही सबसे बड़ा तीर्थ हैं; उनकी सेवा सब तीर्थों के समान है।
  • हर शुभ काम में पहले गणेश, यानी पहले विवेक और विघ्नों पर विचार।

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