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श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

भागवत पुराण दशम स्कन्ध: सम्पूर्ण श्रीकृष्ण लीला — जन्म, ब्रज, मथुरा और द्वारका

दशम स्कन्ध (90 अध्याय), भागवत का हृदय: कृष्ण जन्म, गोकुल-वृन्दावन की लीलाएँ, गोवर्धन, रास और गोपी गीत, कंस वध, उद्धव का ब्रज जाना, द्वारका, रुक्मिणी, सुदामा, और कुरुक्षेत्र में ब्रजवासियों से भेंट।

चित्रण: भागवत पुराण दशम स्कन्ध: सम्पूर्ण श्रीकृष्ण लीला — जन्म, ब्रज, मथुरा और द्वारका
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दशम स्कन्ध भागवत का हृदय है; अकेले इसमें 90 अध्याय हैं। भागवत सप्ताह में चौथे से छठे दिन तक यही कथा चलती है। इसके दो भाग हैं: पूर्वार्ध (अध्याय 1 से 49) में जन्म से मथुरा तक, और उत्तरार्ध (अध्याय 50 से 90) में द्वारका की लीलाएँ।

पूर्वार्ध, अध्याय 1 से 4: जन्म

कंस अपनी बहन देवकी को विवाह के बाद रथ में विदा कर रहा था, तभी आकाशवाणी हुई कि इसका आठवाँ पुत्र तुझे मारेगा। कंस ने देवकी-वसुदेव को कारागार में डाला और छह पुत्र मार डाले। सातवें (बलराम) को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में भेजा। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, आधी रात को भगवान चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, फिर माता के कहने पर साधारण शिशु बन गए। कारागार के ताले खुल गए, पहरेदार सो गए; वसुदेव शिशु को टोकरी में रखकर बाढ़ भरी यमुना पार गोकुल ले गए, जहाँ शेषनाग ने वर्षा से छाया की और यमुना ने मार्ग दिया। यशोदा की पुत्री (योगमाया) को लाए, जो कंस के हाथ से छूटकर आकाश में चेतावनी देकर चली गई।

अध्याय 5 से 11: गोकुल की बाल लीलाएँ

  • नन्दोत्सव: नन्द बाबा के घर पुत्र जन्म का उत्सव।
  • पूतना वध, शकटासुर, तृणावर्त (बवण्डर रूपी असुर)।
  • नामकरण: गर्गाचार्य ने गुप्त रूप से नाम रखा "कृष्ण" और बड़े भाई का "बलराम"।
  • माखन चोरी: गोपियों के घरों से माखन चुराना, बन्दरों को खिलाना; गोपियाँ शिकायत करतीं, पर मन ही मन प्रसन्न होतीं।
  • मिट्टी खाना और मुख में ब्रह्माण्ड: यशोदा ने मुख खुलवाया, तो उसमें सारा ब्रह्माण्ड दिखा; फिर माया से वे भूल गईं।
  • दामोदर लीला: माखन की मटकी फोड़ने पर यशोदा ने ऊखल से बाँधा; रस्सी हर बार दो उँगली छोटी पड़ती, अन्त में माँ के परिश्रम को देखकर कृष्ण बँध गए। ऊखल घसीटते हुए यमलार्जुन वृक्ष गिराए और नलकूबर-मणिग्रीव को मुक्त किया।
  • उपद्रवों के कारण सब वृन्दावन गए। वत्सासुर, बकासुर।

अध्याय 12 से 22: वृन्दावन की लीलाएँ

  • अघासुर (अजगर) वध।
  • ब्रह्मा जी का मोह: ब्रह्मा जी ने ग्वाल-बालों और बछड़ों को चुरा लिया; कृष्ण ने स्वयं सब ग्वाल-बाल और बछड़े बनकर एक वर्ष तक हर घर में रहे। ब्रह्मा जी ने क्षमा माँगकर स्तुति की।
  • धेनुकासुर (बलराम द्वारा), कालिय नाग दमन, दावाग्नि पान (वन की आग पी जाना), प्रलम्बासुर।
  • वेणु गीत: कृष्ण की बाँसुरी से गायें, पक्षी, नदियाँ और गोपियाँ मुग्ध।
  • चीरहरण और कात्यायनी व्रत: गोपियों ने कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए व्रत किया।
  • यज्ञपत्नियाँ: अहंकारी ब्राह्मणों ने भोजन नहीं दिया, पर उनकी पत्नियाँ प्रेम से भोजन लेकर आईं।

अध्याय 24 से 28: गोवर्धन लीला

कृष्ण ने इन्द्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन, गायों और ब्राह्मणों की पूजा करवाई। क्रोधित इन्द्र ने प्रलय जैसी वर्षा की। सात वर्ष के कृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन को कनिष्ठा उँगली पर उठाए रखा। इन्द्र ने हार मानी; कामधेनु ने अभिषेक किया, और कृष्ण "गोविन्द" कहलाए। (दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट इसी की स्मृति हैं।) फिर वरुण लोक से नन्द बाबा को छुड़ाना।

अध्याय 29 से 33: रास पंचाध्यायी

शरद पूर्णिमा की रात कृष्ण ने बाँसुरी बजाई, और गोपियाँ सब काम छोड़कर दौड़ी आईं। कृष्ण ने पहले उन्हें घर लौटने को कहा; गोपियों ने कहा कि हमारा सब कुछ आप ही हैं। रास आरम्भ हुआ, पर गोपियों के मन में अभिमान आया, तो कृष्ण अन्तर्धान हो गए।

विरह में गोपियों ने वृक्षों, लताओं से कृष्ण का पता पूछा, उनकी लीलाओं का अभिनय किया, और यमुना तट पर बैठकर करुण स्वर में "गोपी गीत" गाया: "जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि..." — हे प्रिय, तुम्हारे जन्म से ब्रज की महिमा बढ़ गई है, लक्ष्मी यहाँ सदा निवास करती हैं; हम केवल तुम्हें खोज रही हैं, दर्शन दो। कृष्ण प्रकट हुए, और महारास हुआ, जिसमें हर गोपी के साथ एक कृष्ण थे। यह लीला जीवात्मा और परमात्मा के निष्काम प्रेम का प्रतीक मानी जाती है; शुकदेव जी कहते हैं कि इसे श्रद्धा से सुनने वाले के हृदय से काम-रोग दूर होता है।

अध्याय 34 से 45: मथुरा और कंस वध

सुदर्शन विद्याधर का उद्धार, शंखचूड़, अरिष्टासुर (बैल), केशी (घोड़ा), व्योमासुर। कंस ने अक्रूर को भेजा। विदाई के समय गोपियों का विलाप। अक्रूर को यमुना में स्नान करते हुए जल में कृष्ण-बलराम और शेषशायी विष्णु के दर्शन। मथुरा में धोबी, दर्जी, माली सुदामा, कुब्जा; धनुष भंग; कुवलयापीड हाथी; चाणूर-मुष्टिक; और कंस वध। उग्रसेन राजा बने, देवकी-वसुदेव मुक्त हुए। यज्ञोपवीत संस्कार और सान्दीपनि गुरुकुल में शिक्षा; गुरु-दक्षिणा में गुरु-पुत्र को वापस लाना।

अध्याय 46 और 47: उद्धव का ब्रज जाना (भ्रमर गीत)

कृष्ण ने अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को सन्देश लेकर ब्रज भेजा। उद्धव ने गोपियों को ज्ञान और योग का उपदेश दिया, पर गोपियों ने एक भौंरे (भ्रमर) को बहाना बनाकर कृष्ण को उलाहना दिया और कहा: हमारे पास एक ही मन था, वह कृष्ण के साथ चला गया; अब योग किस मन से करें? गोपियों का प्रेम देखकर उद्धव का ज्ञान का अभिमान टूट गया, और वे बोले: मैं वृन्दावन की लता या घास बन जाऊँ ताकि गोपियों के चरणों की धूल मुझ पर पड़े।

उत्तरार्ध, अध्याय 50 से 70: द्वारका

  • जरासन्ध के सत्रह आक्रमण, कालयवन और मुचुकुन्द, द्वारका का निर्माण।
  • रुक्मिणी जी का पत्र और हरण, विवाह; प्रद्युम्न जन्म और शम्बर वध।
  • स्यमन्तक मणि, जाम्बवती और सत्यभामा; कालिन्दी, मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा, लक्ष्मणा से विवाह।
  • नरकासुर वध और सोलह हज़ार राजकुमारियों की मुक्ति; पारिजात हरण।
  • उषा-अनिरुद्ध और बाणासुर; शिव-कृष्ण युद्ध और शिव जी के कहने पर बाणासुर को जीवनदान।
  • राजा नृग का उद्धार (जो एक भूल से गिरगिट बने थे)।
  • नारद जी का द्वारका में हर महल में कृष्ण को अलग-अलग काम करते देखना।
  • जरासन्ध वध (भीम द्वारा), युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ, शिशुपाल वध।

अध्याय 80 और 81: सुदामा चरित

कृष्ण के गुरुकुल के मित्र सुदामा अत्यन्त निर्धन थे। पत्नी के कहने पर वे पड़ोसियों से माँगे चार मुट्ठी चिउड़े (पोहा) पोटली में बाँधकर द्वारका गए। द्वारपालों ने रोका, पर कृष्ण नंगे पैर दौड़कर आए, उन्हें गले लगाया, अपने आसन पर बिठाया और आँसुओं से उनके पैर धोए। संकोच से छिपाई पोटली कृष्ण ने छीनकर एक मुट्ठी चिउड़ा खाया और दूसरी खाने लगे, तो रुक्मिणी जी ने हाथ पकड़ लिया (एक मुट्ठी में ही सब कुछ दे दिया था)। सुदामा कुछ माँगे बिना लौटे, और घर पहुँचकर देखा कि झोपड़ी की जगह महल है। पर सुदामा का मन वैसा ही विनम्र रहा।

अध्याय 82 से 90: कुरुक्षेत्र और अन्य

सूर्यग्रहण पर कुरुक्षेत्र में कृष्ण की नन्द-यशोदा और गोपियों से वर्षों बाद भेंट; गोपियों को अध्यात्म का उपदेश। वसुदेव का यज्ञ; देवकी के छह मृत पुत्रों को वापस लाना; अर्जुन-सुभद्रा विवाह; श्रुतदेव और बहुलाश्व; वेद स्तुति; भृगु द्वारा त्रिदेव की परीक्षा (विष्णु सबसे सहनशील); और अन्त में कृष्ण की दिनचर्या और द्वारका का वैभव।

इस स्कन्ध की सीख

  • भगवान प्रेम से बँधते हैं, बल से नहीं: यशोदा की रस्सी तब पूरी हुई जब माँ का परिश्रम दिखा।
  • प्रकृति की पूजा (गोवर्धन) व्यावहारिक धर्म है: जो पालता है, उसका सम्मान।
  • प्रेम में अभिमान आते ही ईश्वर दूर हो जाते हैं; विनम्रता से फिर पास आते हैं।
  • ज्ञान बड़ा है, पर प्रेम उससे भी बड़ा है (उद्धव और गोपियाँ)।
  • सच्ची मित्रता में अमीर-गरीब का भेद नहीं (कृष्ण-सुदामा)।

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