श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
भागवत पुराण अष्टम स्कन्ध: गजेन्द्र मोक्ष, समुद्र मन्थन, मोहिनी, वामन अवतार और मत्स्य
अष्टम स्कन्ध (24 अध्याय): मन्वन्तर, ग्राह से गजेन्द्र की रक्षा, समुद्र मन्थन और शिव जी का विषपान, मोहिनी, वामन अवतार और राजा बलि, तथा मत्स्य अवतार।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।अष्टम स्कन्ध में अलग-अलग मन्वन्तरों में भगवान के अवतारों की कथाएँ हैं। इनमें गजेन्द्र मोक्ष, समुद्र मन्थन और वामन अवतार सबसे प्रसिद्ध हैं।
अध्याय 1: मन्वन्तर
परीक्षित ने मन्वन्तरों के बारे में पूछा। शुकदेव जी ने चौदह मनुओं और हर मन्वन्तर में भगवान के अवतारों का वर्णन किया।
अध्याय 2 से 4: गजेन्द्र मोक्ष
त्रिकूट पर्वत के वन में एक विशाल हाथी (गजेन्द्र) अपनी हथिनियों और बच्चों के साथ रहता था। एक दिन वह सरोवर में जल-क्रीड़ा कर रहा था, तभी एक बलवान ग्राह (मगरमच्छ) ने उसका पैर पकड़ लिया। गजेन्द्र ने पूरी शक्ति से संघर्ष किया, परिवार ने भी मदद की, पर एक हज़ार वर्ष (परम्परा अनुसार) के संघर्ष के बाद गजेन्द्र थक गया और जल में डूबने लगा।
जब सब सहारे छूट गए, तब गजेन्द्र को पूर्व जन्म की भक्ति याद आई। उसने सूँड़ में एक कमल का फूल उठाकर भगवान की स्तुति की: "जो इस जगत के मूल कारण हैं, जिनमें यह जगत है, जो सबके आश्रय हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।" भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर तुरन्त आए, सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुख फाड़ दिया और गजेन्द्र को बचा लिया।
ग्राह पूर्व जन्म में हूहू नाम का गन्धर्व था, जो देवल ऋषि के शाप से ग्राह बना था; गजेन्द्र पूर्व जन्म में राजा इन्द्रद्युम्न था, जो अगस्त्य ऋषि के अनादर के शाप से हाथी बना था। दोनों मुक्त हुए। "गजेन्द्र मोक्ष" स्तोत्र आज भी संकट के समय पढ़ा जाता है।
अध्याय 5 से 10: समुद्र मन्थन
दुर्वासा ऋषि के शाप से देवताओं की लक्ष्मी चली गई और वे असुरों से हारने लगे। भगवान ने कहा: असुरों से सन्धि करके समुद्र मन्थन करो। मन्दराचल मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी। पर्वत डूबने लगा, तो भगवान ने कूर्म (कछुआ) अवतार लेकर उसे पीठ पर सँभाला।
सबसे पहले हालाहल विष निकला, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। सबने भगवान शिव से प्रार्थना की। शिव जी ने लोक-कल्याण के लिए विष पी लिया और उसे गले में रोक लिया; उनका कण्ठ नीला हो गया, इसलिए वे "नीलकण्ठ" कहलाए। फिर क्रम से निकले: कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, अप्सराएँ, लक्ष्मी जी (जिन्होंने विष्णु जी को वरण किया), वारुणी, और अन्त में अमृत कलश लिए धन्वन्तरि।
असुरों ने अमृत छीन लिया। तब भगवान ने अत्यन्त सुन्दर स्त्री, मोहिनी, का रूप धरा। असुर उस पर मोहित हो गए और अमृत बाँटने का काम उसे सौंप दिया। मोहिनी ने देवताओं को अमृत पिलाया। राहु देवता बनकर पंक्ति में बैठ गया; सूर्य और चन्द्रमा ने बताया, और भगवान ने चक्र से उसका सिर काट दिया, पर अमृत गले तक पहुँच चुका था, इसलिए सिर (राहु) और धड़ (केतु) अमर हो गए। तभी से ग्रहण की कथा जुड़ी है। देवताओं और असुरों का युद्ध हुआ, और देवता जीते।
अध्याय 11 और 12: शिव का मोहिनी दर्शन
शिव जी ने मोहिनी रूप देखने की इच्छा की। भगवान ने मोहिनी रूप दिखाया, और शिव जी भी क्षण भर मोहित हुए, फिर सँभल गए। यह भगवान की माया की शक्ति का प्रसंग है।
अध्याय 13 से 14: आगे के मन्वन्तर
भविष्य के मनुओं, सप्तर्षियों और भगवान के अवतारों का वर्णन।
अध्याय 15 से 23: वामन अवतार और राजा बलि
प्रह्लाद के पौत्र राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य की कृपा से स्वर्ग जीत लिया। देवताओं की माता अदिति ने पयोव्रत किया, और भगवान ने उनके पुत्र वामन (बौने ब्राह्मण बालक) के रूप में जन्म लिया।
बलि नर्मदा तट पर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, जहाँ कोई कुछ भी माँगे, उन्हें देने का नियम था। वामन भगवान पहुँचे। बलि ने कहा: जो चाहो माँगो। वामन ने केवल तीन पग भूमि माँगी। शुक्राचार्य ने पहचान लिया और बलि को रोका: ये स्वयं विष्णु हैं, सब छीन लेंगे। बलि ने कहा: मैं प्रह्लाद का पौत्र हूँ; दिया वचन नहीं तोड़ूँगा। शुक्राचार्य ने शाप दिया, फिर भी बलि ने संकल्प का जल छोड़ा।
वामन ने विराट रूप धारण किया: एक पग में पृथ्वी, दूसरे में स्वर्ग और सारे लोक नाप लिए। तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा। बलि ने कहा: प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए। भगवान ने बलि के सिर पर पग रखा। प्रह्लाद जी आए और भगवान की स्तुति की। भगवान ने बलि को सुतल लोक का राज्य दिया, अगले मन्वन्तर में इन्द्र बनने का वर दिया, और स्वयं उसके द्वारपाल बनकर रहने का वचन दिया। (केरल का ओणम पर्व बलि के अपनी प्रजा से मिलने आने की स्मृति में मनाया जाता है।)
अध्याय 24: मत्स्य अवतार
पिछले कल्प के अन्त में राजा सत्यव्रत नदी में तर्पण कर रहे थे, तभी अंजलि में एक छोटी मछली आई और बोली: मुझे बचाओ। राजा उसे कमण्डल में, फिर घड़े में, फिर तालाब में, फिर समुद्र में ले गए, और वह हर बार बढ़ती गई। राजा समझ गए कि ये भगवान हैं। भगवान मत्स्य ने कहा: सातवें दिन प्रलय होगा; एक नौका आएगी, उसमें सप्तर्षियों, औषधियों और बीजों के साथ बैठ जाना, और वासुकि से नौका को मेरे सींग से बाँध देना। प्रलय में भगवान ने नौका की रक्षा की और सत्यव्रत को ज्ञान दिया; वही सत्यव्रत इस कल्प में वैवस्वत मनु बने। भगवान ने हयग्रीव असुर से वेद भी वापस लाए।
इस स्कन्ध की सीख
- जब सब सहारे छूट जाएँ, तब भगवान का सहारा सबसे पहले पहुँचता है (गजेन्द्र)।
- बड़े काम मिलकर होते हैं, और उनमें पहले विष भी निकलता है; उसे सहने वाला ही नीलकण्ठ है।
- दान और वचन-पालन सबसे बड़ा धर्म है; बलि ने सब देकर भगवान को ही पा लिया।
- छोटे जीव (मछली) की रक्षा का पुण्य भी पूरी सृष्टि की रक्षा तक पहुँचता है।
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