श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
भागवत पुराण एकादश स्कन्ध: उद्धव गीता, अवधूत के 24 गुरु और यदुवंश का अन्त
एकादश स्कन्ध (31 अध्याय): यदुवंश को ऋषियों का शाप, नौ योगेश्वरों का राजा निमि को उपदेश, अवधूत के चौबीस गुरु, उद्धव को श्रीकृष्ण का अन्तिम उपदेश (उद्धव गीता), यदुवंश का अन्त और श्रीकृष्ण का परमधाम गमन।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।एकादश स्कन्ध भागवत का ज्ञान भाग है। जैसे महाभारत में कृष्ण ने अर्जुन को गीता दी, वैसे ही यहाँ पृथ्वी छोड़ने से पहले वे अपने प्रिय उद्धव को अन्तिम उपदेश देते हैं, जिसे "उद्धव गीता" कहते हैं।
अध्याय 1: ऋषियों का शाप
पृथ्वी का भार उतारने के बाद भगवान ने देखा कि यदुवंश स्वयं अजेय और अहंकारी हो गया है। पिण्डारक तीर्थ में यदु बालकों ने साम्ब को गर्भवती स्त्री का वेष पहनाकर ऋषियों (विश्वामित्र, कण्व, दुर्वासा, नारद आदि) से पूछा: इसके क्या होगा? ऋषियों ने शाप दिया: एक मूसल होगा, जो तुम्हारे कुल का नाश करेगा।
अध्याय 2 से 5: नौ योगेश्वर और राजा निमि
नारद जी ने वसुदेव जी को राजा निमि और नौ योगेश्वरों (कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस, करभाजन) का संवाद सुनाया। उन्होंने बताया: भगवत धर्म क्या है (सब कर्म भगवान को अर्पित करना), सच्चा भक्त कौन है (जो सब प्राणियों में भगवान को देखे), माया क्या है और उसे कैसे पार करें (गुरु की शरण और भक्ति से), कर्म, अकर्म और विकर्म, भगवान के अवतार, और हर युग की पूजा पद्धति (कलियुग में संकीर्तन)।
अध्याय 6 से 9: अवधूत के चौबीस गुरु
कृष्ण ने उद्धव को राजा यदु और अवधूत दत्तात्रेय की कथा सुनाई। अवधूत ने बताया कि उन्होंने प्रकृति से चौबीस गुरु बनाए:
- पृथ्वी: सहनशीलता और दूसरों के लिए जीना।
- वायु: सबको छूकर भी किसी से न चिपकना।
- आकाश: सबमें होकर भी सबसे अलग रहना।
- जल: पवित्रता और सबको शुद्ध करना।
- अग्नि: जो मिले उसे स्वीकार कर, फिर भी शुद्ध रहना।
- चन्द्रमा: घटना-बढ़ना शरीर का है, आत्मा का नहीं।
- सूर्य: जल लेकर फिर वर्षा के रूप में लौटाना; और एक सूर्य अनेक घड़ों में अनेक दिखता है।
- कबूतर: परिवार में अत्यधिक आसक्ति विनाश लाती है (जाल में फँसे बच्चों के मोह में कबूतर भी फँस गया)।
- अजगर: जो मिल जाए उसमें सन्तोष।
- समुद्र: नदियाँ आएँ या न आएँ, सदा सम।
- पतंगा: रूप के मोह में आग में जलना; इन्द्रियों के आकर्षण से सावधान।
- भौंरा: हर फूल से थोड़ा-थोड़ा रस लेना; हर शास्त्र से सार लेना।
- हाथी: स्पर्श के मोह में फँसना।
- मधु इकट्ठा करने वाला: जोड़ा हुआ धन दूसरा ले जाता है।
- हिरण: संगीत के मोह में शिकारी के हाथ पड़ना।
- मछली: स्वाद के लोभ में काँटे में फँसना।
- पिंगला वेश्या: आशा ही सबसे बड़ा दुःख है; आशा छूटते ही उसे शान्ति की नींद मिली।
- कुरर पक्षी: माँस का टुकड़ा छोड़ते ही दूसरे पक्षियों ने उसका पीछा छोड़ दिया; जो छोड़ता है वह सुखी।
- बालक: चिन्ता रहित आनन्द।
- कुमारी कन्या: हाथ की अनेक चूड़ियाँ बजती थीं, एक रखी तो शान्ति; अनेक लोगों में कलह, एकान्त में शान्ति।
- बाण बनाने वाला: इतना एकाग्र कि पास से राजा की सवारी निकल गई और पता न चला।
- साँप: अपना घर नहीं बनाता; अकेले, सावधान रहना।
- मकड़ी: अपने ही भीतर से जाल बनाकर फिर समेट लेना; भगवान भी ऐसे ही सृष्टि रचते और समेटते हैं।
- भृंगी (कीड़ा): जिसका निरन्तर ध्यान करो, वैसा ही बन जाते हो।
अध्याय 10 से 29: उद्धव गीता
कृष्ण ने उद्धव को विस्तार से उपदेश दिया:
- बन्धन और मुक्ति: आत्मा न बँधी है, न मुक्त; अज्ञान से बन्धन लगता है, ज्ञान से मुक्ति।
- सत्संग की महिमा: सत्संग से जैसा भक्ति का फल मिलता है, वैसा योग, ज्ञान, तप या दान से नहीं।
- हंस गीता: ब्रह्मा जी के पुत्रों के प्रश्न पर भगवान ने हंस रूप में ज्ञान दिया।
- भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ: "न साधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥" — हे उद्धव, मुझे न योग, न सांख्य, न धर्म, न स्वाध्याय, न तप, न त्याग उतना वश में करते हैं, जितनी मेरी दृढ़ भक्ति (11.14.20)।
- ध्यान की विधि, सिद्धियाँ और उनसे सावधानी।
- विभूतियाँ (गीता के दसवें अध्याय की तरह)।
- वर्णाश्रम धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के मार्ग।
- तितिक्षु ब्राह्मण (भिक्षु गीता): एक कंजूस ब्राह्मण का धन चला गया, लोगों ने अपमान किया, फिर भी वह शान्त रहा और बोला: सुख-दुःख का कारण न लोग हैं, न ग्रह, न कर्म, न काल; मन ही कारण है।
- पुरूरवा का वैराग्य, क्रिया योग (पूजा विधि), और भक्ति योग का सार।
अध्याय 30 और 31: यदुवंश का अन्त और परमधाम
शाप के अनुसार प्रभास क्षेत्र में यादव आपस में लड़कर नष्ट हो गए। बलराम जी ने समुद्र तट पर योग से शरीर छोड़ा। कृष्ण पीपल के नीचे बैठे थे; जरा व्याध ने उनके चरण को हिरण समझकर बाण मारा। कृष्ण ने उसे क्षमा किया। सारथी दारुक द्वारा अर्जुन को सन्देश भेजा। फिर भगवान अपने लोक को चले गए; उनके जाने पर सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्री भी उनके साथ चले गए, और कलियुग का आरम्भ हुआ।
इस स्कन्ध की सीख
- आँखें खुली हों तो सारी प्रकृति गुरु है: पृथ्वी से सहनशीलता, मकड़ी से सृष्टि का रहस्य।
- आशा और आसक्ति दुःख की जड़ हैं; उन्हें छोड़ते ही शान्ति (पिंगला और कुरर)।
- सुख-दुःख का कारण बाहर नहीं, अपना मन है (भिक्षु गीता)।
- अहंकार बड़े से बड़े कुल को भी भीतर से नष्ट कर देता है।
- भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग दृढ़ भक्ति और सत्संग है।
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