श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
भागवत पुराण पंचम स्कन्ध: ऋषभदेव, जड़भरत, भूगोल, ज्योतिष चक्र और नरक वर्णन
पंचम स्कन्ध (26 अध्याय): राजा प्रियव्रत, ऋषभदेव का पुत्रों को उपदेश, भरत और जड़भरत की कथा, द्वीप और वर्ष, सूर्य और ग्रह, पाताल और नरकों का वर्णन।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।पंचम स्कन्ध में स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत का वंश है, जिसमें महान परमहंस ऋषभदेव और जड़भरत हुए। इसके बाद ब्रह्माण्ड के भूगोल, ग्रहों और नरकों का वर्णन है।
अध्याय 1: प्रियव्रत
प्रियव्रत भगवान के भक्त थे और विवाह नहीं करना चाहते थे, पर ब्रह्मा जी के समझाने पर राजा बने। उनके रथ के पहियों से बने गड्ढों से सात समुद्र बने और बीच की भूमि सात द्वीप।
अध्याय 2 से 6: ऋषभदेव
प्रियव्रत के वंश में राजा नाभि और मेरुदेवी के घर स्वयं भगवान ऋषभदेव के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने आदर्श राज्य किया और अपने सौ पुत्रों को उपदेश दिया:
- "यह मनुष्य शरीर कुत्ते-सूअर की तरह केवल भोग के लिए नहीं, तप के लिए है, जिससे अनन्त सुख मिलता है।"
- महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है, और कामियों का संग नरक का।
- जो अपने बच्चों और आश्रितों को मृत्यु के चक्र से छुड़ाने का ज्ञान नहीं देता, वह गुरु, पिता, माता या पति बनने योग्य नहीं।
फिर ऋषभदेव ने बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर अवधूत वृत्ति ली: बिना वस्त्र, बिना घर, मौन, सब प्राणियों में भगवान देखते हुए। (जैन परम्परा में ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के रूप में पूज्य हैं।)
अध्याय 7 से 14: भरत और जड़भरत
भरत ने धर्म से राज्य किया, और उनके नाम पर यह देश "भारतवर्ष" कहलाया। बाद में वे गण्डकी तट पर पुलह आश्रम में तप करने गए। वहाँ एक हिरण के बच्चे पर दया करके उसे पाला, और उसी में आसक्त हो गए; मृत्यु के समय उसी का चिन्तन करने से अगला जन्म हिरण का मिला, पर स्मृति बनी रही। तीसरे जन्म में वे ब्राह्मण के घर जन्मे और किसी से आसक्ति न हो, इसलिए जड़ (पागल-से, मौन) बने रहे।
डाकुओं ने उन्हें काली को बलि देने के लिए पकड़ा, पर देवी स्वयं प्रकट होकर डाकुओं का संहार कर गईं। फिर सिन्धु-सौवीर के राजा रहूगण की पालकी उठाने के लिए उन्हें पकड़ा गया। चलते हुए वे चींटियों को बचाने के लिए रुकते, पालकी हिलती। राजा ने व्यंग्य किया, तो जड़भरत ने उत्तर दिया: मोटा-पतला, थकना-न थकना शरीर का धर्म है, आत्मा का नहीं। राजा पालकी से उतरकर चरणों में गिरा। जड़भरत ने संसार को एक भयानक वन बताया, जहाँ छह डाकू (पाँच इन्द्रियाँ और मन) जीव को लूटते हैं, और कहा कि इस वन से निकलने का मार्ग सत्संग और भगवान की सेवा है।
अध्याय 15 से 20: द्वीप और वर्ष
जम्बूद्वीप और उसके नौ वर्ष, भारतवर्ष की महिमा ("देवता भी भारत में जन्म चाहते हैं"), और अन्य द्वीपों का वर्णन है। हर वर्ष में भगवान के एक रूप की पूजा होती है; भारतवर्ष में नर-नारायण की, और किम्पुरुषवर्ष में हनुमान जी श्रीराम की आराधना करते हैं।
अध्याय 21 से 23: सूर्य, ग्रह और शिशुमार चक्र
सूर्य के रथ, उसकी गति, उत्तरायण-दक्षिणायन, चन्द्रमा और ग्रहों की स्थिति, सप्तर्षि और ध्रुव का वर्णन है। पूरा नक्षत्र मण्डल शिशुमार (डॉल्फ़िन) के आकार का बताया गया, जिसकी पूँछ पर ध्रुव है और जिसे भगवान का रूप मानकर प्रातः-सायं नमस्कार करने का विधान है।
अध्याय 24 और 25: पाताल और शेषनाग
सात पाताल लोकों (अतल से पाताल तक) का वर्णन है, जहाँ बलि, मय, वासुकि आदि रहते हैं। सुतल में राजा बलि हैं, जिनके द्वार पर स्वयं वामन भगवान पहरा देते हैं। सबसे नीचे भगवान अनन्त (शेषनाग) हैं, जिनके एक फन पर पूरा ब्रह्माण्ड सरसों के दाने जैसा टिका है।
अध्याय 26: नरक
अट्ठाईस नरकों का वर्णन है (जैसे तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, कुम्भीपाक, असिपत्रवन), और बताया गया है कि दूसरे का धन हड़पना, हिंसा, धोखा, पशुओं पर क्रूरता, माता-पिता का अपमान आदि पाप किस नरक की ओर ले जाते हैं। उद्देश्य है: मनुष्य समझे कि हर कर्म का फल है, और अधर्म से बचे।
इस स्कन्ध की सीख
- मनुष्य जन्म केवल भोग के लिए नहीं, आत्म-उन्नति के लिए मिला है (ऋषभदेव का उपदेश)।
- माता-पिता और गुरु का सबसे बड़ा कर्तव्य बच्चों को सही ज्ञान देना है।
- दया भी आसक्ति बन जाए तो बन्धन है; सन्तुलन चाहिए।
- संसार में इन्द्रियाँ और मन लुटेरे हैं; सत्संग ही सुरक्षित मार्ग है।
- भारत में जन्म को देवता भी तरसते हैं; यह अवसर व्यर्थ न जाए।
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