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श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

भागवत पुराण द्वितीय स्कन्ध: शुकदेव जी का उपदेश, विराट पुरुष और चतुःश्लोकी भागवत

द्वितीय स्कन्ध (10 अध्याय): मृत्यु निकट हो तो क्या करें, विराट पुरुष का ध्यान, राजा खट्वांग, ब्रह्मा जी को भगवान के दर्शन, चतुःश्लोकी भागवत, और पुराण के दस लक्षण।

चित्रण: भागवत पुराण द्वितीय स्कन्ध: शुकदेव जी का उपदेश, विराट पुरुष और चतुःश्लोकी भागवत
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द्वितीय स्कन्ध में शुकदेव जी राजा परीक्षित के प्रश्न का उत्तर देना आरम्भ करते हैं। यह छोटा स्कन्ध है, पर इसमें भागवत का बीज, "चतुःश्लोकी भागवत", छिपा है।

अध्याय 1: मृत्यु निकट हो तो

शुकदेव जी कहते हैं: हे राजन, आपका प्रश्न सबसे उत्तम है। मनुष्य का जीवन घर-गृहस्थी, नींद और धन की चिन्ता में बीत जाता है। जिसकी मृत्यु निकट हो, उसे भय छोड़कर भगवान हरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए। राजा खट्वांग को केवल एक मुहूर्त (48 मिनट) का समय मिला, और उन्होंने उसी में सब छोड़कर भगवान में मन लगाकर मुक्ति पा ली। आपके पास तो सात दिन हैं।

अध्याय 1 और 2: विराट पुरुष का ध्यान

जिसका मन अभी सूक्ष्म भगवान में नहीं लगता, वह भगवान के विराट (विश्व) रूप का ध्यान करे: पाताल उनके तलवे, पृथ्वी उनके पैर, आकाश उनकी नाभि, स्वर्ग उनका सिर, सूर्य उनके नेत्र, दिशाएँ उनके कान, वायु उनकी साँस, नदियाँ उनकी नाड़ियाँ, पर्वत उनकी हड्डियाँ, बादल उनके बाल। इस तरह सारा संसार भगवान का शरीर दिखने लगता है। फिर धीरे-धीरे हृदय में चतुर्भुज रूप का ध्यान करें।

अध्याय 3: किसकी पूजा से क्या मिलता है

ज्ञान चाहने वाला शिव की, धन चाहने वाला लक्ष्मी की, सन्तान चाहने वाला प्रजापति की, और इसी तरह अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग देवताओं की उपासना बताई गई। पर जो कुछ भी न चाहता हो, या सब कुछ चाहता हो, या मोक्ष चाहता हो, वह तीव्र भक्ति से भगवान पुरुषोत्तम की ही आराधना करे।

अध्याय 4 से 8: सृष्टि और भगवान की लीलाएँ

परीक्षित के पूछने पर शुकदेव जी ने बताया कि ब्रह्मा जी ने नारद जी को सृष्टि का रहस्य कैसे बताया: सब कुछ भगवान नारायण से ही है; ब्रह्मा भी उन्हीं की कृपा से सृष्टि करते हैं। भगवान के अवतारों की लीलाएँ संक्षेप में फिर बताई गईं।

अध्याय 9: ब्रह्मा जी को दर्शन और चतुःश्लोकी भागवत

सृष्टि से पहले ब्रह्मा जी कमल पर बैठे सोच रहे थे कि क्या करें। तभी "तप, तप" ये दो अक्षर सुनाई दिए। ब्रह्मा जी ने हज़ार दिव्य वर्ष तप किया, और भगवान ने उन्हें अपना धाम वैकुण्ठ दिखाया। फिर भगवान ने चार श्लोकों में सम्पूर्ण ज्ञान दिया, जो "चतुःश्लोकी भागवत" कहलाता है:

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥ (2.9.32)

अर्थ: सृष्टि से पहले केवल मैं ही था; न स्थूल, न सूक्ष्म, न उनका कारण। सृष्टि के बाद भी जो कुछ दिखता है, वह मैं ही हूँ, और प्रलय के बाद जो शेष रहेगा, वह भी मैं ही हूँ।

ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥ (2.9.33)

अर्थ: वास्तविक वस्तु (मेरे) के बिना जो दिखाई दे, और जो मुझमें दिखाई न दे, उसे मेरी माया जानो, जैसे आकाश में दिखने वाला दूसरा चन्द्रमा (आभास) या अन्धकार।

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥ (2.9.34)

अर्थ: जैसे पाँच महाभूत छोटे-बड़े सब प्राणियों में प्रविष्ट भी हैं और नहीं भी, वैसे ही मैं सबमें हूँ भी और सबसे परे भी।

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा॥ (2.9.35)

अर्थ: तत्त्व जानने की इच्छा वाले को केवल इतना ही जानना है: जो सब जगह और सब समय रहता है, सबमें होकर भी सबसे अलग, वही परम सत्य है।

ब्रह्मा जी ने यह ज्ञान नारद जी को दिया, नारद जी ने व्यास जी को, और व्यास जी ने इसे विस्तार देकर भागवत रची।

अध्याय 10: पुराण के दस लक्षण

भागवत के दस विषय बताए गए: सर्ग (सृष्टि), विसर्ग (ब्रह्मा की सृष्टि), स्थान (भगवान द्वारा मर्यादा की रक्षा), पोषण (भक्तों पर कृपा), ऊति (कर्म-वासनाएँ), मन्वन्तर, ईशानुकथा (भगवान और भक्तों की कथाएँ), निरोध (प्रलय), मुक्ति और आश्रय (भगवान, जिनमें सब टिका है)। पहले नौ विषय दसवें, "आश्रय" यानी भगवान को समझाने के लिए हैं।

इस स्कन्ध की सीख

  • समय कितना भी कम हो, भगवान की ओर मुड़ने में देर नहीं होती; खट्वांग ने एक मुहूर्त में मुक्ति पाई।
  • पूरा संसार भगवान का शरीर है; यह देखना ध्यान का पहला चरण है।
  • सत्य वही है जो सृष्टि से पहले, बीच में और बाद में भी है।
  • तप (एकाग्र प्रयास) से ही बड़ा काम आरम्भ होता है; ब्रह्मा जी को पहला उपदेश "तप" मिला।

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