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ग्रन्थ अध्याय

श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

भागवत पुराण तृतीय स्कन्ध: विदुर-उद्धव संवाद, वराह अवतार, कर्दम-देवहूति और कपिल उपदेश

तृतीय स्कन्ध (33 अध्याय): विदुर जी की उद्धव और मैत्रेय से भेंट, ब्रह्मा की सृष्टि, वराह अवतार और हिरण्याक्ष वध, जय-विजय, कर्दम-देवहूति, और भगवान कपिल का माता को भक्ति और सांख्य का उपदेश।

चित्रण: भागवत पुराण तृतीय स्कन्ध: विदुर-उद्धव संवाद, वराह अवतार, कर्दम-देवहूति और कपिल उपदेश
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तृतीय स्कन्ध की कथा महात्मा विदुर से शुरू होती है और भगवान कपिल के उपदेश पर समाप्त होती है, जिसे "कपिल गीता" भी कहते हैं।

अध्याय 1 से 4: विदुर और उद्धव

महाभारत से पहले विदुर जी ने धृतराष्ट्र को समझाया कि पाण्डवों को उनका हिस्सा दे दो, पर दुर्योधन ने उनका अपमान करके सभा से निकलवा दिया। विदुर जी तीर्थयात्रा पर चले गए। यमुना तट पर उनकी भेंट श्रीकृष्ण के सखा उद्धव जी से हुई। विदुर जी ने सबका कुशल पूछा, और उद्धव जी ने रोते हुए यदुवंश के अन्त और श्रीकृष्ण के परमधाम जाने का समाचार दिया। श्रीकृष्ण ने अन्त में विदुर जी के लिए मैत्रेय ऋषि से ज्ञान लेने का सन्देश छोड़ा था।

अध्याय 5 से 12: मैत्रेय का उपदेश और सृष्टि

हरिद्वार में मैत्रेय ऋषि ने विदुर जी को सृष्टि का क्रम बताया: भगवान से प्रकृति, महत्, अहंकार और तत्त्व; भगवान की नाभि से कमल और कमल पर ब्रह्मा; ब्रह्मा जी की तपस्या, स्तुति और फिर सृष्टि; काल की गणना; और सनकादि, नारद, रुद्र, मनु-शतरूपा का प्रकट होना।

अध्याय 13: वराह अवतार

स्वायम्भुव मनु ने ब्रह्मा जी से पूछा कि प्रजा कहाँ रहेगी, पृथ्वी तो प्रलय के जल में डूबी है। तभी ब्रह्मा जी की नाक से अँगूठे जितना एक वराह (सूअर) निकला, जो देखते-देखते हाथी जितना और फिर पर्वत जितना हो गया। भगवान वराह ने जल में गोता लगाकर पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठा लिया।

अध्याय 14 से 19: जय-विजय और हिरण्याक्ष

दिति ने सन्ध्या के अनुचित समय में कश्यप ऋषि से सन्तान माँगी, जिससे दो महाबली असुर हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुए। ये पूर्व जन्म में वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय थे। एक बार उन्होंने सनकादि मुनियों को, जो बालक जैसे दिखते थे, भीतर जाने से रोका। मुनियों ने शाप दिया कि तुम असुर बनोगे। भगवान ने कहा कि तीन जन्मों तक असुर बनकर, मुझसे वैर करके तुम शीघ्र लौट आओगे (हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, रावण-कुम्भकर्ण, शिशुपाल-दन्तवक्र)।

हिरण्याक्ष पृथ्वी को जल में ले गया था और वरुण को युद्ध की चुनौती देने गया। वरुण ने कहा कि तुम्हारे योग्य योद्धा भगवान विष्णु हैं। पृथ्वी को उठाते हुए वराह भगवान से हिरण्याक्ष का भयंकर युद्ध हुआ, और भगवान ने उसका वध किया।

अध्याय 20 से 24: कर्दम और देवहूति

कर्दम ऋषि ने दस हज़ार वर्ष तप किया, और भगवान ने उनसे कहा कि स्वायम्भुव मनु अपनी पुत्री देवहूति का विवाह तुमसे करेंगे और मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा। देवहूति ने वर्षों तक पति की सेवा की। कर्दम जी ने योग बल से एक विमान (उड़ता महल) बनाया और दोनों ने सुखी गृहस्थ जीवन बिताया। उनकी नौ पुत्रियाँ हुईं (जिनका विवाह ऋषियों से हुआ) और फिर स्वयं भगवान कपिल पुत्र रूप में आए। कर्दम ऋषि संन्यास लेकर वन चले गए।

अध्याय 25 से 33: कपिल गीता

माता देवहूति ने पुत्र कपिल से कहा: मैं इन्द्रियों के सुखों से थक गई हूँ; मुझे वह ज्ञान दो जिससे मोह का अन्धकार मिटे। भगवान कपिल ने उपदेश दिया:

  • मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण: विषयों में आसक्त मन बन्धन है, भगवान में लगा मन मुक्ति।
  • साधु संग: "सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः" — सज्जनों की संगति में भगवान की कथाएँ हृदय और कानों को अमृत जैसी लगती हैं, और उनसे श्रद्धा, प्रेम और भक्ति क्रम से उत्पन्न होते हैं (3.25.25)।
  • सांख्य के तत्त्व: प्रकृति, पुरुष और चौबीस तत्त्वों का ज्ञान, ताकि आत्मा को शरीर से अलग जाना जा सके।
  • भक्ति के प्रकार: तामस, राजस, सात्त्विक, और सबसे ऊँची निर्गुण (निष्काम) भक्ति, जिसमें भक्त मुक्ति भी नहीं माँगता, केवल सेवा चाहता है।
  • सब प्राणियों में भगवान: जो प्राणियों का अपमान करके मूर्ति की पूजा करता है, उसकी पूजा व्यर्थ है; सबका सम्मान करना ही सच्ची पूजा है।
  • जीव की यात्रा: गर्भ में जीव का कष्ट, जन्म, बचपन, आसक्तियाँ, बुढ़ापा और मृत्यु का वर्णन, जिससे वैराग्य जागे।

देवहूति ने इस उपदेश के अनुसार साधना की और उसी आश्रम में सिद्धि पाई; वह स्थान "सिद्धपद" कहलाया (परम्परा इसे गुजरात के सिद्धपुर से जोड़ती है)। कपिल भगवान माता से आज्ञा लेकर उत्तर-पूर्व की ओर चले गए, जहाँ समुद्र ने उन्हें स्थान दिया (गंगासागर में कपिल मुनि आश्रम की परम्परा)।

इस स्कन्ध की सीख

  • सत्य कहने पर अपमान भी मिले, तो धर्म नहीं छोड़ना; विदुर जी ने तीर्थ और सत्संग चुना।
  • अहंकार में किसी को छोटा समझना (जय-विजय) पतन का कारण है।
  • गृहस्थ जीवन भी साधना है, जैसे कर्दम-देवहूति ने जिया।
  • सत्संग से श्रद्धा, श्रद्धा से प्रेम और प्रेम से भक्ति आती है।
  • सब प्राणियों का आदर किए बिना भगवान की पूजा अधूरी है।

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