श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
भागवत पुराण सप्तम स्कन्ध: प्रह्लाद चरित, नृसिंह अवतार और नवधा भक्ति
सप्तम स्कन्ध (15 अध्याय): भगवान पक्षपाती क्यों दिखते हैं, हिरण्यकशिपु का तप और अत्याचार, प्रह्लाद द्वारा नवधा भक्ति, नृसिंह अवतार, प्रह्लाद की स्तुति, और चार आश्रमों का धर्म।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।सप्तम स्कन्ध भक्त प्रह्लाद की कथा है: एक बालक जिसने अपने अत्याचारी पिता के सामने भी भगवान का नाम नहीं छोड़ा, और जिसकी रक्षा के लिए भगवान खम्भे से नृसिंह रूप में प्रकट हुए।
अध्याय 1: भगवान पक्षपाती क्यों दिखते हैं
युधिष्ठिर ने नारद जी से पूछा: शिशुपाल ने जीवन भर कृष्ण की निन्दा की, फिर भी मरते समय उसकी ज्योति कृष्ण में कैसे समा गई? नारद जी ने कहा: भगवान को किसी भी भाव से निरन्तर याद करने वाला उन्हें पाता है: गोपियों ने प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल ने द्वेष से, और भक्तों ने भक्ति से। (शिशुपाल पूर्व जन्म के जय-विजय में से एक था।) फिर नारद जी ने हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा सुनाई।
अध्याय 2 से 4: हिरण्यकशिपु
भाई हिरण्याक्ष के वराह भगवान द्वारा मारे जाने से हिरण्यकशिपु विष्णु से द्वेष करने लगा। उसने मन्दराचल पर इतना कठोर तप किया कि उसके शरीर पर दीमक की बाँबी जम गई। ब्रह्मा जी ने वर दिया, और उसने चतुराई से माँगा: मेरी मृत्यु न मनुष्य से हो, न पशु से; न दिन में, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; न पृथ्वी पर, न आकाश में; न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से; न देवता, असुर या नाग से। वर पाकर उसने तीनों लोक जीते और स्वयं को ईश्वर घोषित किया।
अध्याय 5 से 7: प्रह्लाद और नवधा भक्ति
प्रह्लाद गर्भ में ही नारद जी के उपदेश सुन चुके थे (जब उनकी माँ कयाधू नारद आश्रम में रहीं)। गुरुकुल से लौटने पर पिता ने पूछा: सबसे अच्छी बात क्या सीखी? प्रह्लाद ने कहा:
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ (7.5.23)
अर्थ: भगवान विष्णु की भक्ति के नौ प्रकार हैं (नवधा भक्ति): 1. श्रवण (कथा सुनना), 2. कीर्तन (गुण गाना), 3. स्मरण (याद करना), 4. पादसेवन (चरणों की सेवा), 5. अर्चन (पूजा), 6. वन्दन (प्रणाम), 7. दास्य (सेवक भाव), 8. सख्य (मित्र भाव), और 9. आत्मनिवेदन (स्वयं को पूरी तरह अर्पित कर देना)।
क्रोधित पिता ने प्रह्लाद को मारने के अनेक उपाय किए: शस्त्रों से प्रहार, हाथियों से कुचलवाना, साँपों से डसवाना, पहाड़ से गिराना, विष देना, आग में डालना (परम्परा में होलिका दहन की कथा यहीं से जुड़ी है, जिसमें आग से न जलने का वर पाने वाली बुआ होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए)। हर बार भगवान ने रक्षा की।
प्रह्लाद ने गुरुकुल के असुर बालकों को भी उपदेश दिया: मनुष्य जन्म दुर्लभ है; बचपन से ही भगवान की भक्ति करो, क्योंकि आयु का बड़ा भाग नींद, खेल, आसक्ति और बुढ़ापे में चला जाता है। भक्ति के लिए किसी विशेष योग्यता, कुल या धन की आवश्यकता नहीं।
अध्याय 8: नृसिंह अवतार
अन्त में हिरण्यकशिपु ने तलवार उठाकर पूछा: कहाँ है तेरा भगवान? क्या इस खम्भे में है? प्रह्लाद ने कहा: हाँ, वे सब जगह हैं, इस खम्भे में भी। हिरण्यकशिपु ने खम्भे पर मुक्का मारा, और उसी क्षण भयानक गर्जना के साथ खम्भा फाड़कर भगवान नृसिंह प्रकट हुए: आधे मनुष्य, आधे सिंह (न मनुष्य, न पशु)।
सन्ध्या के समय (न दिन, न रात), महल की देहली पर (न भीतर, न बाहर), अपनी जाँघों पर रखकर (न पृथ्वी, न आकाश), अपने नाखूनों से (न अस्त्र, न शस्त्र) भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया। ब्रह्मा का हर वर सत्य रहा, और फिर भी अधर्म का अन्त हुआ।
अध्याय 9 और 10: प्रह्लाद की स्तुति
भगवान का क्रोध इतना भयंकर था कि ब्रह्मा, शिव और लक्ष्मी जी भी पास जाने से डरे। तब ब्रह्मा जी ने प्रह्लाद को भेजा। बालक प्रह्लाद निर्भय होकर भगवान के चरणों में गिरे; भगवान ने उनके सिर पर हाथ रखा और शान्त हो गए। प्रह्लाद ने सुन्दर स्तुति की।
भगवान ने वर माँगने को कहा। प्रह्लाद ने कहा: जो सेवक बदले में कुछ माँगे, वह सेवक नहीं, व्यापारी है। मुझे कोई कामना न रहे, यही वर दीजिए। फिर उन्होंने पिता की मुक्ति माँगी। भगवान ने कहा: तुम्हारे जैसे पुत्र के कारण तुम्हारी इक्कीस पीढ़ियाँ पवित्र हो गईं। प्रह्लाद दैत्यों के राजा बने।
अध्याय 11 से 15: वर्णाश्रम धर्म और गृहस्थ धर्म
नारद जी ने युधिष्ठिर को सनातन धर्म के लक्षण बताए: सत्य, दया, तप, शौच, सहनशीलता, विवेक, मन और इन्द्रियों का संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोष, समदृष्टि, सेवा, मौन, और भगवान की भक्ति (कुल तीस लक्षण)। फिर चार आश्रमों के धर्म, गृहस्थ के कर्तव्य, अतिथि सत्कार, और यह कि मनुष्य को उतना ही धन रखने का अधिकार है जितने से उसका पेट भरे; उससे अधिक को अपना मानने वाला चोर है।
इस स्कन्ध की सीख
- भगवान सब जगह हैं, खम्भे में भी; सच्चे विश्वास का उत्तर अवश्य मिलता है।
- भक्ति के नौ मार्ग हैं; कोई भी एक मार्ग पूरे मन से अपनाओ।
- बचपन से ही अच्छे संस्कार और भक्ति का बीज बोना चाहिए।
- वरदान और चतुराई से अधर्म बच नहीं सकता; ईश्वर हर नियम के भीतर रहते हुए भी न्याय करते हैं।
- सच्चा भक्त कुछ नहीं माँगता, और अपने कष्ट देने वाले का भी भला चाहता है।
अंतिम अद्यतन:
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