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श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

भागवत पुराण नवम स्कन्ध: सूर्यवंश, श्रीराम कथा, अम्बरीष, परशुराम और चन्द्रवंश

नवम स्कन्ध (24 अध्याय): मनु वंश, राजा अम्बरीष और दुर्वासा, अयोध्या का सूर्यवंश, भगीरथ और संक्षिप्त सम्पूर्ण श्रीराम कथा, परशुराम, ययाति, और श्रीकृष्ण जन्म तक चन्द्रवंश।

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नवम स्कन्ध में सूर्यवंश और चन्द्रवंश के राजाओं की कथाएँ हैं। अयोध्या के पाठकों के लिए इसका सबसे प्रिय भाग अध्याय 10 और 11 है, जिनमें श्रीराम की सम्पूर्ण कथा संक्षेप में है।

अध्याय 1 से 3: मनु के वंशज

वैवस्वत मनु के पुत्रों से वंश चले। सुद्युम्न (इला) की कथा, पृषध्र, कवि और शर्याति की कथाएँ हैं। शर्याति की पुत्री सुकन्या ने अनजाने में च्यवन ऋषि की आँखें फोड़ दीं, फिर प्रायश्चित्त में उनसे विवाह करके सेवा की; अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि को युवा बनाया (च्यवनप्राश की परम्परा इसी नाम से जुड़ी है)।

अध्याय 4 और 5: राजा अम्बरीष

राजा अम्बरीष परम भक्त थे: मन भगवान के चरणों में, वाणी भगवान के गुण गाने में, हाथ मन्दिर की सेवा में, कान कथा सुनने में। एक बार उन्होंने एक वर्ष का एकादशी व्रत किया। द्वादशी को पारण से पहले दुर्वासा ऋषि आए; राजा ने भोजन का निमन्त्रण दिया, और ऋषि स्नान करने गए पर देर कर दी। पारण का समय निकल रहा था, तो ब्राह्मणों की सलाह से राजा ने केवल जल पीकर व्रत खोला।

दुर्वासा ने इसे अपमान माना और क्रोध से एक कृत्या (राक्षसी) उत्पन्न की। भगवान का सुदर्शन चक्र राजा की रक्षा के लिए आया, कृत्या को नष्ट किया और दुर्वासा के पीछे पड़ गया। दुर्वासा ब्रह्मा, शिव और फिर विष्णु के पास गए। विष्णु जी ने कहा: "अहं भक्तपराधीनः" — मैं भक्तों के अधीन हूँ; अपराध अम्बरीष का किया है, उन्हीं से क्षमा माँगो। एक वर्ष बाद दुर्वासा लौटे, और राजा अम्बरीष, जो पूरे वर्ष बिना भोजन किए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, ने चक्र से उनकी रक्षा की प्रार्थना की।

अध्याय 6 से 9: सूर्यवंश के राजा

मान्धाता, सौभरि ऋषि, त्रिशंकु, हरिश्चन्द्र, सगर और उनके साठ हज़ार पुत्र, अंशुमान, दिलीप और भगीरथ। भगीरथ ने कठोर तप से गंगा को पृथ्वी पर उतारा; शिव जी ने गंगा का वेग जटा में धारण किया, और गंगा ने सगर पुत्रों को मुक्ति दी। गंगा "भागीरथी" कहलाईं। आगे खट्वांग, दीर्घबाहु, रघु, अज और दशरथ।

अध्याय 10 और 11: श्रीराम की कथा

भगवान स्वयं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में अयोध्या में राजा दशरथ के घर प्रकट हुए। शुकदेव जी कथा संक्षेप में कहते हैं:

  • विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, ताड़का, सुबाहु और मारीच।
  • मिथिला में शिव धनुष तोड़कर सीता जी से विवाह; मार्ग में परशुराम का गर्व शान्त करना।
  • पिता के वचन (कैकेयी को दिए वर) की रक्षा के लिए राज्य छोड़कर सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास। भरत द्वारा चरण-पादुकाएँ लेकर नन्दीग्राम से राज्य चलाना।
  • पंचवटी में शूर्पणखा, खर-दूषण, सोने का मृग बना मारीच, और रावण द्वारा सीता हरण। जटायु का बलिदान।
  • सुग्रीव से मित्रता, बालि वध, हनुमान जी द्वारा सीता की खोज और लंका दहन।
  • समुद्र पर सेतु बाँधना, विभीषण की शरणागति, कुम्भकर्ण, मेघनाद और रावण का वध।
  • सीता जी के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या लौटना, भरत से मिलन, और राज्याभिषेक।

रामराज्य: श्रीराम के राज्य में न कोई रोग था, न शोक, न अकाल; सब धर्म का पालन करते थे, वर्षा समय पर होती थी, और पेड़ फल-फूलों से लदे रहते थे। श्रीराम ने अनेक यज्ञ किए और प्रजा को पुत्र की तरह पाला। बाद में सीता जी का वाल्मीकि आश्रम जाना, लव-कुश का जन्म, और अन्त में श्रीराम का सब अयोध्यावासियों के साथ सरयू में प्रवेश करके परमधाम जाना। शुकदेव जी कहते हैं: जो श्रीराम की कथा सुनता है, वह कर्म के बन्धन से मुक्त होता है।

अध्याय 12 और 13: राम के बाद का वंश और निमि वंश

कुश से आगे बृहद्बल तक सूर्यवंश; फिर निमि वंश (जनक, सीरध्वज, मिथिला) का वर्णन।

अध्याय 14 से 16: चन्द्रवंश और परशुराम

चन्द्रमा, बुध, पुरूरवा-उर्वशी, फिर गाधि, विश्वामित्र, जमदग्नि और भगवान परशुराम। सहस्रबाहु कार्तवीर्य ने जमदग्नि ऋषि की कामधेनु छीनी; परशुराम ने उसका वध किया। उसके पुत्रों ने बदले में जमदग्नि को मार डाला, और परशुराम ने इक्कीस बार अत्याचारी क्षत्रियों का संहार किया, फिर सारी पृथ्वी कश्यप को दान करके महेन्द्र पर्वत पर तप करने गए।

अध्याय 17 से 24: ययाति और आगे

नहुष, ययाति, देवयानी-शर्मिष्ठा, पुरु को यौवन; ययाति का वैराग्य ("कामनाएँ भोग से शान्त नहीं होतीं")। फिर पुरु वंश में दुष्यन्त, भरत, रन्तिदेव (जिन्होंने भूखे होते हुए भी अपना भोजन और जल अतिथियों को दे दिया), कुरु, शान्तनु, भीष्म, पाण्डव और कौरव। अन्त में यदु वंश, और उसमें वसुदेव-देवकी, जिनके घर श्रीकृष्ण का जन्म होना है; इसी से दशम स्कन्ध आरम्भ होता है।

इस स्कन्ध की सीख

  • भगवान भक्तों के अधीन हैं; सच्चे भक्त का अपमान भगवान का अपमान है (अम्बरीष)।
  • एक पीढ़ी का संकल्प पूरा न हो, तो अगली पीढ़ी पूरा करती है (भगीरथ)।
  • श्रीराम का जीवन मर्यादा का आदर्श है: पुत्र, भाई, पति, मित्र और राजा, हर रूप में।
  • रन्तिदेव की तरह भूख में भी दूसरों का पेट भरना सबसे बड़ा दान है।

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