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श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

भागवत पुराण द्वादश स्कन्ध: कलियुग, परीक्षित की मुक्ति, मार्कण्डेय कथा और भागवत माहात्म्य

द्वादश स्कन्ध (13 अध्याय): कलियुग के राजा और लक्षण, कल्कि अवतार, शुकदेव जी का अन्तिम उपदेश, परीक्षित की मुक्ति, जनमेजय का सर्प यज्ञ, मार्कण्डेय ऋषि का दर्शन, और भागवत की महिमा।

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द्वादश स्कन्ध भागवत का समापन है। सात दिन की कथा पूरी होती है, परीक्षित निर्भय होकर देह त्यागते हैं, और भागवत अपना अन्तिम सन्देश देती है।

अध्याय 1 और 2: कलियुग के राजा और लक्षण

शुकदेव जी ने भविष्य के राजवंश बताए (मगध, मौर्य, शुंग, कण्व, आन्ध्र आदि), और कलियुग के लक्षण: धन ही कुल, धर्म और योग्यता का माप होगा; बल ही न्याय; विवाह केवल आकर्षण पर; पवित्रता केवल स्नान तक; विद्वत्ता केवल बोलने की चतुराई; आयु, बल और स्मृति घटेंगे; लोग धर्म का दिखावा करेंगे।

कलियुग के अन्त में शम्भल ग्राम में विष्णुयश ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि अवतार लेंगे, देवदत्त घोड़े पर सवार होकर तलवार से अधर्मियों का नाश करेंगे, और फिर सत्ययुग आएगा।

अध्याय 3: कलियुग का एक महान गुण

कलियुग दोषों का समुद्र है, पर इसमें एक महान गुण है: "कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान्गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥" — हे राजन, दोषों के भण्डार कलियुग में एक बड़ा गुण है: केवल श्रीकृष्ण के कीर्तन से मनुष्य आसक्तियों से मुक्त होकर परम पद पाता है (12.3.51)। सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में पूजा से जो मिलता था, वह कलियुग में हरि-कीर्तन से मिलता है।

अध्याय 4: चार प्रलय

नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक प्रलय का वर्णन (विष्णु पुराण के समान)।

अध्याय 5: शुकदेव जी का अन्तिम उपदेश

शुकदेव जी ने परीक्षित से कहा: हे राजन, "मैं मरूँगा" यह पशु-बुद्धि छोड़ दो। तुम शरीर नहीं हो। जैसे घड़ा फूटने पर उसके भीतर का आकाश महाकाश में मिल जाता है, वैसे ही शरीर छूटने पर आत्मा ब्रह्म में। तक्षक तुम्हें नहीं डस सकता, क्योंकि तुम आत्मा हो। अपने को ब्रह्म में स्थित करो।

अध्याय 6: परीक्षित की मुक्ति और जनमेजय का सर्प यज्ञ

परीक्षित ने शुकदेव जी को प्रणाम करके कहा: मुझे कृतार्थ कर दिया; अब मुझे मृत्यु का भय नहीं। वे गंगा तट पर कुशा के आसन पर उत्तर की ओर मुख करके भगवान के ध्यान में बैठ गए। तक्षक ब्राह्मण का वेष धरकर आया और डस लिया; पर परीक्षित पहले ही ब्रह्म में लीन हो चुके थे।

उनके पुत्र जनमेजय ने क्रोध में सर्प यज्ञ किया, जिसमें सारे सर्प गिरने लगे। तक्षक इन्द्र की शरण गया। बृहस्पति जी ने जनमेजय को समझाया कि हर प्राणी अपने कर्मों का फल भोगता है; बदले की भावना छोड़ो। जनमेजय ने यज्ञ रोक दिया।

अध्याय 6 और 7: वेदों और पुराणों की शाखाएँ

वेदों की शाखाएँ, उनके आचार्य, और अठारह पुराणों के नाम और लक्षण बताए गए: ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, लिंग, गरुड़, नारद, भागवत, अग्नि, स्कन्द, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वराह, मत्स्य, कूर्म और ब्रह्माण्ड।

अध्याय 8 से 10: मार्कण्डेय ऋषि

मार्कण्डेय ऋषि ने कठोर तप किया; इन्द्र ने कामदेव और अप्सराएँ भेजीं, पर वे अडिग रहे। नर-नारायण ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा। मार्कण्डेय ने कहा: मैं आपकी माया देखना चाहता हूँ। एक दिन अचानक प्रलय का दृश्य आया: चारों ओर जल, आँधी और अन्धकार; मार्कण्डेय करोड़ों वर्ष उस जल में भटकते रहे। तब उन्होंने एक बरगद के पत्ते पर एक सुन्दर शिशु को अपने पैर का अँगूठा चूसते देखा। शिशु की साँस के साथ वे उसके पेट में चले गए और वहाँ सारा ब्रह्माण्ड देखा, फिर बाहर आए। तब समझे कि यह भगवान की माया थी, और वह शिशु स्वयं भगवान। फिर शिव-पार्वती ने उन्हें दर्शन देकर वर दिया कि तुम कल्प के अन्त तक अमर, यशस्वी और ज्ञानी रहोगे।

अध्याय 11: भगवान के अंग-उपांगों का रहस्य

भगवान के आभूषणों और अस्त्रों का प्रतीक अर्थ: कौस्तुभ मणि जीवात्मा, श्रीवत्स प्रकृति, वनमाला माया, पीताम्बर वेद, शंख जल तत्त्व, सुदर्शन चक्र अग्नि (तेज), गदा प्राण शक्ति, कमल लीला, धनुष काल, और तलवार ज्ञान। साथ ही हर महीने सूर्य के साथ चलने वाले देवताओं का वर्णन।

अध्याय 12 और 13: भागवत का सार और माहात्म्य

सूत जी ने बारहों स्कन्धों का सार सुनाया, और कहा कि भागवत सब वेदों और उपनिषदों का सार है; जो इसके रस में डूबा, उसे किसी और ग्रन्थ में रस नहीं आता। भाद्रपद पूर्णिमा को भागवत को सोने के सिंहासन पर रखकर दान करने का भी फल बताया गया। अन्तिम श्लोक है:

नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम्॥ (12.13.23)

अर्थ: जिनके नाम का संकीर्तन सब पापों का नाश करता है, और जिन्हें प्रणाम करना सब दुःखों को शान्त करता है, उन परम भगवान श्रीहरि को मैं नमस्कार करता हूँ।

इस स्कन्ध की सीख

  • कठिन समय में भी सबसे सरल साधन है: भगवान का नाम।
  • मृत्यु का भय शरीर को "मैं" मानने से है; आत्मा का ज्ञान उसे मिटाता है।
  • बदला लेना शान्ति नहीं देता (जनमेजय); क्षमा देती है।
  • भगवान की माया अपार है; उसके आगे विनम्र रहना ही बुद्धिमानी है (मार्कण्डेय)।
  • भागवत का सार एक वाक्य में: हरि का नाम लो, हरि को प्रणाम करो।

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