श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
भागवत पुराण प्रथम स्कन्ध: भागवत की उत्पत्ति, अवतार, कुन्ती स्तुति और परीक्षित को शाप
प्रथम स्कन्ध (19 अध्याय): ऋषियों का सूत जी से प्रश्न, व्यास जी की अशान्ति और नारद जी का उपदेश, नारद जी के पूर्व जन्म की कथा, अवतारों की सूची, अश्वत्थामा, कुन्ती स्तुति, भीष्म का देह-त्याग, परीक्षित और कलियुग, और वह शाप जिससे भागवत कथा हुई।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।प्रथम स्कन्ध भागवत का द्वार है। यह बताता है कि भागवत क्यों रची गई, भगवान के अवतार कौन-कौन से हैं, और वह परिस्थिति कैसे बनी जिसमें शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को यह कथा सुनाई।
अध्याय 1 से 3: ऋषियों का प्रश्न और अवतार
नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से पूछा: कलियुग में मनुष्यों का कल्याण किस बात में है, भगवान ने अवतार क्यों लिए, और श्रीकृष्ण के धाम जाने के बाद धर्म किसकी शरण गया? सूत जी ने कहा: मनुष्य का परम धर्म वह है जिससे भगवान में निष्काम, अटूट भक्ति हो।
फिर भगवान के अवतार गिनाए गए: सनकादि, वराह, नारद, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, यज्ञ, ऋषभदेव, पृथु, मत्स्य, कच्छप, धन्वन्तरि, मोहिनी, नृसिंह, वामन, परशुराम, व्यास, राम, बलराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। "एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" — ये सब भगवान के अंश और कला हैं, पर श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं (1.3.28)।
अध्याय 4 से 6: व्यास जी की अशान्ति और नारद जी की कथा
वेदों का विभाजन, महाभारत और पुराण रचने के बाद भी व्यास जी का मन अशान्त था। नारद जी आए और बोले: आपने धर्म का वर्णन तो किया, पर भगवान की लीलाओं और भक्ति का खुलकर गान नहीं किया; इसीलिए मन शान्त नहीं है।
फिर नारद जी ने अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाई: वे एक दासी के पुत्र थे। बचपन में चातुर्मास में ऋषियों की सेवा करते हुए उन्होंने उनकी जूठन खाई और कथा सुनी, जिससे मन शुद्ध हुआ। माँ की मृत्यु के बाद वे वन में गए, ध्यान में भगवान की एक झलक पाई, और आकाशवाणी हुई कि इस जन्म में तुम मुझे फिर नहीं देखोगे, पर अगले जन्म में मेरे पार्षद बनोगे। यह सुनकर व्यास जी ने भागवत की रचना की।
अध्याय 7: अश्वत्थामा का दण्ड
महाभारत युद्ध के अन्त में अश्वत्थामा ने सोते हुए द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को मार डाला। अर्जुन उसे पकड़कर लाए। द्रौपदी ने पुत्रों के हत्यारे को देखकर भी कहा: इसे मत मारो, यह गुरु-पुत्र है; इसकी माँ को वैसा दुःख न हो जैसा मुझे हुआ। श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने उसके सिर की मणि निकालकर और बाल काटकर उसे छोड़ दिया।
अध्याय 8: कुन्ती स्तुति
अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ की रक्षा करने के बाद जब श्रीकृष्ण द्वारका जाने लगे, तो माता कुन्ती ने उनकी स्तुति की। उन्होंने प्रसिद्ध वर माँगा: "विपदः सन्तु ताः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो। भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥" — हे जगद्गुरु, हमें बार-बार विपत्तियाँ मिलें, क्योंकि विपत्ति में ही आपके दर्शन होते हैं, जिनसे फिर जन्म नहीं होता (1.8.25)।
अध्याय 9: भीष्म का देह-त्याग
बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह के पास युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण गए। भीष्म ने युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश दिया, फिर श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए, उनका ध्यान करते हुए उत्तरायण में शरीर छोड़ा। उन्होंने याद किया कि युद्ध में कृष्ण ने उनके लिए अपनी शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा भी तोड़ दी थी।
अध्याय 10 से 15: कृष्ण का द्वारका गमन और पाण्डवों का प्रस्थान
श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, जहाँ नगरवासियों ने उनका स्वागत किया। उत्तरा के गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ, जिन्होंने गर्भ में ही भगवान को देखा था, और हर व्यक्ति में उसी को खोजते थे, इसलिए "परीक्षित" कहलाए। विदुर जी तीर्थयात्रा से लौटे और धृतराष्ट्र-गान्धारी को वैराग्य का उपदेश देकर वन ले गए। श्रीकृष्ण के परमधाम जाने का समाचार मिलने पर पाण्डवों ने परीक्षित को राज्य दिया और हिमालय की ओर महाप्रस्थान किया।
अध्याय 16 से 19: परीक्षित, कलियुग और शाप
राजा परीक्षित ने एक दिन देखा कि एक व्यक्ति (कलियुग) बैल (धर्म) और गाय (पृथ्वी) को मार रहा है; बैल का केवल एक पैर (सत्य) बचा था। परीक्षित ने कलि को मारना चाहा; कलि ने शरण माँगी। राजा ने उसे पाँच स्थान दिए: जुआ, मदिरा, पर-स्त्री, हिंसा और सोना (अन्याय का धन)।
एक बार शिकार में प्यासे परीक्षित शमीक ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि ध्यान में थे और उत्तर नहीं दिया। सोने के मुकुट में बैठे कलि के प्रभाव से क्रोधित होकर राजा ने एक मरा हुआ साँप ऋषि के गले में डाल दिया। ऋषि के पुत्र शृंगी ने शाप दिया कि सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से राजा की मृत्यु होगी। परीक्षित ने पश्चात्ताप में राज्य जनमेजय को सौंपा और गंगा तट पर अन्न-जल त्यागकर बैठ गए। वहाँ अनेक ऋषि आए, और तभी सोलह वर्ष के, दिगम्बर, परमहंस शुकदेव जी आए। परीक्षित ने पूछा: जिसकी मृत्यु निकट है, उसे क्या करना चाहिए? यहीं से भागवत कथा आरम्भ होती है।
इस स्कन्ध की सीख
- ज्ञान और कर्म के बाद भी मन को शान्ति भगवान के प्रेम से ही मिलती है।
- सत्संग और सेवा से एक दासी-पुत्र भी देवर्षि नारद बन गया।
- द्रौपदी की क्षमा: अपने दुःख में भी दूसरे की माँ के दुःख का विचार।
- दुःख भगवान को याद करने का अवसर है, कुन्ती ने विपत्ति माँगी।
- एक क्षण का क्रोध भी बड़ा परिणाम लाता है; पर सच्चा पश्चात्ताप उसे भी कल्याण में बदल देता है।
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